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पड़ोसियों से सुरक्षा का साझा

Wed, 27 Jun 2018 05:20 PM IST
अवधेश कुमार
अवधेश कुमार Updated Wed, 27 Jun 2018 05:20 PM IST
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Shared security with neighbors
अवधेश कुमार
भारत की समस्या यह रही है कि आतंकवाद और उग्रवाद ही नहीं, ऐसे अपराध, जिनके आका दूसरे देशों में बैठे हैं, उनके खिलाफ लड़ाई में वह हमेशा अकेला रहा है। भारत लंबे समय से इसकी कोशिश करता रहा है कि पड़ोसी देशों के साथ रक्षा-सुरक्षा सहयोग का ऐसा औपचारिक ढांचा खड़ा हो सके, जो आवश्यकता पड़ने पर स्वतः सक्रिय हो जाए। कई कारणों से अभी तक इसमें सफलता नहीं मिल सकी थी। भारत के लंबे प्रयासों के बाद हमारे छह पड़ोसी देशों के बीच रक्षा सहयोग कायम होने की शुरुआत हो गई है।

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यह पहली बार होगा, जब भारत की सेना श्रीलंका, बांग्लादेश, भूटान, नेपाल, थाईलैंड और म्यांमार की सेनाओं के साथ युद्धाभ्यास करेगी। ये सारे बिम्स्टेक यानी बे ऑफ बंगाल इनिशिएटिव फॉर मल्टी सेक्टोरल टेक्निकल एंड इकोनॉमिक कोऑपरेशन के देश हैं। 10 से 16 सितंबर तक यह सैन्य अभ्यास पुणे में आयोजित किया जाएगा। 

चूंकि भारत इस समय दुनिया की एक प्रमुख सामरिक शक्ति है और कई देशों के साथ वह युद्धाभ्यास लंबे समय से करता आया है, इसलिए यह हमें शायद कोई बड़ी घटना न लगे। वैसे भी इसमें सैनिकों की संख्या उतनी ज्यादा नहीं होगी, जैसी भारत अमेरिका या भारत-रूस या फिर भारत-जापान, ऑस्ट्रेलिया आदि के साथ सैन्य अभ्यासों में होती है।

किंतु उन रक्षा अभ्यासों तथा इन छह देशों के साथ होने वाले रक्षा अभ्यास में मौलिक अंतर है। उन देशों के साथ भारत के रक्षा संबंध काफी आगे बढ़ चुके हैं। इसके समानांतर इन देशों में कोई भी प्रमुख रक्षा शक्ति नहीं है। भूटान तो अपनी रक्षा के लिए हम पर ही निर्भर है। नेपाल की सुरक्षा का अभी तक मुख्य दायित्व भारत का ही रहा है। उसकी सेनाओं को प्रशिक्षण भारत में मिलता है। 

हमारे यहां के आतंकवाद, उग्रवाद और बड़े अपराधों से इन पड़ोसी देशों का सीधा रिश्ता है। जब भी इनसे सहयोग हुआ, इसका असर हुआ है। उदाहरण के लिए भारतीय सेना ने भूटान की अनुमति से जब उसके यहां ऑपरेशन किया, तो असम के उग्रवादियों की कमर टूट गई। उसी तरह बांग्लादेश में बेगम खालिदा जिया की सरकार भारत विरोधी रवैये के कारण कोई सहयोग नहीं कर रही थी। शेख हसीना के प्रधानमंत्री बनने के साथ स्थितियां बदलीं और वहां से उग्रवादी भारत को सौंपे गए।

थाइलैंड हमारा सीधा पड़ोसी नहीं है, लेकिन वह उग्रवादियों और अंडरवर्ल्ड अपराधियों के लिए आश्रयस्थल जैसा है। वहीं हाल के वर्षों में अनेक बड़े आतंकवादी तथा अपराधी नेपाल से भी पकड़े गए हैं। कहने का तात्पर्य यह कि इन देशों के बीच रक्षा-सुरक्षा सहयोग, आतंकवाद-उग्रवाद तथा बड़े अपराधों को खत्म करने की दृष्टि से महत्वपूर्ण होंगे। जाहिर है, इनमें से कोई देश अकेले इन पर काबू नहीं पा सकता।
 
जैसा हम जानते हैं केवल युद्धाभ्यास से स्थायी औपचारिक सहयोग की स्थिति नहीं हो सकती। इसलिए युद्धाभ्यास लगातार हो, जिससे कि दूसरे देशों की सेनाएं भी आतंकवाद से निपटने में सक्षम हो सकें। इसके साथ एक औपचारिक सुरक्षा मंच का निर्माण भी जरूरी है।

सूचना है कि युद्धाभ्यास के बीच ही 15 और 16 सितंबर को इन सभी देशों के सेना प्रमुखों का एक सम्मेलन होगा। इसमें युद्धभ्यास की समीक्षा तो होगी ही, इस संभावना पर भी विचार होगा कि क्या एक क्षेत्रीय सुरक्षा मंच बनाया जाए, ताकि मिल-जुलकर आतंकवाद एवं सीमा पार अपराधों से मुकाबला किया जाए। उम्मीद करनी चाहिए कि इस दिशा में भारत के अब तक के किए गए प्रयास सफल होंगे और ऐसे मंच पर सहमति बन जाएगी। ऐसा हुआ, तो यह एक ऐतिहासिक घटना होगी। इसके बाद इसे सेना के साथ पुलिस सहयोग के मंच में भी परिणत करना होगा। 
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