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लाल टेलीफोन: हॉटलाइन तभी बचाती है, जब घंटी बजने पर कोई उठाए; एआई में खतरा कैसा दिखेगा, यह किसी को पता नहीं

Sun, 04 Oct 2026 08:50 AM IST
Anshuman Tiwari अंशुमान तिवारी
Updated Sun, 04 Oct 2026 08:50 AM IST
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सार
अमेरिका और चीन के बीच ‘सुपर इंटेलिजेंस’ डायलॉग हुआ। तय हुआ कि दोनों देशों के बीच एक हॉटलाइन बनेगी। दो दुश्मनों के बीच एक टेलीफोन रखने का ख्याल कोई नया नहीं है। कभी अमेरिका और रूस के बीच लाल टेलीफोन के किस्से आम थे। हालांकि, इस तरह का कोई फोन व्हाइट हाउस में कभी था ही नहीं। मॉस्को-वाशिंगटन के बीच सिर्फ हॉटलाइन हुआ करती थी, जो इसलिए काम करती थी, क्योंकि दोनों जानते थे, अगर नहीं उठाया, तो 30 मिनट में सब खत्म। डर बराबर था। दांव बराबर थे। चीन और अमेरिका की स्थिति अलग है।
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Red Telephone hotline saves only if someone picks up while ringing no one knows danger in realm of AI
अमेरिका और चीन के बीच सुपर इंटेलिजेंस डायलॉग - फोटो : अमर उजाला प्रिंट- ग्राफिक्स

विस्तार

25 सितंबर, 2026। वाशिंगटन। शी जिनपिंग व्हाइट हाउस में बैठे हैं। ट्रंप सामने हैं। दोनों मुस्कुरा रहे हैं-वही मुस्कुराहट, जो दो बॉक्सर रिंग में घुसने से पहले एक-दूसरे पर उछालते हैं। 30 अरब डॉलर की टैरिफ डील पर दस्तखत। हाथ मिलाए। फोटो खिंचवाई। पर सबसे अहम चीज एक लाइन में दबी है, जिसे फुटनोट समझा गया है। अमेरिका और चीन के बीच ‘सुपर इंटेलिजेंस’ डायलॉग हुआ। वाशिंगटन और बीजिंग के बीच एआई हॉटलाइन बनेगी। अगर कोई पगलाया एआई एजेंट कुछ करे, कोई एल्गोरिदम बाजार तोड़ दे, कोई मशीन गलत निशाना साधे, कोई एआई सिस्टम खुद फैसला ले ले, तो फोन उठाओ और बात करो।



टाइम मशीन के यात्री ध्यान दें, एआई सुपर इंटेलिजेंस नया शब्द है। मगर दो दुश्मनों के बीच एक टेलीफोन रखने का ख्याल बहुत पुराना है। उसकी कहानी उतनी ही डरावनी है, जितनी किसी सरफिरे एआई एजेंट पर बनी कोई फिल्म।


आइए, सीट पकड़िए। बेल्ट बांधिए। तारीख देखिए-27 अक्तूबर, 1962। अटलांटिक महासागर। टाइम मशीन इसी समुद्र के ऊपर उड़ रही है। दुनिया खत्म होने वाली है, मगर यह बात केवल अमेरिकी राष्ट्रपति जॉन एफ कैनेडी और रूसी राष्ट्रपति निकिता ख्रुश्चेव को पता है। क्यूबा में सोवियत मिसाइलें मिली हैं। अमेरिकी नौसेना ने क्यूबा को घेर लिया है। परमाणु बम तैयार हैं। दोनों तरफ।

