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बसे हैं नदियों के रास्ते में और चिंता बाढ़ की
अंबरीश कुमार
Updated Fri, 12 Sep 2014 08:43 PM IST
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उत्तराखंड में केदारनाथ हादसे के बाद कश्मीर की बाढ़ ने फिर चेतावनी दी है प्रकृति से छेड़छाड़ के घातक नतीजों की। आज सभी बाढ़ की वजह से उन नदियों को कोसते नजर आ रहे है, जो हमें जीवन देती हैं। नदियों को लेकर अपने समाज की परंपरागत दृष्टि ऐसी नहीं रही है। दो दशक पहले तक देश के कई अंचल में लोग बाढ़ का स्वागत करते थे।
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एक समय बागमती नदी की बाढ़ का बिहार में इंतजार होता था। जिस साल समय पर बाढ़ न आए, उस साल पूजा-पाठ किया जाता था। यह परंपरा मुजफ्फरपुर से लेकर दरभंगा-सीतामढ़ी तक थी। यही वजह है कि बिहार के इस अंचल में भोजपुरी कहावत रही है 'बाढ़े जियली-सुखाड़े मरली।' यानी बाढ़ से जीवन है और सूखे से मौत। यह गांव के समाज का नदी और बाढ़ से वह रिश्ता था, जो आज की पीढ़ी समझ नहीं पाती। बागमती नेपाल से बरसात में अपने साथ उपजाऊ मिटटी लाती रही है, जो बिहार के कई जिलों के किसानों की खुशहाली की वजह भी रही है। बाढ़ और नई मिट्टी से गांव में तालाब के किनारे की जगह ऊंची होती थी और तालाब भर भी जाता था। रेन वॉटर हार्वेस्टिंग का प्रचलन आज हुआ है, पर बाढ़ के पानी को रोकने की यह प्रणाली बहुत पुरानी है।
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लेकिन अब बाढ़ को बरसात के दिनों में शोक बताया जा रहा है और अपनी जिम्मेदारी से बचते हुए इसका ठीकरा दूसरे पर फोड़ दिया जाता है। हाल में उत्तर प्रदेश के मुख्यमंत्री अखिलेश यादव बहराइच जिले के बाढ़ग्रस्त इलाकों का दौरा करने गए, तो टिप्पणी की कि नेपाल ने ज्यादा पानी छोड़ दिया, जिससे यह समस्या पैदा हुई। जबकि हाल का हादसा नेपाल में बादल फटने से हुआ था, बांध का पानी छोड़े जाने से नहीं। भारत-नेपाल सीमा पर तराई के इलाके में जब भी बाढ़ आती है, तो इसी तरह की बात सुनाई पड़ती है। नदियों को लेकर पड़ोसी देशों की यही समस्या है। इस बार पकिस्तान ने भी यही आरोप भारत पर मढ़ दिया। उत्तर बिहार में जब भी बाढ़ आती है, तो नेपाल निशाने पर होता है। जबकि यह नहीं भूलना चाहिए कि अगर नेपाल पानी रोकेगा, तो वह और खतरनाक होगा।
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दरअसल हर नदी की एक निर्धारित जमीन होती है, जिसमें वे बढ़ती-घटती है। इसे नदी का खादर कहते हैं। नदी सौ साल बाद भी अपनी इस जमीन पर हक जमा लेती है, जैसा कि बिहार में कोसी ने दिखा दिया है। वह सौ साल पुराने रास्ते पर लौट चुकी है। पर अब सभी जगह नदियों के खादर की जमीन पर कब्जा होता जा रहा है। केदारनाथ का हादसा हो या उत्तर बिहार या जम्मू-कश्मीर का-सभी जगह खादर पर अतिक्रमण और नदियों को बांधना घातक साबित हुआ है। लखनऊ में गोमती को बांध दिया गया है और उसके खादर के इलाके यानी गोमती नगर में बड़े पैमाने पर निर्माण हो चुका है।
पहले लोग खादर की जमीन पर खेती या बागवानी तो करते थे, पर पक्का निर्माण नहीं करते थे, जिस कारण बाढ़ से कोई बड़ा नुकसान नहीं होता था। पर केदारनाथ से रामबाड़ा तक लोगों ने नदी के रास्ते में निर्माण किया, तो प्रकृति ने एक झटके में उसे साफ कर दिया। कश्मीर में झेलम पर बने हाउस बोट की आपूर्ति लाइन जमीन से जुड़ी होती है और वह इतनी लचीली बनाई जाती है कि एक-डेढ़ फुट पानी बढ़ने पर कोई दिक्कत न आए। पर इस बार ज्यादा पानी बढ़ा, तो व्यवस्था ध्वस्त हो गई। यानी हाउस बोट बनाने वालों ने यह सोचा ही नहीं था कि नदी में इतना पानी कभी आ सकता है। नदी को बांध देने से और निकासी की व्यवस्था न होने से बाढ़ तो मुसीबत बनेगी ही।
(लेखक वरिष्ठ पत्रकार हैं)