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ईमानदारी एवं संघर्ष के प्रतीक थे बर्धन
अवधेश कुमार
Updated Tue, 05 Jan 2016 07:32 PM IST
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भारतीय कम्युनिस्ट पार्टी (भाकपा) के पूर्व महासचिव ए बी बर्धन चले गए। उन्हें श्रद्धांजलि देने वालों में विभिन्न राजनीतिक दलों के नेताओं के साथ भाजपा नेतृत्व वाली सरकार के कई मंत्री भी थे। वैचारिक मतभेद अपनी जगह है और मानवीय संवेदना अपनी जगह। विचारधारा के आधार पर विरोध करना, लेकिन किसी की ईमानदारी, समर्पण को सम्मान देना ही लोकतांत्रिक राजनीति का तकाजा है। वह एक मजदूर नेता से पार्टी के महासचिव तक अपने संघर्ष, अपनी समझ तथा अपनी काबिलियत की बदौलत पहुंचे थे।
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ए बी बर्धन की कुछ खासियत थी। अगर वह भाकपा के केंद्रीय कार्यालय अजय भवन में होते थे, तो आप कभी उनसे मिल सकते थे। उनके व्यवहार से भी आपको नहीं लगता कि आप किसी पार्टी के राष्ट्रीय महासचिव से बात कर रहे हैं या इतने बड़े नेता से मिल रहे हैं। बातचीत एकदम सामान्य आदमी की तरह। अन्य नेताओं की तरह वह यह चिंता नहीं करते कि पत्रकार उनके बारे में क्या सोचेंगे और लिखेंगे। वह पत्रकारों का सम्मान करते थे, उनकी आजादी के भी समर्थक थे, लेकिन किसी की लल्लो-चप्पो से उन्हें कोई लेना-देना नहीं होता था। यदि आपकी कोई बात उन्हें गलत लगती, तो वह तुरंत प्रतिकार करते थे।
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उनका जीवन एकदम वैसा था, जैसा समाज के निचले व्यक्ति का होता है। एकदम सरल, सहज और काफी हद तक निर्मल। अहं से बिल्कुल दूर। जब चीन को लेकर संयुक्त कम्युनिस्ट पार्टी में मतभेद हुआ, तो वह नंबूदरीपाद के साथ खड़े हुए। उसी समय से माकपा एवं भाकपा नामक दो पार्टियां बनीं। हालांकि उनके जीवन काल में ही भाकपा एक हाशिये की पार्टी बन गई, जबकि माकपा प. बंगाल, त्रिपुरा एवं केरल में बड़ी ताकत बनी रही। बर्धन ने बाद में दोनों पार्टियों के बीच कटुता को खत्म कर सहयोग करने की अगुवाई की और पिछले लगभग तीन दशकों से राष्ट्रीय एवं क्षेत्रीय राजनीति में दोनों के बीच सहयोग एवं समन्वय बना हुआ है।
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आज भाकपा उस स्थिति में नहीं, जैसी वह 1980 के दशक तक थी। अब वह अपने अस्तित्व के लिए संघर्ष कर रही है, किंतु इसके कारण अलग हैं। बर्धन की मार्क्सवाद के प्रति निष्ठा तथा मजदूरों और किसानों के लिए संघर्ष के प्रति उनके समर्पण पर कोई प्रश्न नहीं उठा सकता। माकपा के साथ रहते हुए भी कई बार वह अलग जाने के लिए भी जाने जाते रहे। 1996 में उन्होंने माकपा से अलग जाकर संयुक्त मोर्चा सरकार में शामिल होने का निर्णय लिया। इसके कारण उनकी पार्टी के दो वरिष्ठ नेता इंद्रजीत गुप्त तथा चतुरानन मिश्र पहली बार केंद्र सरकार में मंत्री बने। इंद्रजीत गुप्त ने गृह मंत्री के नाते बहुत अच्छा काम किया और चुनाव सुधार पर उनके कदम आज भी याद किए जाते हैं। दोनों नेताओं पर किसी प्रकार के पक्षपात या भ्रष्टाचार का आरोप नहीं लगा। माकपा ने बाद में सरकार में शामिल न होने को ऐतिहासिक भूल कहा था।
उनकी विचारधारा से असहमत लोग भी उनके जीवन से ईमानदारी, सादगी, सरलता, सहजता तथा निष्ठा की प्रेरणा ले सकते हैं। छह दशक से ज्यादा समय तक राजनीति में रहने के बावजूद जिस व्यक्ति की ईमानदारी और चरित्र पर कोई प्रश्न नहीं उठा, उसे आप साधारण इंसान नहीं कह सकते। तो बर्धन का जाना उस पीढ़ी के कुछ बचे-खुचे लोगों में से एक बड़े व्यक्ति का जाना है, जिनके लिए राजनीति जनसरोकार का माध्यम थी, और जिन्होंने अपना होम करके राजनीति में ईमानदारी और संघर्ष की ताप को बनाए रखा।