अटलांटिक के अंधेरे पानी में फंसी है सोवियत पनडुब्बी बी-59। ऊपर अमेरिकी जहाज डेप्थ चार्ज गिरा रहे हैं-धमाके, हिलती दीवारें, 45 डिग्री तापमान, ताजी हवा खत्म, ताकि रूसी सबमरीन ऊपर आ जाए। रूसी कप्तान वलेंतिन सवित्स्की चिल्ला रहे हैं, ‘परमाणु टॉरपीडो दागो! वे हमें डुबो रहे हैं! हम सब मर जाएंगे, मगर उन्हें भी ले जाएंगे!’ पनडुब्बी पर परमाणु टॉरपीडो है। हिरोशिमा जितना ताकतवर। दागने के लिए तीन अफसरों की सहमति चाहिए। कप्तान-हां। पॉलिटिकल अफसर-हां। तीसरा फ्लोटिला कमांडर-वासिली आर्किपोव, जो संयोग से इसी पनडुब्बी पर है। आर्किपोव ने कहा-नहीं। बस एक शब्द-नहीं। पनडुब्बी सतह पर आई। अमेरिकियों ने उसे जाने दिया। दुनिया बच गई। एक आदमी ने ‘नहीं’ कहा और आज दुनिया सांस ले रही है। मगर कैनेडी और ख्रुश्चेव को एक-दूसरे से बात करने में घंटों लगे। टेलीग्राम। राजदूत। एन्क्रिप्टेड संदेश, जो डिकोड होने में 12 घंटे लेता था, यानी जब तक संदेश पहुंचता, दुनिया खत्म हो सकती थी।

अब उड़िए यूरोप की तरफ। 20 जून, 1963। जिनेवा। क्यूबा संकट के आठ महीने बाद यहां एक बड़ी खबर सुनाई दी है। अमेरिका और सोवियत संघ ने हॉटलाइन पर दस्तखत किए। मगर ठहरिए, आप तो भविष्य से आ रहे हैं न। आपने अमेरिका और रूस के बीच लाल टेलीफोन का किस्सा खूब सुना होगा। तो यह सच पकड़िए कि यह ‘लाल टेलीफोन’ कभी टेलीफोन था ही नहीं। यह सबसे बड़ा मिथक है। कोई लाल फोन व्हाइट हाउस की मेज पर नहीं रखा था। असल हॉटलाइन थी एक टेलीटाइप मशीन। टाइपराइटर जैसा दिखने वाला उपकरण, जो टेक्स्ट भेजता था। वाशिंगटन से कोपेनहेगन, फिर स्टॉकहोम, हेलसिंकी होते हुए मॉस्को। इसके बाद केबल और रेडियो सर्किट का इस्तेमाल हुआ, फिर सैटेलाइट लिंक। फिर, फैक्स और 2008 में फाइबर ऑप्टिक्स।

क्या आप इस सवाल में उलझे हैं कि अमेरिका और रूस के बीच फोन लाइन क्यों नहीं बनी, जबकि दंतकथाएं तो लाल टेलीफोन का जिक्र करती हैं। दरअसल, इस हॉटलाइन से आवाज को दूर रखा गया। लिखे हुए संवाद (टेक्स्ट) का इस्तेमाल किया गया जान-बूझकर, क्योंकि आवाज में गुस्सा झलकता है। टोन बदलता है। गलतफहमी होती है। टेक्स्ट में समय मिलता है-सोचो, लिखो, सुधारो, भेजो।

अब हम 1967 में आ गए हैं, इसका पहला इस्तेमाल देखने। इस्राइल बनाम अरब। छह दिन की जंग। अमेरिकी छठा बेड़ा भूमध्य सागर में। सोवियत जहाज भी वहीं। दोनों की नौसेनाएं एक-दूसरे के इतने करीब कि दूरबीन से चेहरे देखे जा रहे हैं। कॉसिगिन ने हॉटलाइन पर लिखा, ‘आपके जहाज कहां जा रहे हैं?’ जॉनसन ने जवाब दिया, ‘गलतफहमी छोड़िए, हम इस्राइल के लिए नहीं लड़ रहे।’ मॉस्को ने कहा-समझ गए। और उस रात तीसरा विश्वयुद्ध टल गया।

टाइम मशीन अब भूमध्यसागर से कोरिया और चीन की तरफ बढ़ रही है। रास्ते में एक और हॉटलाइन की बात करते हुए चलते हैं। भारत और पाकिस्तान के बीच भी हॉटलाइन है-1971 के बाद से। डायरेक्टर जनरल ऑफ मिलिट्री ऑपरेशंस (डीजीएमओ) एक-दूसरे से बात कर सकते हैं। दोनों तरफ के सैन्य कमांडर। यह हॉटलाइन काम करती है। 2003 का सीजफायर इसी से टिका। जब गोलाबारी बढ़ती है, तब डीजीएमओ फोन करता है। कभी-कभी रात को दो बजे। चिल्लाहट होती है। आरोप लगते हैं, मगर बात होती है। 1999-कारगिल। भारतीय डीजीएमओ ने पाकिस्तानी डीजीएमओ को फोन किया, ‘आपके सैनिक हमारी जमीन पर हैं।’ पाकिस्तान ने कहा, ‘वे हमारे सैनिक नहीं हैं। मुजाहिदीन हैं।’ झूठ। दोनों को पता था, झूठ है। मगर बात हो रही थी। दो परमाणु देश लड़ रहे थे, मगर एक अदृश्य लक्ष्मण रेखा थी। वह लक्ष्मण रेखा उसी हॉटलाइन से खिंची थी। 2019-बालाकोट। भारतीय वायुसेना ने पाकिस्तान के अंदर हमला किया। अगले दिन पाकिस्तान ने जवाबी कार्रवाई की। विंग कमांडर अभिनंदन पकड़े गए। डीजीएमओ की हॉटलाइन गरम थी। अभिनंदन वापस। फोन ने अपना काम किया।

