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Supreme Court : 'कंगारू कोर्ट' के दौर में सांविधानिक अदालतें, प्रधान न्यायाधीश एनवी रमण की टिप्पणी के मायने

Wed, 27 Jul 2022 07:07 AM IST
virag gupta विराग गुप्ता
Updated Wed, 27 Jul 2022 07:07 AM IST
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सार
आजादी (Freedom) के बाद 75 सालों में न्यायपालिका के विकास को तीन हिस्सों में समझा जा सकता है। शुरुआती दौर में स्वतंत्र न्यायपालिका (Court) को आपातकाल में इंदिरा सरकार ने हस्तगत करने का प्रयास किया। उसके बाद गठबंधन सरकारों के दौर में कॉलेजियम की आड़ में जजों की नियुक्ति पर एकाधिकार हासिल कर लिया।
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Supreme Court CJI NV Raman Kangaroo Court remark meaning
CJI NV Ramana - फोटो : ANI

विस्तार

रिटायरमेंट के पहले सुप्रीम कोर्ट के प्रधान न्यायाधीश एनवी रमण के कई बयानों ने बर्र के छत्ते को छेड़ दिया है। मुकदमों के बोझ से लदी न्यायपालिका के सामने कमजोर इन्फ्रास्ट्रक्चर, जजों की कमी और जजों की सुरक्षा पर उन्होंने चिंता जाहिर की। परंतु उनकी सबसे बड़ी बेचैनी सोशल मीडिया के माध्यम से चल रही 'कंगारू कोर्ट' के बढ़ते प्रचलन पर है, जिससे अधिकांश जज त्रस्त चल रहे हैं। टीवी चैनलों और सोशल मीडिया में उत्तेजक बहसों से क्या न्यायपालिका पर दबाव पड़ता है? 



सेलिब्रिटीज और बड़े आपराधिक मामलों में मीडिया ट्रॉयल (Media Trail) से क्या न्यायिक व्यवस्था प्रभावित होती है? अनेक चर्चित मामलों की सुनवाई और फैसलों से इन सवालों का जवाब हां में दिया जा सकता है। इसके बाद सबसे मौजूं सवाल यह है कि क्या न्यायपालिका से आम जनता की उम्मीदें धुंधली हो गई हैं? इस सवाल के जवाब के लिए नवनिर्वाचित राष्ट्रपति द्रौपदी मुर्मू (Droupadi Murmu) के सबसे अहम बयान पर गौर करना जरूरी है, जिसमें उन्होंने वंचित वर्ग के उत्थान के लिए सबके प्रयास और सबके कर्तव्य का आवाहन किया है। 


आजादी के 75वें साल में देश के गणतंत्र और सांविधानिक व्यवस्था का लेखा-जोखा करना जरूरी है। इससे दो बातें साफ होती हैं। पहला-रिपोर्ट कार्ड में फेल विधायक, सांसद, मंत्री, मुख्यमंत्री और प्रधानमंत्री समेत किसी भी नेता को जनता पांच साल बाद खारिज कर सकती है। अफसरों के खिलाफ मुकदमा और बर्खास्तगी भी आम बात हो गई है। लेकिन न्यायपालिका अब भी औपनिवेशिक आग्रहों से घिरी है। इसकी वजह से संविधान की प्रस्तावना में जनता के कल्याण का सपना अधूरा है। 

आजादी के बाद 75 सालों में न्यायपालिका के विकास को तीन हिस्सों में समझा जा सकता है। शुरुआती दौर में स्वतंत्र न्यायपालिका को आपातकाल के दौरान इंदिरा सरकार ने हस्तगत करने का प्रयास किया। उसके बाद गठबंधन की सरकारों के दौर में न्यायपालिका ने कॉलेजियमप्रणाली की आड़ में जजों की नियुक्ति पर एकाधिकार हासिल कर लिया। तीसरा चरण 2015 से शुरू होता है, जब सुप्रीम कोर्ट ने एनजेएसी (राष्ट्रीय न्यायिक नियुक्ति आयोग) कानून को रद्द कर दिया। 

फैसले में शामिल एक जज ने नियुक्ति व्यवस्था को सड़ांधपूर्ण बताते हुए, पेरस्त्रोइका और ग्लासनोस्त की तर्ज पर न्यायिक व्यवस्था में पुनर्निर्माण का आवाहन किया। कुछ सालों के बाद चार जजों की प्रेस कॉन्फ्रेंस और चीफ जस्टिस के खिलाफ महाभियोग के प्रस्ताव से यह साफ हो गया कि न्यायपालिका भयानक बवंडर के दौर से गुजर रही है। लॉकडाउन के बाद मुकदमों की ऑनलाइन सुनवाई के समानांतर सोशल मीडिया और टीवी में कंगारू कोर्टों में 'बुलडोजर न्याय' की बहस से भी जजों पर भारी दबाव बन रहा है, जिसकी अभिव्यक्ति प्रधान न्यायाधीश के माध्यम से हुई है। 

