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औद्योगिक नक्शा बदल सकती है सौर ऊर्जा, यूपी ने बढ़ाया कदम आगे
Tue, 15 Dec 2020 07:48 AM IST
Ashok Madhup
अशोक मधुप
अशोक मधुप
Published by: Ashok Madhup
Updated Tue, 15 Dec 2020 07:48 AM IST
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सोलर प्लांट
- फोटो : pixabay
उत्तर प्रदेश के मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ ने कहा है कि प्रदेश में अगले दो साल में 10,700 मेगावाट की सोलर परियोजनाएं स्थापित की जाएंगी। उन्होंने यह भी कहा कि अक्षय ऊर्जा स्रोतों से बड़े पैमाने पर असीमित सौर ऊर्जा उत्पादन की दिशा में प्रदेश तेजी से काम चल रहा है। सरकार का निर्णय बहुत अच्छा है। यह प्रदेश को बिजली उत्पादन में आत्मनिर्भर बनाने वाला निर्णय है। हो सकता है कि आगे चलकर प्रदेश देश की बिजली आपूर्ति में भी मददगार बने। अब तक हम कोयले और जल से बिजली बना रहे हैं। कहीं परमाणु रिएक्टर लगाकर भी बिजली बनाई जा रही है, पर इनका स्रोत सीमित है। हमें इनके विकल्प पर काम करना है। सौर ऊर्जा ऊर्जा का अक्षय स्रोत है, और सस्ता भी है।
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अगर वास्तव में इसके लिए सही नीति बनाई जाए, तो ये प्रोजेक्ट बहुत सस्ते पड़ेंगे। दीर्घकालीन होंगे। और उद्योगपति इसमें रुचि भी लेंगे। किसी भी उद्योग को शुरू करने के लिए भूमि खरीदना सबसे महंगा सौदा होता है। दूसरे जमीन जाने से खेती का क्षेत्रफल कम होता है। सोलर प्लांट के लिए हम सरकारी भूमि का उपयोग कर सकते हैं। सोलर प्लांट लगाने के लिए नहर, सड़क, सरकारी भवन, सचिवालय और सरकारी कॉलोनी का इस्तेमाल किया जा सकता है। सरकार प्रोजेक्ट के लाइसेंस जारी करने से पहले ऐसी सरकारी भूमि का चयन कर ले, जहां सोलर प्लांट लगवाए जा सकते हैं। इसके बाद सरकार लाइसेंस जारी करते समय उद्योगपतियों को प्रस्ताव दे सकती है कि बिजलीघर लगाने के लिए उन्हें भूमि उपलब्ध कराई जाएगी। सोलर पैनल लगाने के लिए उद्योगपतियों को नहरों पर संयंत्र लगाने की अनुमति दी जा सकती है। नहरों पर संयंत्र लगाने से जमीन पर आने वाला व्यय कम हो जाएगा। इससे प्रदेश का खेती का रकबा भी कम नहीं होगा।
प्रदेश में एक्सप्रेस-वे बनाने वाली कंपनी से भी एक्सप्रेस-वे पर सोलर प्लांट लगाने का अनुरोध किया जा सकता है। उन्हें सड़कें आंवटित की जा सकती हैं। प्रदेश के चीनी मिलों के पास काफी भू-भाग होता है, उन्हें भी अपनी खाली जगह पर प्लांट लगाने को प्रोत्साहित किया जा सकता है। बड़े कॉलेज, विश्वविद्यालय, फॉर्म हाउस मालिकों को भी सोलर प्लांट लगाने के लिए प्रोत्साहित किया जा सकता है। सरकार अपने घरों और प्रतिष्ठानों में सोलर प्लांट लगाने वालों से बिजली खरीदने की शुरुआत कर ही चुकी है। सौर ऊर्जा का सबसे बड़ा फायदा यह है कि इससे पर्यावरण पर कोई प्रभाव नहीं पड़ता। जबकि कोयले से बनने वाली बिजली से पर्यावरण प्रदूषित होता है। सोलर प्लांट के मेंटनेंस की लागत भी कम आती है। पर सरकार को इसके लिए और भी बहुत कुछ करना होगा।
आज बिजली बनाने वाली चीनी मिलों को शिकायत यह रहती है कि बिजली निगम उनकी राशि का काफी समय तक भुगतान नहीं करता। अधिकतर का कहना है कि अपनी राशि लेने के लिए उन्हें बिजली निगम के अधिकारियों को रिश्वत देनी पड़ती है। सरकार को बिजली बनाने वालों को आश्वासन देना होगा कि उनकी उत्पादित बिजली का अगले माह की निश्चित की गई तारीख को भुगतान कर दिया जाएगा। ऐसा न होने पर विलंब की राशि का सूद के साथ भुगतान कराया जाएगा। भुगतान में विलंब करने वालों पर कार्रवाई का प्रावधान किया जाना चाहिए। मोदी सरकार के पहले कार्यकाल में एक औद्योगिक घराने को बिजनौर जनपद में पांच मेगावट का सोलर प्लांट लगाने का अनुमति पत्र मिला। वह पूरे जनपद में परेशान घूमते रहे, उन्हें कोई भी जगह नहीं मिली! निराश होकर वह वापस चले गए।
इसी तरह से बालावाली क्षेत्र में कोयले से बिजली बनाने के संयत्र लगाने के आदेश हुए। शर्त यह थी कि जमीन एक फसली होनी चाहिए। अधिकारियों ने कुछ जानने की कोशिश भी नहीं की। नीचे से रिपोर्ट आई कि एक फसली जमीन उपलब्ध नहीं है, उन्होंने यह रिपोर्ट आगे बढ़ा दी और प्रोजेक्ट निरस्त हो गया। क्षेत्रवासियों को प्रोजेक्ट का तब पता चला, जब यह निरस्त हो गया। बाद में उन्होंने बहुत कोशिश की। कहा कि बालावाली गंगा का खादर क्षेत्र का एरिया है, यहां की जमीन कोई फसली नहीं है। बल्कि उसमें उत्पादन गंगा के रहमो-करम पर निर्भर है। पर क्या किया जा सकता था, तब तक सब खत्म हो गया था!