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सरहद के रखवालों का सम्मान
हर्ष कक्कड़
Updated Fri, 03 Nov 2017 10:06 AM IST
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वन रैंक वन पेंशन
हाल ही में जंतर-मंतर पर विरोध प्रदर्शन कर रहे वरिष्ठ पूर्व सैनिकों के साथ दिल्ली पुलिस ने धक्का-मुक्की की, लेकिन मीडिया ने काफी हद तक इसे नजरंदाज किया। सोशल मीडिया पर हालांकि इस खबर की काफी चर्चा हुई, जिसमें पुलिस की ज्यादती के वीडियो भी शामिल थे। पिछली बार ऐसा स्वतंत्रता दिवस की पूर्व संध्या पर 2015 में हुआ था, जब पुलिस ने बुजुर्ग पूर्व सैनिकों के साथ दुर्व्यवहार किया था और उनके कपड़े तक फाड़ डाले थे। नतीजतन राष्ट्रीय स्तर पर एक विवाद छिड़ गया और पुलिस कमिश्नर को मजबूरन बिना शर्त माफी मांगनी पड़ी।
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इस बार मीडिया की चुप्पी के कारण पुलिस कार्रवाई पर किसी का ध्यान नहीं गया। हालांकि नौ नवंबर से पहले जंतर-मंतर को प्रदर्शनकारियों से खाली कराने का एनजीटी ने आदेश दिया है, लेकिन उसका अधिक कुशलता और शिष्टाचार के साथ पालन किया जाना चाहिए था। इसके अलावा उस आदेश को सभी प्रदर्शनकारियों पर लागू किया जाना चाहिए था, सिर्फ पूर्व सैनिकों पर ही नहीं। उनके तंबुओं को जबरन तोड़कर और उनके साथ दुर्व्यवहार करके पुलिस ने सिर्फ सरकार के प्रति लोगों के गुस्से को बढ़ाया है।
पिछले कुछ वर्षों में सेना के कद और वेतन घटाए गए हैं, उसी तरह उनकी प्रतिष्ठा कम कर आंतरिक असंतोष बढ़ाया जा रहा है। वर्तमान सरकार के सत्ता में आने के तुरंत बाद से ही वन रैंक-वन पेंशन (ओआरओपी) प्रदर्शन चल रहा है। वे न केवल मौजूदा पूर्व सैनिकों के लिए, बल्कि अभी सेवारत सैनिकों के लिए भी समान पेंशन की मांग कर रहे हैं, जो बाद में पूर्व सैनिक बनेंगे। ओआरओपी की मांग सरल और ठोस तर्कों पर आधारित है।
केवल सशस्त्र बल ही है, जो सैनिकों की भर्ती सत्तरह वर्ष के अनुबंध पर करता है। इसलिए नब्बे फीसदी सैनिक पैंतीस से पैंतालीस वर्ष की उम्र में सेवानिवृत्त हो जाते हैं। दूसरी सभी सरकारी सेवाओं में, चाहे केंद्रीय हो या प्रांतीय, सेवानिवृत्ति की उम्र साठ वर्ष है। इसलिए केंद्र या राज्य सरकार की सेवा में लगे कर्मचारी जब सेवानिवृत्त होते हैं, तो उनकी अधिकांश पारिवारिक जिम्मेदारियां खत्म हो चुकी होती हैं। एक सैनिक की तुलना में लंबे समय तक सेवारत रहने के कारण उनकी पेंशन स्वतः ज्यादा है।
एक सैनिक जब पैंतीस या पैंतालीस वर्ष की उम्र में सेवानिवृत्त होता है, तब उसकी जिम्मेदारियां चरम पर होती हैं। उसके बच्चे बड़े हो रहे होते हैं व अभिभावक बूढ़े और तमाम जिम्मेदारियों को निभाने के लिए मात्र एक पेंशन का सहारा होता है। ओआरओपी से एक ही रैंक से सेवानिवृत्त होने वाले सैनिकों की पेंशन में बढ़ोतरी होगी, यह कुछ हद तक अन्य सरकारी सेवाओं की तुलना में कमी की भरपाई करेगी। सरकार ने एक रैंक-पांच पेंशन की घोषणा की है, क्योंकि उसने वार्षिक नहीं, पांच वर्ष के बाद संशोधन करना स्वीकार किया है। इस तरह से एक रैंक के लिए पांच तरह के पेंशन होंगे।
