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समाज: बढ रही एकल परिवार और एक बच्चे वाली सोच, जेनरेशन अल्फा कितनी अकेली है
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सार
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विस्तार
जेनरेशन अल्फा यानी जो बच्चे 2010 या उसके बाद पैदा हुए हैं, उनकी उम्र 2024 तक पंद्रह वर्ष या उससे कम है। कहा जाता है कि यह पहली पीढ़ी है, जो तकनीक पर पूरी तरह से निर्भर है, जैसे कि मोबाइल, कंप्यूटर, इंटरनेट आदि। यही वह पीढ़ी है, जिसके माता-पिता बच्चे को कुछ महीने का होने के बाद ही मोबाइल पकड़ा देते हैं और बच्चे मोबाइल के इतने आदी हो जाते हैं कि वे हर समय बस उसी को देखना चाहते हैं। अगर न दो तो शोर मचाते हैं, तोड़-फोड़ करते हैं, जिद करते हैं, खाना-पीना तक छोड़ देते हैं। वे अपना होमवर्क भी मोबाइल और चैटजीपीटी के जरिये करना चाहते हैं। अक्सर उनका ध्यान कक्षा में नहीं लगता।
बहुत से स्कूलों में मोबाइल पर प्रतिबंध है। कई बच्चे छिपाकर इसे ले जाते हैं। इन्हीं सब बातों को देखते हुए ऑस्ट्रेलिया ने सोलह साल की उम्र तक के बच्चों के लिए मोबाइल को प्रतिबंधित कर दिया है। पूरी दुनिया में जेनरेशन अल्फा का स्क्रीन टाइम (मोबाइल देखने का समय) बहुत अधिक है। इसीलिए बच्चों में मोटापा और गंभीर बीमारियां बढ़ रही हैं, क्योंकि वे शारीरिक श्रम वाले खेल-कूद के मुकाबले बैठे-बैठे फोन पर गेम खेलते रहते हैं और साथ में हाई कैलोरीज की चीजें खाते रहते हैं। ये बच्चे तरह-तरह के वीडियो बनाते हैं। स्मार्टफोन तथा अन्य गिजमोज का इस्तेमाल करना बेहतरीन ढंग से जानते हैं।
माता-पिता अपने दोस्तों व रिश्तेदारों को गर्व से बताते भी हैं कि देखो, उनका बच्चा क्या-क्या जानता है। ये वे बच्चे हैं, जिन्हें अगर कोई चीज चाहिए, तो चाहिए ही। अक्सर वे ही तय करते हैं कि उन्हें क्या खरीदना, क्या पहनना है, कौन-सी गाड़ी चाहिए। माता-पिता अक्सर उनकी इच्छाएं पूरी करते हैं, यदि कोई इच्छा पूरी होने से रह जाए, तो वे इसके लिए किसी भी सीमा तक जाने को तैयार रहते हैं।
दो साल पहले मैं लखनऊ जाने के लिए एयरपोर्ट पर बैठी थी। मेरी नजर सामने बैठे युवा पति-पत्नी पर पड़ी। उनकी करीब तीन साल की एक बच्ची थी और सात-आठ महीने का एक बच्चा प्रैम में बैठा था। बच्ची खेल रही थी, माता-पिता बातचीत में मशगूल थे। प्रैम में बैठा बच्चा फोन पर कार्टून देख रहा था। अचानक वह जोर से रोने लगा। उसका प्रोग्राम खत्म हो गया था। तभी पिता ने दूसरा कार्टून लगा दिया। बच्ची जो खेल रही थी, वह भी माता-पिता के पास आई और फोन की जिद करने लगी, तब मां ने उसे फोन पकड़ाया और फिर से दोनों पति-पत्नी बातचीत में व्यस्त हो गए। उड़ान के समय तक दोनों बच्चे फोन में ही उलझे रहे। जो समय बच्चों से बातें करने का, उनसे हिलने-मिलने का, उन्हें तरह-तरह की चीजें सिखाने का हो सकता है, उसे न करके माता-पिता बच्चों के हाथ में फोन पकड़ा रहे हैं। लेकिन इससे समस्याएं कितनी बढ़ रही हैं, वे इस ओर ध्यान नहीं देते। नन्हे बच्चे चिड़चिड़े हो रहे हैं। वे अधिक गुस्सा कर रहे हैं। फिर वे फोन पर क्या देख रहे हैं, इस पर नजर रखना भी मुश्किल है।
एक बात यह भी है कि जेनरेशन अल्फा के माता-पिता के बच्चे कम हैं। दुनिया भर में बच्चे कम जन्म ले रहे हैं। विभिन्न सरकारें इस पर चिंता प्रकट कर रही हैं। वे जोड़ों को तरह-तरह के प्रलोभन दे रही हैं कि ज्यादा बच्चे पैदा करें। मगर लोग, विशेष तौर पर महिलाएं बच्चों को जन्म देना नहीं चाहतीं। उनका कहना है कि आज के समय में बच्चे पालना बहुत कठिन है। ऐसे में यदि एक बच्चा हो, तो वही ठीक है। बहुत से लोग एक बच्चा भी नहीं चाहते। एकल परिवार और एक बच्चा इससे यह भी पता चलता है कि जेनरेशन अल्फा कितनी अकेली है।