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सरकारों की लापरवाही का परिणाम है सर्दियां आते ही बढ़ने लगता है वायु प्रदूषण
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तवलीन सिंह
दिवाली के बाद पिछले सप्ताह पहली बार मेरा दिल्ली आना हुआ। मौसम विभाग और दिल्लीवासी दोस्तों के मुताबिक, हवा का हाल ‘थोड़ा बेहतर’ हो गया था, सो मैं बिना मास्क के नाक-मुंह ढककर हवाई अड्डे से निकली और सीधे घर गई, जो दिल्ली के एक गांव में है। घर के आसपास खेतों की चादर बिछी हुई है, सो प्रदूषण कम महसूस होता है। इसलिए अगले दिन जब मैं अंदरूनी दिल्ली में गई, तो प्रदूषण की गंभीरता के लिए बिल्कुल तैयार नहीं थी। शहर के अंदर प्रवेश करते ही मेरी आंखों में जलन होने लगी, नाक से पानी बहने लगा और सांस लेते वक्त ऐसा लगा, जैसे किसी ने हवा में तेजाब बिखेर दिया हो। दिन भर शहर के अंदर काम था, सो मेरा इतना बुरा हाल हुआ कि शाम होने तक मेरा मन वापस मुंबई भागने का हो रहा था।
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सर्वोच्च न्यायालय ने ठीक ही कहा है कि आम लोगों के लिए स्वच्छ और स्वस्थ वातावरण उपलब्ध कराना सरकार की जिम्मेदारी है। समस्या यह है कि हमारे राजनेता यह जिम्मेदारी स्वीकार करने के लिए तैयार ही नहीं हैं, सो एक दूसरे पर दोष डालते फिरते हैं। दिल्ली के मुख्यमंत्री पंजाब और हरियाणा की सरकारों पर दोष डालते हैं, तो इन राज्यों के मुख्यमंत्रियों का कहना है कि सारी जिम्मेदारी केंद्र सरकार की है। ऐसा इसलिए कि किसानों के लिए पराली न जलाने का विकल्प ढूंढना बहुत महंगा है।
उधर बेचारे गरीब किसान टीवी पत्रकारों को बार-बार कहते आए हैं कि उनको विकल्प मालूम है, लेकिन उनके पास उतना खर्च करने की क्षमता नहीं है। अगर वे यह विकल्प अपनाएं, तो उनको खेती से जो थोड़ा बहुत मुनाफा होता है, वह भी बंद हो जाएगा। परिणाम यह हुआ है कि हर वर्ष की तरह इस साल भी कोई ठोस समाधान किसी ने नहीं ढूंढा है। हमारी सरकारें जानती हैं कि थोड़ा-सा हंगामा होगा और फिर हम प्रदूषण को भूल जाएंगे।
वर्तमान स्थिति यह है कि जिस दिन प्रदूषण की परत बहुत घनी हो जाती है, उस दिन स्कूल बंद कर दिए जाते हैं। दिल्ली सरकर ने ऑड-ईवन का चक्र फिर से चला रखा है, जिससे प्रदूषण कम तो नहीं होता, लेकिन आम नागरिक को लगता है कि सरकार कुछ कर रही है। ऐसा नहीं है कि हमारे राजनेताओं को हमारे फेफड़ों की चिंता नहीं है। वे ऊंचे स्वरों में चिंता व्यक्त करते हैं, लेकिन शायद जानते नहीं कि उनकी लापरवाही के कारण स्थिति कितनी गंभीर होती जा रही है। विदेशों से जो निवेशक और पर्यटक आते हैं, वे कहते हैं कि उनको भारत बहुत पसंद है, लेकिन इस मौसम में वे दिल्ली दोबारा नहीं आना चाहते। वे लोग भी दिल्ली में नहीं रहना चाहते, जिनकी उम्र इस शहर में गुजरी है। कुछ हफ्ते पहले मेरे भांजे को बेटी हुई, लेकिन जैसे ही उसे अस्पताल से बच्ची को ले जाने की इजाजत मिली, वह अपने परिवार को लेकर देहरादून भाग गया।
हमारी सरकारों की लापरवाही के कारण उत्तर भारत में अब शायद ही कोई शहर या कस्बा रह गया है, जो सर्दियों का मौसम आते ही प्रदूषण की चपेट में न आता हो। हर वर्ष हमारे राजनेता घोषणाएं करते हैं कि अगले वर्ष तक ठोस समाधान ढूंढकर लाएंगे, लेकिन हर वर्ष की तरह घोषणाएं सिर्फ घोषणाएं ही रह जाती हैं। हर वर्ष एक दूजे पर उन्हीं शब्दों के साथ दोष डालते हैं, जो हम बहुत बार सुन चुके हैं। कितनी बार तो हम केंद्र सरकार के मंत्रियों से ही सुन चुके हैं कि 'मोदी है तो मुमकिन है।’ तो प्रधानमंत्री जी, हम पर दया कीजिए और वायु प्रदूषण के मामले में भी साबित करके दिखाइए कि मोदी है, तो इसका समाधान भी मुमकिन है।