ओआरओपी मुद्दे के समाधान के लिए गठित रेड्डी कमिशन ने एक वर्ष पहले ही अपनी सिफारिशें सौंप दी थी, इसके बावजूद सरकार कह रही है कि उसका अध्ययन किया जा रहा है। इसने पूर्व सैनिकों के आक्रोश को बढ़ाया ही है। उनका कहना है कि सरकार इस मुद्दे पर विलंब कर रही है और उचित मांगों को नजरंदाज कर रही है। सातवां वेतन आयोग सशस्त्र बलों को अन्य सबको आवंटित करने के लगभग एक साल बाद दिया गया। इसका कारण यह था कि सैनिकों का कद राज्य पुलिस से भी नीचे किया गया, जिसके बचाव में वे सबसे पहले आते हैं।
सरकार ने जूनियर कमिशन ऑफिसर (जेसीओ) के सैन्य सेवा वेतन को बढ़ाने से इन्कार कर दिया, और उन्हें अपने जूनियरों के बराबर रखा। जेसीओ मानते हैं कि वे सशस्त्र बल तंत्र का एक अनिवार्य हिस्सा हैं। उन्हें अपने कनिष्ठों के बराबर समझना चिंतनीय है। इससे उनका मनोबल टूटा है और संगठन के भीतर असंतोष बढ़ा है। अधिकारी वर्ग को भी शांतिपूर्ण स्टेशनों पर मुफ्त राशन से वंचित कर दिया गया है और इसके बदले में उन्हें मामूली भत्ता दिया जाता है।
एक संगठन के रूप में सशस्त्र बल चुप रहने के लिए बाध्य हैं और अपने गुस्से को जाहिर करने में असमर्थ हैं। वे असंतुष्ट होने पर भी अपना काम करते रहते हैं। सिर्फ पूर्व सैनिक ही अपनी आवाज उठा रहे हैं, जिन्होंने अपनी समस्याओं को समझा है। लेकिन उनकी आवाज सरकार दबाना चाहती है, क्योंकि अगर यह आवाज बढ़ती है, तो आगामी चुनाव में इसका असर पड़ सकता है। राजनीतिक लाभ के लिए प्रधानमंत्री और रक्षा मंत्री सहित तमाम राजनीतिक नेता सुरक्षा बलों के साथ फोटो खिंचाते हैं, लेकिन उनकी वास्तविक मांगों को नजरंदाज करते हैं।
आम भारतीय सशस्त्र बलों का सम्मान और समर्थन करता है, क्योंकि जब भी जरूरत पड़ती है और राष्ट्र निर्माण या राष्ट्रीय एकता के लिए कुछ ज्यादा करने की जरूरत होती है, तो किसी भी राजनीतिक दल की तुलना में सशस्त्र बल सबसे आगे रहता है। प्राकृतिक आपदा और दंगे की स्थिति में और नागरिक प्रशासन के विफल होने पर सबसे पहले वे ही स्थिति को सामान्य करने के लिए पहुंचते हैं। वे अपने जीवन और अंगों का बलिदान कर देते हैं, लेकिन राष्ट्रीय सुरक्षा के किसी भी खतरे में राष्ट्र के सम्मान को ठेस नहीं पहुंचने देते।
हालांकि अन्य केंद्रीय सेवाकर्मियों को उनका यह सम्मान नहीं सुहाता है, इसलिए वे हर संभव उपाय करते हैं कि सशस्त्र बलों का कद घटाया जाए। पूर्व सैनिक राष्ट्र को बताना चाहते हैं कि भले ही सरकार सशस्त्र बलों के समर्थन का बयान देती है, लेकिन वास्तविकता यह है कि वह इसका कद घटाना चाहती है और उनकी उचित मांगों को अस्वीकार करने की कोशिश करती है। पूर्व सैनिकों को न तो कमजोर किया जा सकता है और न ही चुप कराया जा सकता है, क्योंकि वे उन जवानों का प्रतिनिधित्व करते हैं, जो राष्ट्र के लिए अपना जीवन खतरे में डालते हैं।