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समाज भी उन्हें सम्मान दे

Tue, 05 Mar 2019 06:26 PM IST
Kshama Sharma क्षमा शर्मा
Updated Tue, 05 Mar 2019 06:26 PM IST
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Society also respect them
क्षमा शर्मा

कई बार साधारण लोग इतना असाधारण काम करके दिखाते हैं कि सब नतमस्तक हो उठते हैं। ऐसी ही एक घटना हरियाणा के कुरुक्षेत्र जिले के एक गांव में हुई। वहां एक गरीब परिवार में लड़की की शादी थी। लेकिन पिता के पास इतने भी पैसे नहीं थे कि वह बारात का स्वागत –सत्कार कर सके। लड़की की मां का निधन पहले ही हो चुका था। लड़की की मौसी को जब यह बात पता चली, तो वह भी परेशान हो उठी। वह खुद भी गरीब थी। शादी का खर्चा उठाना उसके भी वश की बात नहीं थी।


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एक दिन बातों ही बातों में उसने यह बात अपने परिचित कुछ ट्रांसजेंडरों को बताई। उसकी बातें सुनकर वे लोग द्रवित हो उठे। उन्होंने कहा, कोई बात नहीं, वे इस लड़की के विवाह में मदद करेंगे। लड़की की मौसी से पता लेकर, शादी से पहले नौ ट्रांसजेंडर लड़की की शादी में जा पहुंचे। उन्होंने लड़की के घर जाकर कहा कि वे लड़की के मामा हैं। और अपनी भांजी की शादी में भात देने आए हैं। वहां उन्होंने पांच तोला सोना, पंद्रह तोला चांदी और साढ़े तीन लाख रुपये दिए। इनका वहां तिलक किया गया और खूब स्वागत-सत्कार किया गया। इनकी मदद से एक गरीब परिवार की बेटी का विवाह हो सका।

जब से इस कथा को पढ़ा है, तब से लगातार नरसी भगत और श्रीकृष्ण की कथा याद आती है। आज भी इसे सुनकर इसलिए रोमांच हो आता है कि गरीब की मदद के लिए कोई कितना भी बड़ा हो, उसे भगवान माना जाता हो, उसे सब काम छोड़कर दौड़ना चाहिए जैसे कि श्रीकृष्ण दौड़े। यह कथा श्रीकृष्ण के अनुपम चरित्र को सुदामा की कथा की तरह ही पेश करती है।

हरियाणा के ये नौ लोग तो मामूली इंसान थे। लेकिन इनकी मानवीय सोच कितनी अच्छी थी। जो कुछ उन्होंने किया, उसके लिए उन्हें जितना भी साधुवाद दिया जाए, कम है, क्योंकि ये तो हमारे उस समाज के लोग हैं, जिसके गर्हित सोच के कारण उन्हें इंसान तक नहीं माना जाता। किसी के पौरुष को चुनौती देने के लिए उन्हीं के नाम की गाली दी जाती है। बहुत बार पैदा होते ही माता-पिता उन्हें त्याग देते हैं। यह एक भयानक किस्म का लैंगिक भेदभाव है। जीवन भर ये सिर्फ दूसरों के यहां किसी बच्चे और वह भी लड़के के जन्म पर, या शादी-ब्याह के मौके पर नाच-गाकर रोजी-रोटी कमाते हैं। न इनकी पढ़ाई-लिखाई की चिंता की जाती है, न ही रोजगार की। न ही इलाज की। बहुतों को मजबूरी में यौनकर्मी तक बनना पड़ता है। और तमाम किस्म के यौन अपराधों को झेलना पड़ता है। पुलिस की ज्यादतियों का शिकार होना पड़ता है। लेकिन बदले समय में दुनिया भर में इनकी आवाजों को भी सुना गया है। इनके पक्ष में न्यायालयों और सरकारों ने अहम भूमिका निभाई है। अब उन्हें अपने यहां नौकरियां भी दी जा रही हैं। अब से पहले तो किसी ने सोचा ही नहीं, सोचा भी हो तो जमीनी स्तर पर नहीं उतारा कि उन्हें भी समाज में तरह-तरह से भागीदारी और अपनी भूमिका चाहिए। समाज को नए सिरे से उनकी परिभाषा गढ़ने, उनकी भूमिका को रेखांकित करने की जरूरत है। उनसे जुड़ी कथाओं, घटनाओं को कहने-सुनने की, जिससे कि आज तक जिस तरह से वेे लोग अलग-थलग किए गए हैं, उन्हें अपने में समरस कर लिया जाए। वे सिर्फ हंसने के पात्र न रहें। लक्ष्मी त्रिपाठी जैसे बहुत से रोल मॉडल चाहिए, जो बेधड़क होकर अपनी बात कह सकें। वरिष्ठ लेखिका चित्रा मुदगल के ट्रांसजेंडर पर लिखे उपन्यास नाला सोपारा  को इस साल साहित्य अकादेमी पुरस्कार मिला है। इस तरह की रचनाएं, घटनाएं, ट्रांसजेंडर के महत्व को रेखांकित कर रही हैं, जो बेहद सुखद है। हरियाणा के इन लोगों को सलाम।

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