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समाज : आखिर क्यों उसने 'सोनम' बनना चुना, क्या हमारे सामाजिक-सांस्कृतिक ढांचे में हैं उसके फैसले की जड़ें
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सोनम रघुवंशी।
- फोटो :
अमर उजाला
विस्तार
बीते माह चौबीस साल की उम्र में शादी हुई, एक महीने से थोड़ा ज्यादा समय पहले। सोशल मीडिया पर दूल्हे के परिवार की ओर से होने वाली शादी से लेकर रिसेप्शन तक की पोस्ट भरी पड़ी थीं। शादी के दौरान दुल्हन की सोशल मीडिया पर चुप्पी को समझा जा सकता है। अगर दुल्हन शादी से पहले दूल्हे के साथ सगाई करने से इन्कार कर चुकी हो, तो उसके ऐसे व्यवहार की वजह स्पष्ट ही है। होने वाले दूल्हे को उसके रवैये के बारे में कुछ शंकाएं थीं, लेकिन उन्हें खारिज कर दिया गया। आखिरकार, यह सभी सही मानदंडों, जाति, पारिवारिक स्थिति, धन के आधार पर तय किया गया विवाह था, लेकिन क्या सब कुछ ठीक था?
इस शादी के बमुश्किल कुछ ही दिनों बाद ही दूल्हा मर गया और दुल्हन लापता हो गई, वह भी सुदूर मेघालय में, जो मध्य भारत से आए इंदौर के लोगों के लिए काफी अनजान जगह थी। दहशत फैल गई, जोड़े के भाई शिलांग के लिए रवाना हो गए, मीडिया ने इस खबर को उठाया, जैसे-जैसे दिन बीतते गए, मामले ने पूरे देश को झकझोर कर रख दिया। जैसे-जैसे उन्माद बढ़ता गया, परिवार ने जनता और सरकार से अपील की, इंटरनेट पर सक्रिय कुछ लोगों ने मेघालय को दोषी ठहराया। कुछ अन्य ने जांच की ढिलाई पर अफसोस जताया। फिर एक दिन दूल्हे को एक गहरी खाई में मृत पाया गया। यह एक खूबसूरत शुरुआत का दुखद अंत था। दुल्हन सोनम रघुवंशी को लेकर चिंता तब और बढ़ गई, जब शव के पास उसकी खून से सनी टीशर्ट मिली।
लेकिन मेघालय पुलिस को शक होने लगा था, इस कहानी में जो दिख रहा था, उससे कहीं ज्यादा कुछ था। और आखिरकार वे सही साबित हुए। लापता दुल्हन सोनम को किसी ने बंधक नहीं बनाया था, बल्कि वह खुद एक निर्दयी हत्यारी थी। एक महिला जिसने अपने पति की हत्या की साजिश रची और उसे अंजाम दिया, कथित तौर पर इसलिए कि वह एक ऐसी शादी में फंस गई थी, जिसे वह नहीं चाहती थी, और एक ऐसे आदमी से प्यार करती थी, जिसे उसका परिवार कभी स्वीकार नहीं करता। यह कोई जुनून में किया गया अपराध नहीं था, बल्कि एक सुनियोजित और जान-बूझकर की गई जघन्य हत्या थी।
हत्या को जायज नहीं ठहराया जा सकता। अगर आरोप सही हैं, तो सोनम को कानून का सामना करना चाहिए। लेकिन यदि हम यह सुनिश्चित करना चाहते हैं कि कोई अन्य राजा फिर से ऐसी भ्रष्टता का शिकार न हो, तो हमें सोनम कार्यों की निंदा करते हुए, उस सामाजिक और सांस्कृतिक ढांचे की भी जांच करनी चाहिए, जिसने उसके निर्णयों को प्रभावित किया। लोगों के सवाल जायज ही हैं कि उसने राजा रघुवंशी को क्यों नहीं छोड़ दिया? वह क्यों इतना फंसा हुआ महसूस कर रही थी कि उसने तलाक के बजाय हत्या का रास्ता चुना?
