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सेवा ही असली भक्ति है
शिवकुमार गोयल
Updated Thu, 17 Oct 2013 07:01 PM IST
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महिला संत राबिया पशु-पक्षियों, असहायों और रोगियों की सेवा में हमेशा तत्पर रहा करती थीं। यात्रा करती हुई एक बार वह मक्का पहुंचीं। एक दिन इब्राहिम उनके सत्संग के लिए पहुंचे। उन्होंने देखा कि संत राबिया एक बीमार कुत्ते के घाव पर मलहम लगा रही हैं।
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इब्राहिम उनकी भावना देख अत्यंत प्रभावित हुए। उन्होंने पूछा, आप इबादत के क्षेत्र में बहुत ऊपर पहुंच गई हैं। आपकी इस सफलता का रहस्य क्या है?
राबिया ने कहा, जहां तक बंदगी की बात है, मैं नमाज दिन में एक बार ही अदा कर पाती हूं, अधिकतर समय खुदा के बंदों की खिदमत में लगाती हूं। मक्का तक पहुंचने में मुझे पांच वर्ष लग गए। रास्ते भर राहगीरों, अपंगों-बीमारों की सेवा करती रही। मैं सेवा को ही खुदा की नेक बंदगी मानती हूं।
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मैं नमाज अता करते समय यही प्रार्थना करती हूं कि जब तक जिस्म जिंदा है, ऐसे ही जरूरतमंदों की सेवा करती रहूं। कुछ क्षण रुककर उन्होंने फिर कहा, मैंने पग-पग पर यह अनुभव किया है कि दूसरों की सेवा में जो संतोष मिलता है, वह शरीर से सुख भोगने पर नहीं मिलता।
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राबिया की सफलता का रहस्य इब्राहिम समझ गए। उन्होंने अपनी जीवनचर्या बदल दी। अब वह प्रतिदिन रोगियों और अपंगों की सेवा करने में लग गए। उन्हें स्वतः अनुभूति होने लगी कि खुदा उन पर पहले से अधिक दया की वर्षा करने लगे हैं।