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चुनाव आयोग के मतभेदों से उठे सवाल, विश्वसनीयता पर जवाब जरूरी
Fri, 25 Sep 2026 07:28 AM IST
नितिन गौतम
अमर उजाला, नई दिल्ली
अमर उजाला, नई दिल्ली
Published by: नितिन गौतम
Updated Fri, 25 Sep 2026 07:28 AM IST
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चुनाव आयोग में मतभेद?
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अमर उजाला ग्राफिक्स
विस्तार
चुनाव आयोग के भीतर से जो खबर निकलकर सामने आई है, वह बेहद दुर्भाग्यपूर्ण तो है ही, उससे कहीं अधिक गंभीर इसलिए है कि वह देश की उस सांविधानिक संस्था की कार्यप्रणाली पर सवाल खड़े करती है, जिस पर स्वतंत्र, निष्पक्ष व पारदर्शी चुनाव कराने और लोकतंत्र में जनता का भरोसा बनाए रखने की भी अहम जिम्मेदारी है। एक मीडिया रिपोर्ट के अनुसार, चुनाव आयुक्त सुखबीर सिंह संधू और विवेक जोशी ने पिछले दस महीनों में कम से कम 14 बार चुनाव आयोग के फैसलों पर आपत्ति जताई। इतना ही नहीं, मुख्य चुनाव आयुक्त ज्ञानेश कुमार ने बाकी दोनों आयुक्तों की जानकारी के बगैर भी कई फैसले लिए। इस वजह से उन आयुक्तों को कैबिनेट सचिव को शिकायत भेजनी पड़ी। सवाल उठता है कि जब चुनाव आयोग एक सांविधानिक संस्था है, तो उसके दो सदस्यों को आपत्तियां दर्ज कराने के लिए कैबिनेट सचिव का रुख क्यों करना पड़ा?चुनाव आयोग कैबिनेट सचिव के प्रति उत्तरदायी नहीं है। व्यवस्था के अनुसार, तीन सदस्यीय चुनाव आयोग के निर्णय बहुमत से होते हैं। सवाल यह भी है कि अगर ज्ञानेश कुमार बगैर अन्य चुनाव आयुक्तों की जानकारी या सहमति के निर्णय ले रहे थे, और बाकी दोनों चुनाव आयुक्त अपनी आपत्ति भी दर्ज करा रहे थे, तो आखिर ये निर्णय हो कैसे गए? आयोग ने अपना पक्ष रखते हुए कहा है कि आंतरिक नोट, सवाल और अलग-अलग राय निर्णय प्रक्रिया का सामान्य हिस्सा हैं और आयोग के सभी आदेश तथा सुधार सर्वसम्मति से किए गए हैं।
ध्यान रहे यह स्पष्टीकरण ज्ञानेश कुमार का नहीं, चुनाव आयोग का है, जिस पर अब तक किसी चुनाव आयुक्त का खंडन भी सामने नहीं आया है। आयोग के भीतर मतभेद पहली बार सार्वजनिक नहीं हुए हैं। इससे पहले भी मुख्य चुनाव आयुक्त और चुनाव आयुक्तों के बीच गंभीर मतभेद खुलकर सामने आते रहे हैं। इसलिए, केवल असहमति को संस्थागत संकट मान लेना उचित नहीं होगा। विपक्षी दलों को इस मुद्दे पर सहज ही सरकार व आयोग पर हमलावर होने का मौका मिल गया है। लेकिन, इस पूरे घटनाक्रम को राजनीतिक आरोप-प्रत्यारोप में बदल देने के बजाय सही दिशा देना उचित होगा। एक सांविधानिक संस्था पर संशय के बादल नहीं होने चाहिए, लेकिन एक व्यक्ति के बहाने पूरी प्रक्रिया को ही संदिग्ध बनाने की कोशिश उस संस्था को गहरी चोट पहुंचा सकती है। सवाल उठ रहे हैं, तो जवाब मिलने ही चाहिए, क्योंकि चुनाव आयोग की विश्वसनीयता पूरे लोकतांत्रिक तंत्र के भरोसे का प्रश्न भी है।