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समाज : 'परिवार' का मूल्य समझाता पश्चिम, हमें भी इस तरफ सोचने की जरूरत

Fri, 05 Jul 2024 07:23 AM IST
Kshama Sharma क्षमा शर्मा
Updated Fri, 05 Jul 2024 07:23 AM IST
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सार
स्वीडन का नया कानून परिवार की ओर वापसी कराने वाला है। इसके अनुसार, अगली पीढ़ी की बेहतरी के लिए पुरानी पीढ़ी का स्नेह जरूरी है।
 
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Society: West explains the value of 'family', we also need to think in this direction
परिवार - फोटो : istock

विस्तार

हाल ही में एक खबर ने चकित किया। उसमें बताया गया था कि अब स्वीडन में दादा-दादी और नाना-नानी को पोते-पोतियों, नाती-नातिनों की देखभाल करने के लिए बच्चे के जन्म के पहले साल में तीन महीने की सवैतनिक छुट्टी मिलेगी। यह कानून वहां की संसद में पास किया गया है। स्वीडन दुनिया का पहला देश है, जिसने पचास साल पहले माता-पिता बनने पर न केवल माताओं को, बल्कि पिताओं के लिए भी अवकाश देने की घोषणा की थी। यहां बच्चे के जन्म पर सोलह महीने या चार सौ अस्सी दिन के अवकाश लाभ दिए जाते हैं।



इस खबर को पढ़कर वे घटनाएं याद आती हैं, जहां अमेरिका और यूरोप में लोग इस बात पर आश्चर्य करते हैं कि भारत से दादा-दादी, नाना-नानी बारी-बारी से अपने नाती-नातिनों, पोते-पोतियों की देखभाल करने के लिए छह-छह महीने के लिए वहां जाते रहते हैं। पश्चिम इन दिनों परिवार के संपूर्ण बिखराव से परेशान है। वहां बहुत से युवा, जिनमें लड़के-लड़कियां, दोनों शामिल हैं, विवाह नहीं करना चाहते। विवाह हो भी जाए, तो वे बच्चों को जन्म देना नहीं चाहते। बच्चे पालना उन्हें भारी जिम्मेदारी और अपनी आजादी में खलल की तरह महसूस होता है। इस लेखिका ने यूरोप में ऐसे अनेक लोगों को देखा है, जो या तो अकेले रहते हैं या उनके बच्चे नहीं हैं। बच्चों का शौक पूरा करने के लिए वे कई सारे कुत्ते-बिल्लियां पालते हैं। सुबह-शाम उन्हें घुमाने ले जाते हैं। उनके स्वास्थ्य की देखभाल करते हैं। उन्हें अच्छा भोजन देते हैं। कहने का अर्थ यह कि इन जानवरों को पालने में भी लगभग उतनी ही मेहनत करनी पड़ती है, जितनी बच्चों को पालने में।


लेकिन विभिन्न विमर्शों ने पिछली एक सदी से परिवार नामक संस्था की इतनी बुराई की है कि युवाओं को परिवार बसाना-बढ़ाना अपने जीवन की सबसे बड़ी मुसीबत लगता है। माता-पिता से तो वे बहुत जल्दी ही अलग हो जाते हैं। उनसे वे किसी पर्व-त्योहार या ऐसे ही किसी अवसर पर मिलते हैं। बहुतेरे तो उनके बीमार होने पर भी उनकी कोई सुध नहीं लेते।

इसीलिए वे भारत के पारिवारिक ढांचे को आश्चर्य से देखते हैं, लेकिन खुद पारिवारिक बंधनों से दूर भागते हैं। हालांकि हमारे यहां भी दशकों से एकल परिवार को किसी वरदान की तरह देखा जा रहा है। अक्सर पर्सनल कॉलम्स में बुजुर्ग शिकायत करते हैं कि उन्होंने अपनी पूरी उम्र और जमा-पूंजी अपने बच्चों को पालने, उनकी देखभाल करने और शिक्षा पर खर्च कर दी। मगर अब बच्चे उनसे मिलना तो दूर, एक फोन करने तक की जरूरत महसूस नहीं करते।

ऐसी भी खबरें आती हैं कि जब माता-पिता की मृत्यु हो जाती है, तो विदेशों में रहने वाले बच्चे पड़ोसियों से कहते हैं कि अंतिम संस्कार आप ही कर दीजिए। हमें अपना अकाउंट नंबर दे दीजिए। पैसे ट्रांसफर कर देंगे।  पश्चिम के लोग परिवार की वापसी के नारे लगा रहे हैं। वे एकल परिवारों की मुसीबतों से परेशान हैं। वहां के बहुत से बच्चे कम उम्र में ही ऐसी तमाम गतिविधियों में लग जाते हैं, जो उनके भविष्य के लिए अच्छी नहीं हैं। लेकिन जिन विचारों को फैलाकर पश्चिम ने परिवारों को नेस्तनाबूद किया, उनके रहते परिवार की वापसी मुश्किल ही दिखती है। व्यक्तिवाद के चलते मनुष्य कितना स्वार्थी और आत्मकेंद्रित हो जाता है, पश्चिम के समाज उसके ज्वलंत उदाहरण हैं।

किसी डे केयर सेंटर में बच्चे पालने से बच्चों को वैसी देखभाल नहीं मिलती, जो दादा-दादी या नाना-नानी के रहते होती है। सहायिकाओं के भरोसे भी बच्चों की उचित देखभाल की गारंटी नहीं दी जा सकती। इसके अलावा, जब युवाओं को यह बताया जाएगा कि परिवार तुम्हारे कॅरिअर में सबसे बड़ा रोड़ा है, तो वे भला परिवार क्यों बसाएंगे!

लेकिन स्वीडन का कानून बता रहा है कि अगली पीढ़ी की बेहतरी के लिए पुरानी पीढ़ी का होना और बच्चों को उनका स्नेह मिलना कितना जरूरी है। दादा-दादी या नाना-नानी के सान्निध्य में बच्चों की परवरिश से बहुत से अच्छे मूल्य उनके मन में आसानी से जगह बना लेते हैं। वे माता-पिता के काम पर जाने के बाद खुद को अकेला नहीं महसूस करते हैं। उनमें सुरक्षा की भावना भी मजबूत होती है। अपने यहां आजादी के नाम पर हम जिस परिवार के बिखराव का जश्न मना रहे हैं, उस बारे में भी सोचने की जरूरत है। दुनिया में कहीं भी सिर्फ अपने अकेले के भरोसे न जीवन जिया जा सकता है, न चुनौतियों से मुकाबला ही संभव है।  

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