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अर्थ-शास्त्र: बाजार में तेजी और मंदी का खौफ, बढ़ते कर्ज के साथ ब्याज लागत से जूझतीं अर्थव्यवस्थाएं

Wed, 05 Jul 2023 07:41 AM IST
Shankar Ayair शंकर अय्यर
Updated Wed, 05 Jul 2023 07:41 AM IST
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सार
तेजड़िये इस बात से आश्वस्त हैं कि केंद्रीय बैंक अब और ब्याज दर नहीं बढ़ाएंगे, क्योंकि इससे भारत, ब्रिटेन और अमेरिका सहित प्रमुख अर्थव्यवस्थाओं के चुनावों के मद्देनजर राजनीतिक दबाव बढ़ जाएगा। दूसरी बात, ब्याज दर बढ़ाने से मुद्रास्फीति कम नहीं हुई।
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recession risk interest rate inflation political pressure on India UK and US economy due to upcoming elections
BSE (File) - फोटो : अमर उजाला

विस्तार

जीवन का एक सबसे गंभीर विचार महाभारत में वर्णित है। अरण्य पर्व में यक्ष युधिष्ठिर से पूछता है, 'संसार में सबसे बड़े आश्चर्य की बात क्या है?' युधिष्ठिर कहते हैं, 'अनगिनत प्राणी यमलोक जा रहे हैं, फिर भी जो बच जाता है, वह स्वयं को अमर समझता है। यही महान आश्चर्य है।' यह विचार आधुनिक दुनिया में भी सच है-खासकर वैश्विक वित्तीय बाजार में।



पिछले हफ्ते अमेरिकी फेडरल रिजर्व, यूरोपीय सेंट्रल बैंक, बैंक ऑफ इंग्लैंड और बैंक ऑफ जापान के प्रमुखों ने पुर्तगाल के सिंट्रा में यूरोपीय केंद्रीय बैंक (ईसीबी) के मंच पर बैठक की। इस बैठक का कटु संदेश यह है कि : मुद्रास्फीति ऊंची बनी रहेगी, जिससे विकास और नौकरियों पर असर पड़ेगा, ब्याज दरों में और बढ़ोतरी होगी तथा मंदी को टाला नहीं जा सकता। इस संदेश ने वैश्विक अर्थव्यवस्थाओं में गूंजने वाली चेतावनीपूर्ण सलाह और भय को और बढ़ा दिया है। मगर सट्टेबाजों और शेयर बाजार के तेजड़ियों के लिए ये चेतावनियां बेकार हैं। भारत में बीएसई सूचकांक व निफ्टी-50 नई ऊंचाइयों को छू रहे हैं। इस उछाल का मुख्य कारण एक वैश्विक बैंकिंग दिग्गज का उदय है। मूल कंपनी एचडीएफसी के साथ विलय के बाद एचडीएफसी बैंक का मूल्य करीब 172 अरब डॉलर हो गया है, जो जेपी मार्गन, बैंक ऑफ अमेरिका एवं आईसीबीसी के बाद दुनिया का चौथा बड़ा बैंक बन गया है।


यकीनन भारत में शेयरों में बढ़ोतरी उचित है-यह सबसे तेजी से बढ़ती बड़ी अर्थव्यवस्था है और मार्च के बाद से विदेशी संस्थागत निवेशकों (एफआईआई) ने 10 अरब डॉलर से अधिक का निवेश किया है। तथ्य यह है कि सुर्खियों के बावजूद इस वर्ष जनवरी से सेंसेक्स और निफ्टी-50 में करीब सात फीसदी की वृद्धि हुई है। इसके विपरीत, यूरोप और अमेरिका में सूचकांक (जहां मंदी आने का अनुमान है) एस ऐंड पी-500 15 फीसदी ऊपर है, 1983 के बाद से नैस्डेक के लिए पहले छह महीने सबसे अच्छे रहे हैं और 32 प्रतिशत ऊपर है तथा यूरो शेयर 15 फीसदी ऊपर है। इस आश्वस्ति का मतलब क्या है? सबकी निगाहें तकनीकी शेयरों पर हैं, लेकिन अमेरिका में 2022 में तकनीकी क्षेत्र में गिरावट आई, जिसके चलते नौकरियां चली गईं और नैस्डेक 33 फीसदी से अधिक लुढ़क गया। इसके अलावा, 2023 में अमेरिका में तकनीकी शेयरों में उछाल चैटजीपीटी द्वारा जेनरेटिव एआई की लोकप्रियता के कारण है। इसकी तुलना में यूरोप के पास गर्व करने के लिए बहुत कुछ नहीं है और न ही उसके पास एआई का आभामंडल है। चीन के साथ व्यापार पर निर्भर जर्मनी और फ्रांस के शेयर चीन में खराब रिकवरी के बावजूद उछाल पर हैं।

