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जानना जरूरी है: शिव कथा से पापिनी चंचुला बनी मुक्तात्मा, संस्कृति के पन्नों से जानें पूरी कहानी

Sun, 15 Jun 2025 06:39 AM IST
Ashutosh Garg आशुतोष गर्ग
Updated Sun, 15 Jun 2025 06:39 AM IST
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सार
चंचुला भी कुमार्ग पर चल पड़ी थी। उसने एक बार कथा सुनी कि परपुरुष का गमन करने वाली स्त्री को घोर यातनाएं मिलती हैं। उसने कथा वाचक से मुक्ति का उपाय पूछा, तो उन्होंने भगवान शिव की भक्ति की सलाह दी।
 
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sinful soul chanchula  becomes free Through story of Shiv
सांकेतिक तस्वीर। - फोटो : अमर उजाला प्रिंट

विस्तार

किसी समय एक बिंदुग नामधारी ब्राह्मण रहता था। वह बड़ा अधम, दुरात्मा और महापापी था। हालांकि, उसकी स्त्री बड़ी सुंदरी थी, फिर भी वह कुमार्ग पर चलता था। उसकी पत्नी का नाम चंचुला था। वह सदा उत्तम धर्म के पालन में लगी रहती थी, मगर उसे छोड़कर बिंदुग वेश्यागामी हो गया था। कुकर्म में लगे हुए बिंदुग के बहुत वर्ष व्यतीत हो गए। उसकी स्त्री चंचुला काम से पीड़ित होने पर भी स्वधर्म-नाश के भय से क्लेश सहकर दीर्घकाल तक धर्म से भ्रष्ट नहीं हुई। परंतु दुराचारी पति के आचरण से प्रभावित होकर आगे चलकर वह भी दुराचारिणी हो गई।



वर्षों तक दोनों पापाचार में डूबे रहे। अंत में बिंदुग की मृत्यु हो गई। वह नरक में भयंकर यातनाएं झेलकर एक दिन पिशाच के रूप में विंध्य पर्वत पर पैदा हुआ। चंचुला अपने घर में पुत्रों के साथ रहने लगी, लेकिन भीतर से वह व्याकुल रहती थी। उसका जीवन पाप की छाया में डूब चुका था। एक दिन, किसी अच्छे समय में वह तीर्थ यात्रा पर निकली। वह गोकर्ण क्षेत्र पहुंची, जहां उसने पवित्र तीर्थों में स्नान किया और मंदिरों के दर्शन किए। वहीं एक मंदिर में, एक साधु भगवान शिव की पावन कथा सुना रहे थे। कथावाचक कह रहे थे कि ‘जो स्त्रियां परपुरुषों के साथ व्यभिचार करती हैं, वे मरने के बाद जब यमलोक में जाती हैं, तब यमराज के दूत उनको घोर यातनाएं देते हैं।’ ब्राह्मण साधु के मुख से यह वैराग्य बढ़ाने वाली कथा सुनकर चंचुला भय से व्याकुल होकर कांपने लगी। भय और ग्लानि से उसका हृदय भर आया।


कथा के बाद वह ब्राह्मण के पास गई और रोते हुए बोली, ‘मैं पाप के मार्ग पर चली। मैंने धर्म का त्याग किया और अब मुझे अपने पापों का भय सताने लगा है। मुझे बचा लीजिए! आपकी इस कथा ने मेरी आत्मा को झकझोर दिया है।’

ब्राह्मण ने उसे करुणा से उठाया और बोले, ‘नारी! यह सौभाग्य की बात है कि समय रहते तुम्हारा हृदय पश्चात्ताप से भर गया। शिव की कृपा से सब पाप नष्ट हो जाते हैं। पश्चात्ताप ही सबसे बड़ा प्रायश्चित है। जैसे दर्पण को साफ करने से वह चमक उठता है, वैसे ही शिवपुराण की कथा मन को निर्मल करती है। इससे पूर्णतया चित्तशुद्धि हो जाती है। चित्तशुद्धि होने से महेश्वर की भक्ति अपने दोनों पुत्रों (ज्ञान और वैराग्य) के साथ निश्चय ही प्रकट होती है। तत्पश्चात महेश्वर के अनुग्रह से दिव्य मुक्ति प्राप्त होती है-इसमें संशय नहीं है।’ चंचुला उनके चरणों में गिर पड़ी और हाथ जोड़कर बोली, ‘हे ब्राह्मण देव! आप धन्य हैं। कृपा करके मुझे यह कथा सुनाइए।’ इसके बाद वह ब्राह्मण की सेवा में लग गई और प्रतिदिन कथा सुनने लगी। ब्राह्मण ने उसे भक्ति, ज्ञान और वैराग्य से युक्त शिव कथा सुनाई। कथा के साथ-साथ चंचुला का हृदय शुद्ध होता गया। उसके पापों का बोझ हल्का होने लगा। अब उसका जीवन तपस्विनी की भांति शुद्ध और शांत हो गया। वह भगवान शिव के स्वरूप का ध्यान करने लगी और संसार से उसका मोह छूट गया।

जब अंत समय आया, तो वह पूर्ण पवित्र हो चुकी थी। जब उसने शरीर त्यागा, उसी समय आकाश से एक दिव्य विमान उतरा। वह रत्नजड़ित विमान स्वयं भगवान शिव ने भेजा था। उसमें शिवगण सवार थे। वह विमान चंचुला को सम्मानपूर्वक शिवलोक ले गया। चंचुला का रूप दिव्य हो चुका था-आभूषणों से सजा शरीर, तेजस्वी मुख और सिर पर अर्धचंद्रयुक्त मुकुट। शिवलोक में पहुंचकर उसने त्रिनेत्रधारी, भस्मधारी महादेव के दर्शन किए। उनके चारों ओर गणेश, नंदी, भृंगी और वीरभद्र सेवा में उपस्थित थे। विद्युत के समान चमकती हुईं पार्वती जी उनके वामभाग में विराजित थीं।

यह दृश्य देखकर चंचुला का हृदय आनंद से भर गया। उसने शिव-पार्वती को बार-बार प्रणाम किया। उसके नेत्रों से आनंदाश्रु बह निकले और सारा शरीर रोमांच से भर उठा। फिर भगवती पार्वती ने उसे प्रेम से बुलाया और सखी बनाकर अपने साथ रख लिया। इस तरह वह शिवकृपा से पापों से मुक्त होकर सदा के लिए परम धाम में निवास करने लगी। चंचुला शिवलोक में निवास करती है-जहां न दुःख है, न मृत्यु, क्योंकि वहां केवल आनंद, भक्ति और शांति है।

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