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Hindi News ›   Columns ›   Opinion ›   Shiva as Arunachaleshwar radiance of Mahadev in Sthavara-lingam Annamalaiyar Temple Tiruvannamalai Tamil Nadu

जानना जरूरी है: शिव कैसे कहलाए अरुणाचलेश्वर? स्थावरलिंग में महादेव का प्रचंड तेज

Sun, 04 Oct 2026 04:31 AM IST
Ashutosh Garg आशुतोष गर्ग
Updated Sun, 04 Oct 2026 04:31 AM IST
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सार
ब्रह्मा व विष्णु जी ने महादेव से निवेदन किया कि वह अपने प्रचंड तेज को समेटकर ‘अरुणाचल’ नाम से स्थावरलिंग के रूप में स्थित हों। महादेव मान गए। 
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Shiva as Arunachaleshwar radiance of Mahadev in Sthavara-lingam Annamalaiyar Temple Tiruvannamalai Tamil Nadu
अरुणाचलेश्वर महादेव के मंदिर से जुड़ी कथा - फोटो : अमर उजाला ग्राफिक्स

विस्तार

नैमिषारण्य में एक दिन मुनियों ने सूतजी से अरुणाचल तीर्थ के माहात्म्य के विषय में पूछा, तो सूतजी ने उन्हें एक कथा सुनाई। यह उस समय की कथा है, जब भगवान ब्रह्मा सत्यलोक में कमलासन पर विराजमान थे। महात्मा सनक ने उन्हें प्रणाम करके पूछा, ‘भगवन! भूमंडल पर अनेक शिवलिंग हैं, पर उनमें वह कौन-सा दिव्य स्वरूप है, जिसकी महिमा अपरिमित है, जिसके नाम-स्मरण से ही पापों का नाश होता है, जिसका दर्शन जीव को कृतार्थ कर देता है और जो स्वयं भगवान शिव का अविनाशी तेज है?’



सनक की जिज्ञासा से प्रसन्न होकर ब्रह्मा जी ने कहा, ‘पुत्र! तुम्हारे प्रश्न ने मेरे हृदय में पुरातन शिवयोग की स्मृति जगा दी है। मैं तुम्हें उस अद्भुत शैव तेज की कथा सुनाता हूं, जो पूर्वकाल में समस्त पापों का नाश करने के लिए प्रकट हुआ था।’ और तब ब्रह्मा जी ने सनक को यह कथा सुनाई।


एक समय ब्रह्मा जी और भगवान विष्णु के सामने एक अग्निमय स्तंभ प्रकट हुआ। वह इतना विशाल था कि उसका न आदि दिखाई देता था, न अंत। दोनों उस अनंत तेज को देखकर समझ गए कि वह स्तंभ स्वयं महादेव का स्वरूप है। ब्रह्मा जी ने शिवजी की स्तुति करते हुए प्रार्थना की, ‘प्रभो! आप ही संपूर्ण सृष्टि के कारण हैं और आपसे ही सब कुछ प्रकाशित होता है। आपका यह तेज उन लोगों को दिखाई नहीं देता, जिन्हें आपकी कृपा प्राप्त नहीं है। हम पर कृपा कीजिए और अपने दिव्य रूप का दर्शन कराइए।’

इसी तरह श्रीहरि ने भी भोलेनाथ की महिमा का गान किया और बोले, ‘महादेव! आपकी कृपा से ही सबको ज्ञान, ऐश्वर्य और शक्ति प्राप्त होती है। जैसे भ्रमर किसी कीट को अपने स्वरूप के समान बना देता है, वैसे ही आप भी अपने तुच्छ भक्त को अपनी कृपा से महान बना देते हैं। कृपया, अपने प्रचंड तेज को समेट लीजिए, ताकि समस्त लोक सुरक्षित रह सके।’

दोनों की स्तुति से महादेव प्रसन्न हो गए और फिर उसी अग्निमय स्तंभ से नीलकंठ, गौरवर्ण पुरुषरूप में प्रकट हुए। उनके मस्तक पर अर्धचंद्र सुशोभित था और हाथों में दिव्य आयुध थे। 

उन्होंने ब्रह्मा और विष्णु जी से कहा, ‘मैं आपकी भक्ति से प्रसन्न हूं। जो वर चाहो, मांग लो।’

दोनों देवताओं ने निवेदन किया कि भगवान अपने प्रचंड तेज को समेटकर ‘अरुणाचल’ नाम से स्थावरलिंग के रूप में स्थित हों, ताकि समस्त प्राणी उसकी उपासना कर सकें। उन्होंने यह भी प्रार्थना की कि जो मनुष्य श्रद्धापूर्वक अरुणाचल के ज्योतिर्मय स्वरूप को प्रणाम करे, वह पापों से मुक्त होकर ऐश्वर्य, सौभाग्य और अंततः मोक्ष प्राप्त करे। भगवान शिव ने ‘तथास्तु’ कहा और अपने अनंत तेज को अरुणाचल पर्वत के स्थावर रूप में प्रतिष्ठित कर दिया।
इस प्रकार महादेव, अरुणाचलेश्वर के रूप में पृथ्वी पर प्रकट हुए। अरुणाचल की महिमा मेरु, कैलाश और मंदराचल से भी अधिक बताई जाती है। वहां गौतम ऋषि ने हजारों वर्षों तक तपस्या करके सदाशिव का साक्षात्कार किया था। स्वयं देवी पार्वती ने भी इसी क्षेत्र में कठोर तपस्या की और शिव के शरीर में वामार्द्ध स्थान प्राप्त किया। गौरी ने वहां अरुणाचलेश्वर लिंग की स्थापना की, जो भक्तों को मोक्ष प्रदान करता है। भगवान शिव का अरुणाचलेश्वर मंदिर, वर्तमान तमिलनाडु के तिरुवन्नामलई जिले में स्थित है।

यह कथा सुनाकर ब्रह्मा जी ने ऋषि सनक से कहा, ‘अरुणाचल का दर्शन और प्रणाम अनेक तीर्थों में स्नान तथा यज्ञों के अनुष्ठान के समान फल देने वाला है। जो श्रद्धा से उसकी प्रदक्षिणा करते हैं, तपस्या और नियमों से उसकी आराधना करते हैं, उन पर भगवान शिव विशेष प्रसन्न होते हैं। कलियुग के दोष भी अरुणाचलेश्वर की भक्ति करने वाले को प्रभावित नहीं करते। इसलिए, अरुणाचल का स्मरण, दर्शन और पूजन भगवान शिव की कृपा प्राप्त करने का अत्यंत पवित्र मार्ग है।’

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