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आरक्षण: मिस इंडिया विवाद सियासी शतरंज पर एक और चाल, भविष्य में असुरक्षित महसूस कर सकते हैं कांग्रेस के सहयोगी

Sat, 31 Aug 2024 02:39 AM IST
Neerja Chowdhary नीरजा चौधरी
Updated Sat, 31 Aug 2024 02:39 AM IST
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सार
मिस इंडिया विवाद सियासी शतरंज पर एक और चाल है, ताकि दलित, आदिवासी और ओबीसी को कांग्रेस के पक्ष में लामबंद किया जाए। लेकिन ओबीसी कांग्रेस का नहीं, बल्कि सपा और राजद का वोट बैंक रहा है, जो आज कांग्रेस के सहयोगी हैं, जिन्हें आने वाले समय में इस राजनीति से खतरा महसूस हो सकता है।
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Reservation in Miss India Controversy Caste Politics of parties across Indian Political Spectrum
कांग्रेस नेता राहुल गांधी (फाइल फोटो)। - फोटो : अमर उजाला नेटवर्क

विस्तार

राहुल गांधी अपने शब्दों से लोगों का ध्यान खींचते हैं। वह जो कुछ भी बोलते हैं, वह खबर बन जाती है। आप पाएंगे कि कई राजनेता निजी तौर पर कभी-कभी यह स्वीकार करते हैं कि वह विवादों के कारण आगे बढ़े हैं, क्योंकि विवाद उन्हें खबरों में बनाए रखता है!



हाल ही में प्रयागराज में संविधान सम्मेलन में दिए गए राहुल के एक बयान पर विवाद छिड़ गया, जिसमें उन्होंने कहा कि उन्होंने मिस इंडिया की सूची खंगाली, ताकि पता चल सके कि उसमें दलित, आदिवासी या ओबीसी महिलाएं हैं या नहीं। उस सूची में एक भी नहीं थी। उनके बयान का यह मतलब निकाला गया कि वह मिस इंडिया के प्रतिभागियों में भी आरक्षण के पक्ष में थे। इस पर छिड़ी बहस में जब महिलाएं और राजनीतिक दल शामिल हुए, तो उनमें से कुछ ने मिस इंडिया प्रतियोगिता में आरक्षण को जरूरी बताया, तो कुछ ने इसका विरोध किया। लेकिन इस बहस फिर से राहुल को दलित और ओबीसी राजनीति के केंद्र में ला दिया, जिसकी अब वह अगुआई करना चाहते हैं।


बहुत कम लोग इस पर सवाल उठाएंगे कि सभी जातियों और समुदायों की महिलाओं को मिस इंडिया जैसी प्रतियोगिता में भाग लेने का अधिकार है, और यह भी कि इसमें सभी महिलाओं के लिए समान अवसर होना चाहिए। फिर यह सवाल उठता है कि समाज में आरक्षण का दायरा कितना है? इस समय सरकारी नौकरियों एवं उच्च शिक्षा संस्थानों में एससी, एसटी और ओबीसी के लिए आरक्षण है और विधायिकाओं में एससी एवं एसटी के लिए आरक्षण है। समय-समय पर मांग उठती रहती है कि आरक्षण को निजी क्षेत्रों में भी लागू किया जाए। परोक्ष रूप से मिस इंडिया प्रतियोगिता में आरक्षण की वकालत करके राहुल यह संकेत भी दे रहे हैं कि इसे निजी क्षेत्र में लागू किया जाना चाहिए।

दलित-वंचित लोगों को आगे बढ़ने का अवसर देने के लिए संविधान ने सामाजिक रूप से (जातिगत भेदभाव के कारण) एवं शैक्षणिक रूप से पिछड़े लोगों (आर्थिक रूप से पिछड़े वर्ग के लिए नहीं) के लिए आरक्षण का प्रावधान किया है। लेकिन क्या किसी को जाति के आधार पर पूरे समाज की संरचना करने का मामला बनाना चाहिए, जिससे समूहों को उनकी आबादी के अनुपात में लाभ मिले? ऐतिहासिक गलतियों को सुधारने के लिए सुधार के उपाय किए जाने चाहिए, लेकिन संघर्ष के कारण समाज में दरार न पड़े, इसके लिए संतुलन और बीच का रास्ता भी होना चाहिए। इसीलिए सुप्रीम कोर्ट ने आरक्षण के लिए 50 फीसदी की सीमा तय की थी, हालांकि कई राज्यों ने इससे ज्यादा आरक्षण का प्रावधान कर दिया।