अप्रैल, 2022 से केंद्रीय बैंकों ने मुद्रास्फीति को कम करने के लिए ब्याज दरों में बढ़ोतरी की। इन बढ़ोतरी के बावजूद मुद्रास्फीति स्थिर है और केंद्रीय बैंकों ने चेतावनी दी है कि उच्च दरें लंबे समय तक बनी रहेंगी। सैद्धांतिक रूप से इसका मतलब उच्च लागत, कम विकास और नौकरियों का नुकसान है। लेकिन शेयर बाजार इससे सहमत नहीं है।

प्रसिद्ध निवेश गुरु जॉन टेम्पलटन ने एक बार कहा था कि बचतकर्ताओं और निवेशकों के लिए ये चार शब्द बहुत खतरनाक हैं-'इस बार यह अलग है।' शेयर बाजार के तेजड़ियों का मानना है कि इस बार स्थिति अलग है। उन्हें भरोसा है कि शेयर से रिटर्न मिलेगा। उन्नत अर्थव्यवस्थाओं में शेयरों ने दोहरे अंक में रिटर्न की सूचना दी है।

केंद्रीय बैंकों की निराशा और शेयर बाजार की आशा का सह-अस्तित्व नीति-निर्माताओं के लिए हैरान करने वाला विरोधाभास है। जनवरी, 2022 से अमेरिका में उपभोक्ताओं का भरोसा उच्च स्तर पर है। मूडीज इन्वेस्टर सर्विस का अनुमान है कि अमेरिकी कंपनियों के पास 20 खरब डॉलर से अधिक नकदी है। अमेरिकी सकल घरेलू उत्पाद में उछाल पहली तिमाही के 1.3 से दो प्रतिशत में संशोधन से परिलक्षित होता है। यह व्यवस्था के जरिये बाजार में डाले गए धन के स्तर को देखते हुए दरों में बढ़ोतरी की प्रभावकारिता पर सवाल उठाता है।

पूर्व ब्रिटिश प्रधानमंत्री से जब राजनीति की सबसे बड़ी चुनौती के बारे में पूछा गया था, तो उन्होंने कहा था, घटनाएं। यह अर्थव्यवस्थाओं के लिए भी सच है! तेजड़िये इस बात से आश्वस्त हैं कि केंद्रीय बैंक अब और ब्याज दर नहीं बढ़ाएंगे, क्योंकि इससे भारत, ब्रिटेन और अमेरिका सहित प्रमुख अर्थव्यवस्थाओं के चुनावों के मद्देनजर राजनीतिक दबाव बढ़ जाएगा। दूसरी बात, ब्याज दर बढ़ाने से मुद्रास्फीति कम नहीं हुई-उच्च ब्याज दर के बावजूद उन्नत अर्थव्यवस्थाओं में मुद्रास्फीति उच्च स्तर पर बनी हुई है।

पिछले हफ्ते आईएमएफ की उप प्रबंध निदेशक गीता गोपीनाथ ने ईसीबी फोरम में 'मौद्रिक नीति के लिए तीन असुविधाजनक सत्य' के बारे में बात की थी। गोपीनाथ ने यह रेखांकित करने के लिए सैमुअल बेकेट के नाटक वेटिंग फॉर गोदो के गोदो की कल्पना का हवाला दिया कि लोग कम मुद्रास्फीति के वादे का इंतजार कर रहे हैं। जैसा कि केंद्रीय बैंकों ने ब्याज दरों में आगे बढ़ोतरी की चेतावनी दी है, गोपीनाथ का कहना है कि बैंकिंग की स्थिरता उच्च दरों के कारण कमजोर है और मुद्रास्फीति ऊंची बनी रहेगी। पिछले बुधवार को यूएस फेड प्रमुख जेरोम पॉवेल ने इन आशंकाओं को सही ठहराते हुए कहा कि मुद्रास्फीति '2025 से पहले अमेरिका में दो फीसदी तक' कम नहीं होगी।

वास्तविक असुविधाजनक सच्चाई यह है कि राजनीति से जुड़े संरचनात्मक मुद्दे लगातार मुद्रास्फीति को बढ़ा रहे हैं-ब्रिटेन में ब्रेग्जिट, उम्रदराज कार्यबल और अमेरिका व यूरोप में जनसांख्यिकीय बदलाव, वस्तुओं एवं ऊर्जा की भू-राजनीति तथा विकासशील देशों से उन्नत अर्थव्यवस्थाओं में श्रमिकों के प्रवास के खिलाफ राजनीतिक प्रतिक्रिया। संदर्भों को देखते हुए यह पूछना जरूरी है कि क्या दो फीसदी का मुद्रास्फीति लक्ष्य ईमानदार और यथार्थवादी है।

ऊंची दरों के बने रहने के दावे वैश्विक विकास पर पड़ने वाले प्रभाव का संकेत देते हैं-खासकर विकासशील अर्थव्यवस्थाएं बढ़ते कर्ज और ब्याज लागत से जूझ रही हैं। अब वक्त आ गया है कि इस पर ईमानदार बहस हो। इस सितंबर नई दिल्ली में होने वाले जी-20 शिखर सम्मेलन में वैश्विक नेता मिलेंगे। इन मुद्दों पर बातचीत शुरू करने के लिए यह एक अच्छी जगह होगी।    

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