सोशल मीडिया के फर्जी एकाउंट्स और आईटी सेलों के माध्यम से अदालती फैसलों के साथ चुनाव, सरकारी नीतियां, संसद के कानून, मीडिया का एजेंडा आदि भी निर्धारित होने लगा है। अभिव्यक्ति को सुरक्षित रखते हुए सोशल मीडिया के फर्जीवाड़े पर लगाम लगाने का माकूल सिस्टम बने, तो लोकतंत्र के साथ देश का भी भविष्य निर्धारित होगा। सोशल मीडिया जनता की सामूहिक अभिव्यक्ति का सबसे सशक्त माध्यम है, जिसमें न्यायिक व्यवस्था के सामने कई बड़े सवाल खड़े हो रहे हैं। 

पहला, जजों की नियुक्ति व्यवस्था को पारदर्शी और जनतांत्रिक बनाने के लिए ठोस सुधार। दूसरा, अखिल भारतीय न्यायिक सेवा के गठन पर अमल। तीसरा, उच्च न्यायालयों में स्थानीय भाषा का इस्तेमाल। चौथा, अदालतों की कार्यवाही के सीधे प्रसारण के लिए कानूनी व्यवस्था। पांचवां, जेलों में बंद कैदियों और विचाराधीन बंदियों की जल्द रिहाई। छठा, जिला अदालतों में जजों के रिक्त पदों पर जल्द भर्ती। सातवां, भ्रष्ट जजों के खिलाफ सख्त कार्रवाई। 

ऐसे अनेक बड़े मुद्दे न्यायिक व्यवस्था के अंतर्गत आते हैं, जिन्हें सरकारी सहयोग या हस्तक्षेप के बगैर ही सुलझाया जा सकता है। देश की जेलों में बंद लाखों बेगुनाह लोगों की बदकिस्मती के लिए पुलिस और सरकार से ज्यादा जजों की जिम्मेदारी है। बड़े राजनेता, धनपति और चर्चित मामलों में वरिष्ठ वकील बहस करते हैं और उनमें झटपट न्याय भी मिल जाता है। लेकिन करोड़ों मुकदमों के बोझ से दबी आम जनता के हिस्से में सिर्फ तारीखें आती हैं। 

बड़े लोगों के लिए व्हाट्सअप की तर्ज पर तुरंत डिलीवरी और कमजोर लोगों के लिए बैरंग लिफाफे वाली थकाऊ न्यायिक व्यवस्था असांविधानिक होने के साथ अस्वीकार्य भी है। सुप्रीम कोर्ट के प्रधान न्यायाधीश ने खुद ही स्वीकार किया है कि भारत की न्यायिक व्यवस्था में प्रक्रिया ही दंड बन गई है। सोशल मीडिया के फर्जी खातों, पेड न्यूज और एजेंडा प्रेरित सतही अभियानों से लोकतंत्र को बचाने के लिए न्यायपालिका को भी ठोस पहल करनी चाहिए। 

सोशल मीडिया के कोलाहल में आम जनता के दर्द को सुनने और समझने के लिए जजों को संवेदनशील होना पड़ेगा। जजों को अपने फैसलों की तरफदारी नहीं करनी पड़ती, क्योंकि उनके फैसले खुद-ब-खुद बोलते हैं। कुछ दशक पहले जजों के फैसले कई पीढ़ियों तक नजीर बना करते थे, लेकिन अब गंभीरता और स्थिरता की कमी होने से वर्तमान जज ही फैसलों का सम्मान नहीं करते। राष्ट्रपति, संसद, प्रधानमंत्री, कानूनमंत्री और पुराने सभी प्रधान न्यायाधीशों ने न्यायिक व्यवस्था में आमूल-चूल सुधार की जरूरत बताई है। 

अपना घर ठीक करने के बजाय अदालतें सरकारी व्यवस्था को ठीक करने का बीड़ा उठाए हुए हैं, जो संविधान के अनुसार ठीक नहीं है। कर्नाटक हाई कोर्ट के जजों ने हालिया फैसले में कहा है कि न्यायिक पुनरावलोकन के नाम पर जजों को सरकार चलाने की कोशिश नहीं करनी चाहिए। भारत में न्यायपालिका और जजों के प्रति अब भी लोगों का सबसे ज्यादा भरोसा है। इसे कायम रखने के लिए सोशल मीडिया और टीवी बहस पर दोषारोपण करने के बजाय मजबूती से संस्थागत न्यायिक सुधार करने की जरूरत है, जिससे लोगों के मौलिक अधिकारों की रक्षा के साथ आम जनता को जल्द न्याय मिल सके।

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