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समाज: क्या बचपन अब कंटेंट बन रहा है, आंकड़े दे रहे हैं अवांछित बदलाव की गवाही

Thu, 28 May 2026 07:11 AM IST
Pavan संकेत उपाध्याय, वरिष्ठ पत्रकार
संकेत उपाध्याय, वरिष्ठ पत्रकार Published by: Pavan Updated Thu, 28 May 2026 07:11 AM IST
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सार
जेन अल्फा, यानी 2010 के बाद पैदा हुए बच्चों में से 37 फीसदी इन्फ्लुएंसर बनना चाहते हैं। ये आंकड़ा सिर्फ एक नंबर नहीं, बल्कि हमारी पूरी पीढ़ी और बचपन की परिभाषा को बदल देने वाला संकेत है। क्या सच में बचपन अब परफॉर्मेंस मेट्रिक्स, लाइक्स और व्यूज का गुलाम बन रहा है?
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Society: Is childhood now becoming content? Statistics are testifying to unwanted changes.
क्या बचपन अब कंटेंट बन रहा है - फोटो : अमर उजाला

विस्तार

'हैलो गाइज’ कहकर अपनी बात कहना इंटरनेट पर एक लाइलाज बीमारी बन चुकी है। सस्ते इंटरनेट के दौर में रील बनाने की शुरुआत भले ही बड़ों ने की हो, लेकिन अब माता-पिता अपने बच्चों से भी वही करने की उम्मीद करने लगे हैं। जिस उम्र में खेलकूद और पढ़ाई आम होनी चाहिए थी, उसमें अभिभावक अपना अधूरा सपना बच्चों से पूरा करवा रहे हैं। रातोंरात स्टार बन जाने का। पैसे कमाने का। दुनियाभर में तो हो ही रहा है, हिंदुस्तान में भी अब यह बहुत बड़ा बाजार बन गया है। और नाम दिया गया-किडफ्लुएंसर!

 
बच्चे खुद कंटेंट क्रिएटर्स बनकर ब्रांड्स के लिए प्रोडक्ट प्रमोट कर रहे हैं, पैसा कमा रहे हैं और लाखों-करोड़ों फॉलोअर्स बना रहे हैं। होस्टिंगएडवाइज डॉट कॉम के एक सर्वेक्षण के अनुसार, जेन अल्फा (2010 के बाद पैदा हुए बच्चे) में से 37 प्रतिशत बच्चे इन्फ्लुएंसर बनना चाहते हैं। यह आंकड़ा सिर्फ एक नंबर नहीं, बल्कि हमारी पूरी पीढ़ी और बचपन की परिभाषा को बदल देने वाला संकेत है। क्या सच में बचपन अब परफॉर्मेंस मेट्रिक्स, लाइक्स और व्यूज का गुलाम बन रहा है? क्या ये अवसर हैं या शोषण का नया रूप? भारत में यह ट्रेंड और भी तेज है। 2024-25 में इंस्टाग्राम पर 16 साल से कम उम्र के 83,000 से ज्यादा किडफ्लुएंसर्स हैं। एक साल में ही इनकी संख्या में 41 प्रतिशत की बढ़ोतरी हुई है। हर बच्चा औसतन 1.2 लाख यूजर्स तक पहुंच बना चुका है। वैश्विक स्तर पर किडफ्लुएंसर इकनॉमी करीब 66,000 करोड़ रुपये की हो चुकी है। ये आंकड़े दर्शाते हैं कि बच्चों को अब सिर्फ पढ़ाई या खेलकूद तक सीमित नहीं रखा जा रहा है, बल्कि उन्हें डिजिटल अर्थव्यवस्था का हिस्सा बना दिया गया है। सवाल यह है कि यह सब किसके फायदे के लिए हो रहा है?


ज्यादातर मामलों में माता-पिता ही इन अकाउंट्स को प्रबंधित करते हैं। वे कंटेंट की प्लानिंग, शूटिंग, एडिटिंग और पोस्टिंग सब संभालते हैं। यहां सबसे बड़ी कमी बच्चे की सहमति को लेकर है। बच्चा शायद यह नहीं समझ पाता कि उसकी तस्वीरें, वीडियो व निजी डाटा कैसे इस्तेमाल हो रहे हैं, किस ब्रांड के साथ साझेदारी है या भविष्य में इस डाटा का कैसे इस्तेमाल हो सकता है।

अंतरराष्ट्रीय शोध बताता है कि दो साल से कम उम्र के लगभग 80 प्रतिशत बच्चों की तस्वीरें या वीडियो किसी न किसी रूप में इंटरनेट पर मौजूद हैं। मनोवैज्ञानिक इसे चिंता भरी नजरों से देख रहे हैं। फोटो बेशक मन से शेयर की जाती है, पर मां-बाप अनजाने में ही सही, इन तस्वीरों के दुरुपयोग को न्योता दे देते हैं और बच्चे को पता ही नहीं होता। इसको कहा जाता है ‘शेयरेंटिंग’, यानी जो अभिभावक बच्चों की तस्वीर शेयर करते हों। कुछ मां-बाप को यह डर समझ आता है। फिर भी, किडफ्लुएंसर अर्थव्यवस्था में पैसा कमाने की चाह में लोग बच्चों को कैमरे के सामने खड़ा कर देते हैं और कहते हैंैं-‘स्माइल, बेटा!’ नतीजतन, साइबर बुलिंग, निजता का हनन, अनचाहे कॉन्टैक्ट या मानसिक दबाव जैसी परेशानियां बच्चों में आम हो गई हैं। वे समाज में भी असहज हो रहे हैं। पर, क्या यह सच में सशक्तीकरण है, या फिर बचपन को एक सामान की तरह इस्तेमाल करने का नया तरीका? बचपन का मतलब है-खेलना, गलतियां करना, बिना किसी दबाव के सीखना। पर अब वह प्रदर्शन करने का मंच बन गया है, जहां हर पोस्ट पर ‘कितने व्यूज आए’ का सवाल घूमता रहता है।

