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विषपायी
राजीव सक्सेना
Updated Sat, 22 Feb 2014 08:12 PM IST
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नित नए विष पर्व मनाते।
दिन बनते हैं वासुकि,
जीवन मंदराचल बन जाते।
तक्षक घूम रहे आंगन में
विषदंतों से हमें डराते
मन में सुलगे दावानल हैं,
भीतर तक हमको झुलसाते।
काल गरल को पीते-पीते
क्यों न हम महाकाल बन जाते?
मृत्यु की अंधेरी छाया में
जीवन के कुछ दीप जलाते।
प्राचीर के पीछे
प्राचीर के पीछे
सूरज निकल तो रहा है।
पत्थरों के भीतर
कुछ पिघल तो रहा है।
सतरंगी सम्मोहक दुनिया का
लौह यथार्थ
तिक्त और कठोर है,
किंतु दृश्यमान हो
कविता में ढल तो रहा है।
स्पंदन धीमे ही सही
जीवन चल तो रहा है
मैं यूं ही डरा जा रहा हूं।
-राजीव सक्सेना
राजीव की कविताएं सपाट शब्दों में पाठक से बात करती हैं। मुरादाबाद में रहते हैं।