यह सोनम को माफ करने के बारे में नहीं है। यह उस व्यवस्था की सड़न को समझने के बारे में है, जो महिलाओं को शादी को नियति और तलाक को आपदा के रूप में देखने के लिए प्रशिक्षित करती है। भारत भर में अनगिनत घरों में लड़कियों को सहना, समायोजित होना और समझौता करना सिखाया जाता है। उन्हें बताया जाता है कि विवाह ही उनका एकमात्र सम्मानजनक भविष्य है, घर छोड़ना शर्मनाक है, तथा व्यक्तिगत खुशी को हमेशा पारिवारिक प्रतिष्ठा से पीछे रखना चाहिए। एक बेटी जो कहती है कि वह शादी नहीं करना चाहती, उसके साथ ऐसा व्यवहार किया जाता है, मानो वह किसी अलिखित नैतिक परीक्षा में फेल हो गई हो। और इसलिए, कई महिलाएं दांपत्य जीवन को ढोती रहती हैं। लेकिन कुछ विवाह के बंधन को तोड़कर चली जाती हैं और वे ‘सोनम’ नहीं बनना चुनती हैं। तो असली सवाल सिर्फ सोनम को लेकर नहीं है। यह इस बारे में है कि शादी से बाहर निकलना भारत में एक महिला द्वारा लिए जाने वाले सबसे डरावने फैसलों में से एक क्यों है। अब भी इतने कम सुरक्षित निकास मार्ग क्यों हैं?
एक संस्कृति, जो लड़कियों को दुल्हन बनना सिखाती है, लेकिन मना करना नहीं सिखाती, वह दोषी है। एक समाज, जो महिलाओं पर सब कुछ सहने का दबाव डालता है, उसे इसके परिणामों के लिए जवाबदेह होना चाहिए। महिलाओं को वास्तव में सशक्त बनाने का क्या मतलब है? इसका मतलब एक ऐसी व्यवस्था बनाना होना चाहिए, जो उन्हें बिना गरिमा खोए शादी से बाहर निकलने का अवसर दे।
इसका मतलब यह होना चाहिए कि अगर कोई लड़की कहे कि ‘मुझे शादी नहीं करनी है’, तो उसे स्वार्थी करार देने के बजाय उसका समर्थन करना चाहिए। इसका मतलब यह नहीं है कि सोनम ने जो किया, उसे रोमांटिक बनाया जाए, बल्कि यह सुनिश्चित करना है कि कोई और महिला यह महसूस न करे कि उसे इतना आगे जाना है। और किसी भी युवा पुरुष को सामाजिक अपेक्षाओं और चालाकी के कारण अपनी जान नहीं गंवानी पड़े। हमें ऐसी कानूनी सहायता की व्यवस्था बनानी चाहिए, जो तेज हो, लेकिन डराने वाली नहीं।
आइए हम हेल्पलाइन, सुरक्षित घर और मानसिक स्वास्थ्य तक पहुंच को प्रभावी बनाएं। हमें शादी से पहले और बाद में परामर्श को सामान्य प्रक्रिया बनाना चाहिए। हमें लड़के और लड़कियों, दोनों को सिखाना चाहिए कि प्यार और जीवन में सहमति वैकल्पिक नहीं है।
हमें सिर्फ विवाह का ही नहीं, तलाक का भी जश्न मनाना चाहिए। हमें अपनी बेटियों को बताना चाहिए कि अगर शादी ठीक से नहीं चल रही है, तो तुम पति को छोड़ सकती हो। हम तुम्हारे साथ खड़े हैं। तुम्हें अपना या किसी का जीवन बर्बाद करने की जरूरत नहीं है। तुम घुटन भरी शादी से बाहर निकल जाओ। हमें उसे न कहने की मंजूरी देनी चाहिए। हमें अपने लड़कों को भी न कहने की मंजूरी देनी चाहिए। अगर उसकी आपत्ति को सुना जाता, तो आज वह जिंदा होता। और सबसे महत्वपूर्ण बात कि हमें यह सुनिश्चित करना चाहिए कि अगर सोनम दोषी पाई जाती है, तो उसे कानून के तहत सख्त से सख्त सजा मिले।