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समाधान : ग्रीन एनर्जी खत्म करेगी बिजली संकट, स्वच्छ ऊर्जा को देना होगा बढ़ावा
Fri, 13 Jun 2025 07:47 AM IST
शिव शुक्ला
आरुषी रेलन साथ में संयोगिता सातपुते
आरुषी रेलन साथ में संयोगिता सातपुते
Published by: शिव शुक्ला
Updated Fri, 13 Jun 2025 07:47 AM IST
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विस्तार
इस बार समय से पहले मानसून आने के बावजूद कई राज्य बिजली की कमी का सामना कर रहे हैं। बिहार, छत्तीसगढ़, हरियाणा, मध्य प्रदेश और महाराष्ट्र में शाम के समय बिजली की मांग पूरी करने में 1.5 गीगावाट तक की कमी देखी जा रही है। शाम व रात को खरीदी जाने वाली बिजली, विद्युत वितरण कंपनियों (डिस्कॉम) के लिए महंगी पड़ती है, जबकि दिन में सस्ती होती है।सवाल उठता है कि भारत कैसे बिजली की कमी को टालकर सस्ती बिजली आपूर्ति को सुनिश्चित कर सकता है? काउंसिल ऑन एनर्जी, एनवायरनमेंट एंड वाटर (सीईईडब्ल्यू) के हालिया अध्ययन में सामने आया है कि अगर बिजली की मांग तेजी से बढ़ती है, तो भारत को 2030 में बिजली की भारी कमी का सामना करना पड़ सकता है, भले ही 500 गीगावाट स्वच्छ ऊर्जा क्षमता का लक्ष्य पूरा हो जाए। लक्ष्य बढ़ाना और सभी राज्यों में अधिक समानतापूर्ण विस्तार के साथ 600 गीगावाट स्वच्छ ऊर्जा क्षमता स्थापित करना ही बढ़ती मांग को पूरा करने की उपयुक्त और किफायती रणनीति होगी। इससे केवल 2030 में बिजली खरीद लागत में 42,400 करोड़ रुपये तक की बचत हो सकती है और इस दशक के अंत तक एक लाख अतिरिक्त नौकरियां पैदा हो सकती हैं। साथ ही वायु प्रदूषण को बढ़ाने वाले प्रदूषक उत्सर्जन में 23 फीसदी कमी आ सकती है। इसके लिए भारतीय राज्यों को ये तीन महत्वपूर्ण कदम उठाने होंगे।
पहला, राज्यों को अक्षय ऊर्जा परियोजनाओं की स्थापना में तेजी लानी होगी। इसमें राजस्थान, गुजरात और महाराष्ट्र सबसे अग्रणी राज्य हैं। हालांकि, विवाद-मुक्त भूमि और ग्रिड कनेक्टिविटी हासिल करने में देरी और अनुबंधों पर हस्ताक्षर करने में हिचकिचाहट जैसी जमीनी चुनौतियों को दूर करना होगा। दूसरा, राज्यों को एनर्जी स्टोरेज सिस्टम की स्थापना में भी तेजी लानी होगी। भारत को 2030 तक 600 गीगावाट स्वच्छ ऊर्जा को विश्वसनीय रूप से एकीकृत करने के लिए 380 गीगावाट-आवर की एनर्जी स्टोरेज की क्षमता स्थापित करने की जरूरत होगी। राज्यों के लिए यह सही समय है कि वे बिजली की कमी के जोखिम को टालने के लिए बैटरी स्टोरेज की स्थापना को प्राथमिकता दें। तीसरा, राज्यों को मांग प्रबंधन से जुड़े कार्यक्रम उपभोक्ताओं को ऊर्जा-कुशल उपकरणों को अपनाने और स्वेच्छा से अपनी बिजली खपत के तरीकों में बदलाव लाने के लिए प्रोत्साहित करने वाले होने चाहिए। उदाहरण के लिए, मांग प्रबंधन की पहलें उपभोक्ताओं को कुछ प्रमुख घंटों के दौरान अपने एयर कंडीशनर (एसी) को थोड़ी देर के लिए बंद करने या वाशिंग मशीन और पानी के पंपिंग मोटरों का उपयोग करने से बचने के लिए प्रोत्साहित कर सकती हैं। बिजली की पुनर्गठित खुदरा दरें जैसे-अलग-अलग समय में बिजली खपत के लिए अलग-अलग दरें, ऊर्जा कुशल उपकरणों, रूफटॉप सोलर और एनर्जी स्टोरेज समाधानों के उपयोग को प्रोत्साहित कर सकते हैं।
हमारे विश्लेषण में सामने आया है कि दस राज्यों में 24 गीगावाट बिजली की मांग में प्रबंधन के जरिये बदलाव लाने से 2030 में बिजली खरीद की लागत 14,000 करोड़ रुपये कम हो सकती है। जब उपभोक्ता अपनी बिजली खपत को मांग के लिहाज से अति-महत्वपूर्ण घंटों (जैसे कई राज्यों में सुबह और शाम में आने वाली ज्यादा मांग वाले घंटे) से हटाकर गैर-महत्वपूर्ण घंटों की तरफ ले जाते हैं, तब बिजली वितरण कंपनियां उन महत्वपूर्ण घंटों के लिए महंगी बिजली खरीदने से बच सकती हैं। (दोनों लेखिकाएं सीईईडब्ल्यू में कार्यरत हैं)