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जुकरबर्ग के जवाब से उपजे सवाल

Fri, 23 Mar 2018 07:26 PM IST
केविन रूज
केविन रूज Updated Fri, 23 Mar 2018 07:26 PM IST
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Questions emerge from Zuckerberg's answer
मार्क जुकरबर्ग

पिछले शुक्रवार की रात फेसबुक ने एक ब्लॉग प्रकाशित कर जब यह कहा कि उसने डाटा के दुरुपयोग के कारण कैंब्रिज एनालिटिका को निलंबित कर दिया है, तभी साफ हो गया था कि यह फेसबुक की निजता से संबंधित कोई नए तरह का कांड है। इसके अगले दिन ही द न्यूयॉर्क टाइम्स और लंदन के द आब्जर्वर ने भी इससे संबंधित लेख प्रकाशित किए थे। अमेरिकी कांग्रेस ने जहां इसकी जांच शुरू कर दी है, वहीं फेसबुक के उपयोगकर्ताओं ने एक तरह की बगावत कर दी है। अपने 14 वर्ष के इतिहास में फेसबुक एक अभूतपूर्व संकट में फंस गया है।


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पांच दिन की चुप्पी के बाद फेसबुक के मुख्य कार्यकारी अधिकारी मार्क जुकरबर्ग आखिरकार फेसबुक पोस्ट के साथ सार्वजनिक हुए और बाद में उन्होंने मुझे और टाइम्स की मेरी सहयोगी शीरा फ्रैंकल को एक इंटरव्यू भी दिया। हमें जुकरबर्ग से फोन पर बात करने के लिए सिर्फ 30 मिनट दिए गए, पर हम कई महत्वपूर्ण मुद्दों को उठाने में सफल रहे। मसलन, कैंब्रिज एनालिटिका का विवाद, फेसबुक की लचर डाटा नीति, थर्ड पार्टी डेवलपर की पहुंच को रोकने की उसकी कवायद, ऐसे यूजर को जानकारी देना, जिनके डाटा का दुरुपयोग किया गया, चुनाव में दखलंदाजी और एक वैश्विक ताकत के रूप में फेसबुक की जिम्मेदारियां। लेकिन इन मुद्दों पर जुकरबर्ग के जवाबों ने और नए सवाल खड़े कर दिए हैं। मसलन, फेसबुक के बिजनेस मॉडल, जोकि विज्ञानपदाताओं और डेवलपर्स को फेसबुक उपभोक्ताओं की निजी डाटा को बेचने पर आधारित है, के बारे में पूछे गए एक सवाल पर उनका जवाब।

'क्या फेसबुक का बुनियादी आर्थिक मॉडल, जिसमें उपभोक्ता फेसबुक को डाटा प्रदान करते हैं और जिसे फेसबुक विज्ञानपदाताओं और डेवलपर्स को संभावित उपभोक्ताओं और यूजर्स तक पहुंच बनाने के लिए बेचता है, क्या आप महसूस करते हैं कि यह मॉडल काम करेगा, खासकर तब, जब हम इसके जोखिम के बारे में जान चुके हैं?'

इस पर जुकरबर्ग का जवाब था, 'यह वाकई बहुत महत्वपूर्ण सवाल है। विज्ञापन मॉडल के बारे में यह बात बहुत ही महत्वपूर्ण है और यह हमारे मिशन से जुड़ी हुई है। हमारा मिशन एक ऐसे समुदाय का निर्माण करना है, जो दुनिया में सबके लिए हो और दुनिया और करीब आए। और इसका सबसे अहम पक्ष है, एक ऐसी सेवा का निर्माण करना, जिसका खर्च लोग वहन कर सकें। इसलिए इसे मुफ्त रखना और ऐसा बिजनेस मॉडल अपनाना, जो विज्ञापन समर्थित हो। क्या अब ऐसे लोगों के लिए कोई रास्ता है, जिसके जरिये वे भिन्न तरीके से भुगतान कर सकें? हम मानते हैं कि आने वाले समय में निश्चित रूप से ऐसा हो सकता है। लेकिन मैं नहीं समझता कि विज्ञापन आधारित मॉडल नहीं चलेगा, क्योंकि बुनियादी तौर पर मैं सोचता हूं कि एक ऐसी सेवा का होना महत्वपूर्ण है, जिसका दुनिया में हर कोई उपयोग कर सके और इसका एकमात्र रास्ता यह है कि इसे बहुत सस्ता या फिर मुफ्त होना चाहिए।' 

