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रामविलास पासवान: एक बड़े दलित नेता का जाना

Sat, 10 Oct 2020 02:05 AM IST
Sanjay Kumar संजय कुमार, प्रोफेसर, सीएसडीएस
संजय कुमार, प्रोफेसर, सीएसडीएस Published by: Sanjay Kumar Updated Sat, 10 Oct 2020 02:05 AM IST
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Ram Vilas Paswan: A big Dalit leader demise and its impact on politics
रामविलास पासवान (फाइल फोटो) - फोटो : PTI

पिछले तीन दशक की बिहार की राजनीति को देखें, तो तीन बड़े राजनीतिक धड़े रहे हैं-राजद, जदयू और भाजपा। बिहार की राजनीति में जो तीन बड़ी पार्टियां हैं, उनमें रामविलास पासवान की पार्टी लोजपा नहीं है। लेकिन ये तीनों पार्टियां भी इस स्थिति में नहीं हैं कि अकेले दम पर सरकार बना लें। बिहार में दलित बड़ी संख्या (15 से 16 फीसदी आबादी) में है। 38 विधानसभा क्षेत्र आरक्षित हैं और 40 विधानसभा क्षेत्र ऐसे हैं, जहां दलितों की संख्या बहुत ज्यादा है। कमोबेश अन्य सभी विधानसभा क्षेत्रों में भी दलितों की आबादी है। जब तक जीतनराम मांझी का उदय नहीं हुआ था, बिहार के एकमात्र दलित नेता के रूप में रामविलास पासवान जाने जाते थे। जिन तीनों बड़ी पार्टियों का मैंने जिक्र किया है, उनमें कोई बड़ा दलित नेता नहीं था। इसलिए ये तीनों बड़ी पार्टियां दलित वोट को अपने पाले में खींचने के लिए लोजपा से गठजोड़ करना चाहती थीं। यही रामविलास पासवान का बिहार की राजनीति में महत्व रहा है। 


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इसलिए बेशक रामविलास पासवान कभी सरकार बनाने की स्थिति में नहीं रहे, लेकिन जो पार्टियां सरकार बनाना चाहती थीं, उन्होंने हमेशा उन्हें महत्व दिया। उनकी महत्ता बताने के लिए मैं एक उदाहरण देता हूं, जिसका जिक्र मैंने अपनी पुस्तक बिहार की चुनावी राजनीति में किया है कि 2005 के विधानसभा चुनाव में लालू यादव की पार्टी राजद की हार इसलिए हुई कि पासवान लालू यादव के साथ नहीं थे। बल्कि वह दलितों की एक बड़ी आबादी को अपने साथ लेते हुए लालू प्रसाद के विरोधी हो गए। नतीजतन लालू यादव की राजद सरकार चली गई। 

सवाल उठता है कि जब रामविलास पासवान का बिहार की राजनीति में इतना महत्व था, तो वह मुख्यमंत्री की कुर्सी तक क्यों नहीं पहुंचे। जैसा कि मैंने पहले कहा, बिहार की तीन बड़ी पार्टियों में लोजपा नहीं थी। 1990 के दशक के बाद की बिहार की राजनीति में लोजपा और कांग्रेस ऐसी पार्टियां हैं, जिनका वोट शेयर सात से दस फीसदी के आसपास रहा। जबकि तीनों बड़ी पार्टियों का तकरीबन बीस-बाईस फीसदी वोट शेयर रहा। इस तरह से ये तीनों बड़ी पार्टियां दो तिहाई मतों पर नियंत्रण रखती थीं।

कांग्रेस और लोजपा के पास तकरीबन 14-15 फीसदी वोट होता था। बाकी वोट बिखरे रहते थे। जाहिर है, बिहार की राजनीति में लोजपा का वर्चस्व कभी नहीं बना, बल्कि उसे एक सहयोगी दल के रूप में ही देखा गया। ऐसे में अगर कोई पार्टी, जो अकेले दम पर विधानसभा की सभी सीटों पर न लड़ पाए और ज्यादा सीटें हासिल न कर पाए, तो उसका नेता मुख्यमंत्री कैसे बन सकता है! किसी भी नेता के शीर्ष पद पर पहुंचने के लिए कद बड़ा होना चाहिए और उसके पास एक व्यापक जनाधार वाली बड़ी पार्टी होनी चाहिए। वर्ष 2005 के फरवरी का चुनाव देखें, तो उनको 29 सीटें मिली थीं, लेकिन छह महीने के भीतर ही अक्तूबर, 2005 के चुनाव में उनकी पार्टी ध्वस्त हो गई और उसे मात्र दस सीटें ही मिली।

रामविलास पासवान को लोग एक बड़े और अनुभवी नेता के रूप में जानते तो थे, लेकिन पूरे राज्य में और उनकी अपनी जाति व कुछ अन्य दलित जातियों को छोड़कर बाकी जाति समूहों में उनकी स्वीकार्यता नहीं थी। इन्हें अपनी जाति (दुसाधों) का 65-70 फीसदी वोट मिलता रहा, लेकिन अन्य दलित जातियों का तकरीबन 40-65 फीसदी वोट ही मिलता था। दलितों के बीच भी वोटों में अंतर दिखाई पड़ता था। इसके अलावा टिकट बंटवारे के समय में भी रामविलास पासवान का फोकस ज्यादातर दलितों पर ही रहता था। आम तौर पर लोग उन्हें एक अच्छे सांसद और जन सरोकार वाले बड़े नेता के रूप में जानते हैं।

जैसा कि मैंने पहले भी कहा, भले इनकी पार्टी बड़ी नहीं है, पर एक राष्ट्रीय नेता के रूप में उनकी छवि बनी रही। आठ बार वह चुनकर संसद पहुंचे और छह प्रधानमंत्रियों के साथ काम किया। दो बार बहुत बड़े अंतर से जीतने का मतलब है कि उन्हें अपने क्षेत्र की जनता का समर्थन और भरोसा हासिल था और यह निश्चित रूप से उन्होंने जनता से सीधे संवाद एवं जन सरोकार के जरिये हासिल किया था। उनके बारे में कभी नकारात्मक कहानियां भी सुनने को नहीं मिलीं। आज जब बिहार में एक बार फिर चुनाव का बिगुल बज चुका है, तब लोग रामविलास पासवान को निश्चित रूप से याद करेंगे।

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