भारत में यह ट्रेंड और भी जटिल है। शहरों में मध्यम वर्ग के माता-पिता इसे कॅरिअर विकल्प मान रहे हैं। वे सोचते हैं कि इससे बच्चा कम उम्र में पैसे कमा लेगा और ब्रांड्स से जुड़ाव बनेगा। पर, ग्रामीण या निचले मध्यम वर्ग में यह ट्रेंड कैसे पहुंच रहा है? क्या वहां भी यही दबाव है? ऑस्ट्रेलिया और फ्रांस जैसे देशों ने 16 साल से कम उम्र के बच्चों के लिए सोशल मीडिया पर सख्त प्रतिबंध लगाए या प्रस्तावित किए हैं। वहां आयु सत्यापन, प्लेटफॉर्म की जवाबदेही और माता-पिता के नियंत्रण को मजबूत किया जा रहा है। फ्रांस में तो किडफ्लुएंसर्स के लिए श्रम कानून लाने की भी बात हो रही है। पर, भारत में फिलहाल कानूनों का ज्यादा ध्यान डाटा प्राइवेसी पर है। बच्चों को मजदूरी या मानसिक प्रभाव से बचाने के लिए अभी कोई मजबूत नीति नहीं है। सवाल यह है कि क्या हम बच्चों को सिर्फ व्यूज के लिए इस्तेमाल कर रहे हैं? क्या बचपन अब कंटेंट क्रिएशन का हिस्सा बन गया है? एक तरफ कहा जाता है कि इससे बच्चों को रचनात्मकता और आर्थिक आजादी मिल रही है, पर दूसरी तरफ यह उन पर दबाव, शोषण और लंबे समय तक मानसिक असर भी डाल रहा है।

स्कूलों में डिजिटल सुरक्षा की पढ़ाई शुरू होनी चाहिए। सरकार को किड इन्फ्लुएंसर्स के लिए नियम बनाने चाहिए, जैसे न्यूनतम उम्र तय करना, काम के घंटे सीमित करना, कमाई का कुछ हिस्सा बच्चे के नाम पर बचत में रखना और कंटेंट की अभिभावकों द्वारा समीक्षा करना। सोशल मीडिया प्लेटफॉर्म्स को भी जिम्मेदारी निभानी चाहिए। यह मुद्दा हमारे पूरे समाज का है। हम किस तरह की पीढ़ी तैयार कर रहे हैं? जहां बच्चे बचपन में ही प्रदर्शन का दबाव झेलें, जहां उनकी खुशी लाइक्स पर निर्भर हो। जेन अल्फा हमारे भविष्य हैं। अगर 37 प्रतिशत बच्चे इन्फ्लुएंसर बनना चाहते हैं, तो हमें यह सोचना होगा कि बाकी 63 प्रतिशत क्या सीख रहे हैं? क्या हम बच्चों को असली जिंदगी के कौशल सिखा रहे हैं, या सिर्फ उन्हें आभासी दुनिया के सपने दिखा रहे हैं?

यह सवाल इसलिए भी जरूरी हो जाता है, क्योंकि किडफ्लुएंसर्स के अभिभावक इस बात का दावा करते हैं कि सब उनकी निगरानी में हो रहा है। यह भी बताया जाता है कि सिनेमा या टीवी धारावाहिकों में भी तो बच्चे होते हैं? तो फिर उनका बच्चा क्यों नहीं? इसका सरल जवाब है कि सिनेमा संगठित है। यह कई नियमों और कानूनों के दायरे में आता है। वहीं घर-घर कंटेंट बनेगा, तो उसकी निगरानी उतनी ही मुश्किल हो जाएगी। अभिभावक गली-मोहल्ले में बच्चे को सुरक्षा प्रदान कर सकते हैं, पर ऑनलाइन सुरक्षा प्रदान करने जितनी क्षमता या समझ इन अभिभावकों को है? बचपन को कंटेंट बनाने से पहले एक बार सोचें कि क्या यह वाकई जरूरी है? या फिर हम अपनी अगली पीढ़ी को प्लेटफॉर्म इकनॉमी का गुलाम बना रहे हैं?

आखिर में बस इतनी बात कि बचपन किसी प्रदर्शन या आंकड़ों की दौड़ के लिए नहीं होता। यह सीखने, खेलने, सपने देखने और गलतियां करने का समय है। अगर हम बचपन को सिर्फ कंटेंट बनाने का साधन बना देंगे, तो भविष्य में हमारा समाज कितना स्वस्थ, रचनात्मक और खुशहाल रहेगा? यह सवाल हर माता-पिता, हर नीति बनाने वाले और हर सोशल मीडिया प्लेटफॉर्म को खुद से पूछना चाहिए। -edit@amarujala.com
 
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