सबसे पहले, जब हम महिलाओं को उनका हक दिलाने के लिए आगे बढ़ रहे हैं, राहुल गांधी, नरेंद्र मोदी और अन्य नेता भी महिलाओं और अनुसूचित जातियों, जनजातियों, अन्य पिछड़े वर्गों की आकांक्षाओं को महसूस कर रहे हैं, तो पहले राजनीतिक दलों को अपनी ईमानदारी साबित करने दीजिए। उन्हें अपने राजनीतिक संगठन में 50 फीसदी महिलाओं को लाने दीजिए। वे उन्हें पर्याप्त टिकट दें, ताकि 50 फीसदी महिलाएं (और उनमें से ज्यादा एससी, एसटी और ओबीसी) लोकसभा, राज्यसभा और विधानसभाओं में चुनकर आ सकें और सरकार में महिलाओं का पर्याप्त प्रतिनिधित्व सुनिश्चित हो सके। यह सब राजनेताओं के ही हाथ में है, जो उनके बारे में इतनी बातें कर रहे हैं।

दूसरा, दलित, आदिवासी और ओबीसी महिलाएं पैसे और संपर्कों की कमी के कारण मिस इंडिया प्रतियोगिता में नहीं पहुंच पाई हैं। इसका जाति से ज्यादा वर्ग से संबंध है। भारत में आयोजित होने वाली सौंदर्य प्रतियोगिताओं की प्रवृत्ति जितना सौंदर्य के बारे में पश्चिमी विचारों को उजागर करने की है, उतना भारतीय विचारों की नहीं। हालांकि राहुल इस ओर ध्यान नहीं देते हैं, क्योंकि वह जीवन के हर क्षेत्र में एससी-एसटी-ओबीसी की मौजूदगी की कमी पर ध्यान केंद्रित करते हैं।  राहुल गांधी ने-और यह भाजपा एवं अन्य पार्टियों के लिए भी सच है-सामाजिक रूप से दबे-कुचले लोगों को ऊपर उठाने के लिए आरक्षण की वकालत सही ढंग से की है। लेकिन दिलचस्प बात यह है कि ये पार्टियां एससी, एसटी के अधिक जरूरतमंद लोगों तक आरक्षण का लाभ पहुंचाने के लिए सुप्रीम कोर्ट द्वारा सुझाए गए उप-वर्गीकरण को स्वीकार करने में अनिच्छुक हैं। प्रमुख जातियां आरक्षण का लाभ अपने कम भाग्यशाली भाइयों से साझा नहीं करना चाहती हैं और राजनीतिक दल अनुसूचित जातियों के प्रमुख समूहों (जैसे जाटव) के वोट खोना नहीं चाहते हैं। साफ है कि राहुल गांधी ने मंडल-2 कार्ड खेलने का फैसला किया है, और जाति जनगणना की मांग उसी राजनीति का हिस्सा है। उन्हें उम्मीद है कि वह इन उभरते समूहों के बीच पनप रही आकांक्षा क्रांति के अगले चरण का लाभ उठाएंगे और उनकी आवाज बनेंगे।

1990 में विश्वनाथ प्रताप सिंह ने मंडल आयोग की रिपोर्ट को लागू करके भारतीय राजनीति को हमेशा के लिए बदल दिया। राजीव गांधी ने उस फैसले का विरोध किया था, क्योंकि उन्हें डर था कि इससे 'जाति युद्ध' छिड़ सकता है। लेकिन राहुल दूसरे रास्ते पर चल रहे हैं। हालिया लोकसभा चुनाव में कांग्रेस का जाति कार्ड काम कर गया। इससे भाजपा हैरान रह गई। पिछले दस वर्षों में प्रधानमंत्री मोदी ने कभी बनिया-ब्राह्मणों की पार्टी कही जाने वाली भाजपा में ओबीसी, खास तौर पर अत्यंत पिछड़ी जातियों (ईबीसी), आदिवासी और दलितों के एक वर्ग को शामिल किया। लेकिन आरक्षण खत्म होने के भय से दलितों का एक वर्ग इंडिया गठबंधन के खेमे में चला गया और वैसा ही उत्तर प्रदेश में ईबीसी ने किया। इसने भाजपा को स्पष्ट बहुमत से वंचित कर दिया, जिसके चलते पार्टी को फैसले लेने में परेशानी हो रही है और उसे अपने कई फैसले वापस लेने पड़े हैं।

लगता है कि पार्टी को 2024 के अप्रत्याशित नतीजों ने बेचैन कर दिया है। मोदी-3 के सामने चुनौती अपनी ताकत कम होने की नहीं है; बल्कि नई परिस्थितियों के अनुसार कामकाज का परामर्शी तरीका अपनाना है। साथ ही, ओबीसी-दलितों को वापस अपने पाले में लाना है, जो दूसरी तरफ चले गए हैं। मिस इंडिया विवाद सियासी शतरंज पर राहुल गांधी की एक और चाल है, ताकि दलित, आदिवासी और ओबीसी को अपनी पार्टी के पक्ष में लामबंद किया जाए। यह किस हद तक काम करेगा, यह देखने वाली बात होगी। उत्तर भारत में ओबीसी कांग्रेस का पारंपरिक मतदाता नहीं रहा है। यह सपा और राजद का वोटबैंक रहा है, जो आज कांग्रेस के सहयोगी हैं, जिन्हें आने वाले समय में इस राजनीति से खतरा महसूस हो सकता है।

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