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अफगानिस्तान में अपने-अपने हित
कुलदीप तलवार
Updated Mon, 23 Sep 2013 08:08 PM IST
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अमेरिका के दबाव के बावजूद पाकिस्तान के प्रधानमंत्री नवाज शरीफ पाक तालिबान को अफगानिस्तान में जंग खत्म कराने, अगले साल अमेरिकी-नाटो फौज को अफगानिस्तान से निकल जाने के लिए सुरक्षित रास्ता देने और पाक में आतंकवादी गतिविधियों को खत्म करने के लिए राजी नहीं कर सके।
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तालिबान की शर्त है कि पाक फाटा से सेना हटाए और तालिबान बंदियों को रिहा करे, तब ही कोई बातचीत हो सकती है। पाक फौज के मुखिया जनरल कियानी ने तालिबान की इस मांग को बड़ी सख्ती से रद्द कर दिया है।
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बहरहाल, पाकिस्तान सरकार ने अफगानिस्तान के राष्ट्रपति अहमद करजई की अपील पर 33 अफगान दहशतगर्द तालिबान को, जो पाक जेलों में बंद थे, रिहा कर दिया है, ताकि युद्धग्रस्त अफगानिस्तान में सुलह प्रक्रिया को नए तरीके से बढ़ावा मिल सके। जबकि अफगान शासकों का कहना है कि पाक या अफगान जेलों से रिहा किए गए तालिबान सुलह करने के बजाय दोबारा जंग के मैदान में वापस लौट रहे हैं।
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अफगान तालिबान की रिहाई का मकसद अमन की बातचीत में मदद देना था, लेकिन इसका अनुकूल प्रभाव सामने नहीं आया। अवामी स्तर पर तालिबान करजई सरकार से भी सीधी बातचीत करने से इन्कार कर रहे हैं। इतना ही नहीं, अभी तक इन कट्टरपंथी तत्वों की तरफ से कोई इशारा भी सामने नहीं आया है कि वे अगले साल पांच अप्रैल को होने वाले राष्ट्रपति चुनाव में हिस्सा लेंगे या नहीं, जबकि राष्ट्रपति के चुनाव के लिए प्रत्याशियों के नामांकन की प्रक्रिया शुरू हो गई है।
उल्लेखनीय है कि 2001 में तालिबान के कट्टरपंथी शासन को बेदखल करने के बाद से अफगानिस्तान का नेतृत्व कर रहे करजई के हटने के बाद पहली बार लोकतांत्रिक सत्ता हस्तांतरण के लिए चुनाव होने हैं। दो कार्यकाल पूरा करने के बाद करजई चुनाव से बाहर हैं, क्योंकि अफगान संविधान इसकी इजाजत नहीं देता।
पाकिस्तान की राजधानी इस्लामाबाद में फाटा इंस्टीट्यूट नामक एक थिंक टैंक का कहना है कि पाकिस्तान के पंजाब प्रांत से संबंध रखने वाले पाक तालिबान इन दिनों अफगानिस्तान से विदेशी फौजों के निकल जाने के बाद की लड़ाई की तैयारी में लगे हुए हैं। ये पाकिस्तानी तालिबान पख्तूनों का साथ देंगे।
काबिले गौर है कि अफगानिस्तान में अधिकांश समय पख्तूनों का ही राज रहा है। वह अंग्रेजों द्वारा खींची गई डूरंड रेखा के दोनों तरफ मौजूद पख्तूनों के साथ हाथ मिलाकर एक विशाल पख्तूनिस्तान कायम करना चाहते हैं। विशाल पख्तूनिस्तान की यह मांग पाकिस्तान की एकता और अखंडता को भी प्रभावित कर सकती है। यह भारत के हित में भी नहीं होगा कि तालिबान पुनः काबुल पर कब्जा कर लें।
इस तरह देखें, तो आज अफगानिस्तान बारूद के ढेर पर बैठा है और इसके लिए खुद अमेरिका ही जिम्मेदार है। वह किसी तरह वहां से निकल जाना चाहता है। जिससे हालात और खराब हो रहे हैं। तालिबान को वहां से खदेड़ने के बाद अफगानिस्तान में एक स्थायी सुदृढ़ व्यवस्था बनाने के लिए अमेरिका ने कोई गंभीर कोशिश भी नहीं की। इससे करजई सरकार बड़ी मुश्किल में पड़ी हुई है।
ऐसे में पाक चाहता है कि अफगानिस्तान में उसकी कठपुतली सरकार बने और कुछ ऐसे हालात पैदा हों कि भारत को वहां से भागना पड़े। यदि ऐसा हुआ, तो न केवल अफगानिस्तान के पुनर्निर्माण पर भारत द्वारा खर्च किए गए अरबों रुपये जाया चले जाएंगे, बल्कि भारत के लिए खतरा भी बढ़ जाएगा।
लिहाजा यह भारत के हित में है कि वह अफगानिस्तान के प्रति ऐसी कूटनीति अपनाए, जिससे अफगानिस्तान सरकार स्थिर हो सके। इसके लिए उसे अफगानिस्तान को दी जाने वाली आर्थिक मदद के अलावा बड़े हथियारों की पूर्ति के लिए अपनी मौजूदा नीति पर भी पुनर्विचार करना होगा, क्योंकि अमेरिका ने अफगान फौजों को केवल छोटे हथियार ही दिए हैं। तोपें, टैंक व दूसरे भारी हथियार, जो पहले अफगानियों के पास थे, वह उसने वहां पहुंचने के कुछ समय बाद ही नष्ट कर दिए थे।
यही कारण है कि भारी हथियारों के न होने से अफगान सिपाही पाक समर्थित तालिबान के हाथों बड़ी संख्या में मारे जा रहे हैं। इस बदलती स्थिति को भारत अपने अनुकूल बना सकता है।