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बड़े संकट बनते छोटे घरेलू कर्ज: भारत में मध्यम वर्ग की घटती बचत चिंताजनक, अमेरिका-चीन व्यापार युद्ध का असर
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बड़े संकट बनते छोटे घरेलू कर्ज
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अमर उजाला प्रिंट / एडोब स्टॉक
विस्तार
दुनिया की दो बड़ी अर्थव्यवस्थाओं अमेरिका और चीन के बीच जारी व्यापार युद्ध की वजह से वैश्विक अर्थव्यस्था की नींव हिल गई है, लेकिन एक अन्य चिंताजनक खबर यह है कि भारत का मध्यम वर्ग कर्ज की बड़ी भारी समस्या का सामना कर रहा है। यह कोई रहस्य नहीं है, बल्कि ब्रिटेन के प्रतिष्ठित बिजनेस समाचार पत्र द फाइनेंशियल टाइम्स समेत तमाम मीडिया रिपोर्टों में अनेक खबरों के बीच इस खबर को प्रमुखता दी गई है।
हाल के वर्षों में भारत की आर्थिक वृद्धि ने कई बैंकों को शहरवासियों को पर्सनल लोन और क्रेडिट कार्ड देने के लिए प्रेरित किया, लेकिन अब ऐसा लग रहा है कि इसका नकारात्मक पक्ष सामने आ रहा है। यद्यपि भारतीय अर्थव्यवस्था दुनिया में सबसे तेज गति से वृद्धि करने की अपनी बढ़त को बरकरार रखे हुए है, फिर भी कई अर्थशास्त्री समय-समय पर चेताते रहे हैं कि इस आर्थिक वृद्धि को सीमित आबादी द्वारा ही संचालित किया जा रहा है। शहरी क्षेत्रों में जो समृद्ध जीवनशैली दिखती है, वह अक्सर कर्ज आधारित होती है। तार्किक रूप से, ऋण से वित्तपोषित उपभोग तात्कालिक मांग में वृद्धि करता है और सीमित समय के लिए अर्थव्यवस्था की मांग संबंधी बाधाओं को कम करता है। खासकर विभिन्न वित्तीय संसाधनों और तकनीकी नवाचारों ने आम आदमी को वस्तु और सेवा के लिए ऋण की उपलब्धता को आसान बना दिया है, जबकि एक समय खर्च करने योग्य आमदनी (डिस्पोजेबल इन्कम) पर कर्ज लेना उनकी पहुंच से परे था। लेकिन इसका एक स्याह पक्ष भी है, विशेषकर जब बचत में कमी आती है। इस समय घरेलू बचत अपने पचास वर्ष के सबसे निचले स्तर पर आ गई है।
मिंट की रिपोर्ट के मुताबिक, ‘केंद्रीय बैंक के आंकड़ों के अनुसार, कोविड-19 संकट आने के एक साल बाद और भयावह ‘दूसरी लहर’ के दौरान जून 2021 में परिवारों की वित्तीय देनदारियां या उधारी 77,000 अरब रुपये थी, जो मार्च 2024 तक 56 फीसदी बढ़कर 1,20,000 अरब रुपये हो गई।’ भारत का घरेलू ऋण अन्य उभरते बाजारों पोलैंड, मेक्सिको और दक्षिण अफ्रीका जैसे देशों की तुलना में अधिक है, जबकि उनकी प्रति व्यक्ति आय हमसे ज्यादा है। लोन एप और बॉलीवुड कलाकारों द्वारा किए गए ‘अभी खरीदें और बाद में भुगतान करें’ जैसी ललचाने वाली योजनाओं के प्रचार के माध्यम से कर्ज आसानी से उपलब्ध हो रहा है। कई भारतीयों की आमदनी का तीस फीसदी से ज्यादा हिस्सा ईएमआई भरने में चला जाता है, जो परंपरागत रूप से रूढ़िवादी वित्तीय आदतों में बदलाव का बड़ा संकेत है। विशेषकर कम आमदनी वाला तबका कोई संपत्ति बनाने के बजाय अपने उपभोग के लिए इस तरह के असुरक्षित कर्ज ले रहा है।
कर्ज लेना कोई नई प्रवृत्ति नहीं है, लेकिन कोरोना महामारी के बाद यह काफी बढ़ गई है। कोरोना काल में कई लोगों की नौकरियां चली गईं और एकदम उनकी आमदनी बंद हो गई थी तथा कई लोगों की आय घट गई थी। लगभग उसी दौरान आसान ऋण और डिजिटल लोन एप का चलन तेजी से बढ़ा। इससे लोगों ने अपनी जीवनशैली को बरकरार रखने, जरूरतों को पूरा करने और शेयर बाजार में निवेश करने के लिए उधार लिया, जिससे घरेलू कर्ज बढ़ गया। नवंबर 2023 में आरबीआई ने असुरक्षित कर्जों पर ‘जोखिम भार’ बढ़ा दिया। सीधे शब्दों, में यह चेतावनी थी कि असुरक्षित कर्ज देने पर अंकुश लगाओ। पर्सनल लोन एक तरह से बेलगाम गाड़ी की तरह दौड़ रहे थे। बीते पांच वर्षों में पर्सनल लोन पर विलंब भुगतान के मामले दोगुने हो गए हैं।
इसी महीने, गुजरात के साबरकांठा जिले के वडाला में कर्ज में डूबे एक परिवार के चार सदस्यों ने जहरीला पदार्थ निगलकर खुदकुशी कर ली। उस परिवार ने यह आत्मघाती कदम स्थानीय सूदखोरों द्वारा कर्ज वसूली के लिए दी जा रही धमकियों के दबाव में आकर उठाया। इस वर्ष फरवरी में महाराष्ट्र के राजगढ़ जिले के अलीबाग में एक पचास वर्षीय स्कूल शिक्षक ने अटल सेतु से कूदकर अपनी जान दे दी थी। शिक्षक ने तत्काल लोन देने वाले एप से 12,000 रुपये कर्ज लिया था, जिसका वह समय पर पुनर्भुगतान नहीं कर सके थे। आरोप है कि लोन एप के एजेंट ने शिक्षक की तस्वीर से छेड़खानी कर उसके परिवार को भेज दी थी। जब मैं यह लेख लिख रही थी, तब मध्य प्रदेश के बैरागढ़ स्थित वेयरहाउस में एक 22 वर्षीय युवक ने खुदकुशी कर ली। पुलिस ने बताया कि मौके पर कोई सुसाइड नोट नहीं मिला था, लेकिन पता चला है कि उसने अपने निर्माणाधीन मकान के लिए भारी कर्ज लिया हुआ था। ऐसी कई त्रासदियां हैं। भारत में घरेलू ऋण संकट न केवल वित्तीय मुद्दा है, बल्कि एक सामाजिक और आर्थिक खतरे की घंटी है। हमें इस संकट को दूर करने के लिए राष्ट्रीय स्तर पर कदम उठाने की जरूरत है।