और, यह लीजिए, हम आ गए उत्तर कोरिया। यहां उत्तर और दक्षिण कोरिया के बीच पनमुनजोम में हॉटलाइन है। सीधी लाइन। रोज सुबह एक टेस्ट कॉल, ‘क्या आप सुन सकते हैं?’ ‘हां, सुन सकते हैं।’ मगर किम जोंग-उन का पसंदीदा हथियार? तार काटना। 2013-लाइन काटी गई। 2016-फिर लाइन कटी। 2020 में भी यही हुआ। हर बार जब गुस्सा आया-कैंची चलाई। फिर जब बात करनी हुई-तार जोड़ा। मानो हॉटलाइन गुस्से का बैरोमीटर बन गई-तार जुड़ा है, तो सब ठीक, कटा है, तो खतरा।

और अब आते हैं अमेरिका-चीन पर। अमेरिका और चीन के बीच 2008 से सैन्य हॉटलाइन है, मगर चीन कॉल उठाता नहीं।  2001 में हैनान द्वीप पर अमेरिकी जासूसी विमान और चीनी लड़ाकू विमान टकराए। चीनी पायलट मरा। अमेरिकी विमान हैनान पर उतरा। 24 अमेरिकी चालक दल-11 दिन बंधक। अमेरिका ने हॉटलाइन पर फोन किया। चीन ने नहीं उठाया। तीन दिन तक। 2022-नैंसी पेलोसी ताइवान गईं। चीन ने ताइवान के चारों तरफ मिसाइलें दागीं। अमेरिकी रक्षा मंत्री ऑस्टिन ने चीनी रक्षा मंत्री को फोन किया। उठाया नहीं। पैटर्न देखिए-अमेरिका फोन करता है, चीन नहीं उठाता। हॉटलाइन है, पर काम नहीं करती। इसीलिए, 25 सितंबर, 2026 की ‘सुपर इंटेलिजेंस डायलॉग’ पर दुनिया बहुत उत्साहित नहीं हुई, क्योंकि हॉटलाइन तभी कारगर है, जब दोनों उठाएं। मॉस्को-वाशिंगटन हॉटलाइन इसलिए काम करती थी, क्योंकि दोनों जानते थे, अगर नहीं उठाया, तो 30 मिनट में सब खत्म। डर बराबर था। दांव बराबर थे। टाइम मशीन वापस लौट रही है। 1962 में दुनिया इसलिए खत्म नहीं हुई, क्योंकि एक रूसी अफसर ने पानी के अंदर ‘नहीं’ कहा। उसके बाद हॉटलाइन बनी, मगर हॉटलाइन तभी बचाती है, जब घंटी बजने पर कोई उठाए।

एआई में खतरा कैसा दिखेगा, यह किसी को पता नहीं है। कोई मशीन बाजार तोड़ दे, तो यह दुर्घटना है या हमला? कोई एआई सिस्टम सैन्य फैसला ले ले, यह बग है या रणनीति? जब खतरे की शक्ल नहीं पता, तो फोन कब उठाएं? इसलिए शी-ट्रंप की बैठक में एक हॉटलाइन की बात हुई, मगर उसका नंबर किसी के पास नहीं। नियम क्या हैं? ‘सुपर इंटेलिजेंस’ की परिभाषा क्या है? किसी को नहीं पता। पहली बैठक नवंबर, 2026 में होगी, यानी हॉटलाइन तो बन गई, मगर फोन अभी डिब्बे में है। फिर मिलते हैं अगले सफर पर..

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