संकीर्णता से सोचें, तो शायद यह सही है कि मुफ्त होने और विज्ञापन पर आधारित होने के कारण फेसबुक ने अरबों लोगों को अपनी सेवाओं से जोड़ने में सफलता हासिल कर ली है। फेसबुक ने खुद को सस्ता और खुद तक आसान पहुंच बनाए रखने के लिए कई तरह के रास्ते निकाल रखे हैं।

लेकिन यह स्पष्ट नहीं है कि इस नजरिये का समाज पर कैसा प्रभाव पड़ता है। खासतौर से म्यांमार जैसे देश में, जहां हाल ही में संयुक्त राष्ट्र के जांचकर्ताओं ने फेसबुक पर रोहिंग्या के खिलाफ नस्लीय हिंसा भड़काने के आरोप लगाए। लिहाजा फेसबुक तक पहुंच को कुछ नियंत्रित करना सकारात्मक हो, भले ही इसकी वजह से फेसबुक को अपने कुछ उपयोगकर्ता क्यों न गंवाने पड़ें। और फिर यह स्पष्ट नहीं है कि ऐसा ही होगा। दुनिया भर में लोग तो अपने सेलफोन और डाटा प्लान के लिए भुगतान कर ही रहे हैं और शायद अपने पसंदीदा सोशल नेटवर्क से जुड़े रहने के लिए कुछ शुल्क देने को भी राजी हो जाएं।

सब्सक्रिप्शन मॉडल (शुल्क आधारित) अपना लेने भर से फेसबुक की सारी समस्याएं हल नहीं हो जाने वाली हैं। इसके बावजूद बाहरी एजेंसियां चुनावों को प्रभावित कर सकती हैं, जनमत को प्रभावित करने के लिए गलत खबरें और विभाजनकारी सामग्री प्रसारित करवा सकती हैं। लेकिन विज्ञापन आधारित मॉडल को त्यागने से फेसबुक का दुरुपयोग करना कठिन हो जाएगा। लेकिन सब्सक्रिप्शन आधारित मंचों पर नेटवर्क बहुत प्रभावी नहीं रह जाएगा। फेसबुक ने नया मॉडल अपनाने की इच्छा जताई है। व्हाट्सएप कारोबार समूहों से अपने उत्पाद से संबंधित संदेशों को उपभोक्ताओं तक पहुंचाने के एवज में शुल्क लगाकर कमाई करता है। इसी हफ्ते फेसबुक ने कहा है कि वह प्रयोग के तौर पर सब्सक्रिप्शन आधारित मॉडल शुरू करेगा, जिसमें लोकप्रिय क्रिएटर अपनी पोस्ट तक पहुंच के लिए प्रति माह पांच डॉलर (यानी करीब सवा तीन सौ रुपये) शुल्क ले सकता है। यदि फेसबुक अपनी सारी सेवाओं के लिए महीने में पांच डॉलर शुल्क लेने लगे और अपने नेटवर्क से विभाजनकारी और दुरुपयोग की जा सकने वाली विज्ञापन श्रेणियों और व्यवहार को हटा दे तो? क्या उपयोगकर्ता विद्रोह कर देंगे और क्या किसी अन्य मुफ्त सोशल मीडिया ऐप का रुख कर लेंगे? क्या फेसबुक विज्ञापन से मिलने वाली आय के बिना ध्वस्त हो जाएगा?

शायद ऐसा हो सकता है। इस साल की इस सबसे बड़ी चुनौती से हम कुछ सीख सकते हैं, तो वह यह कि फेसबुक नेटवर्क जितना बड़ा होता जाएगा, उसकी समस्याएं उतनी ही जटिल होती जाएंगी, पर इन समस्याओं से निपटने की उसकी क्षमता बहुत सीमित है। संभव है कि जुकरबर्ग इन समस्याओं को सुलझाना चाहते हैं, पर यह तब तक नहीं सुलझ सकती, जब तक कि वह अपने बिजनेस मॉडल की कोई काट नहीं ढूंढ लेते, जोकि अभी उपयोगकर्ताओं के निजी डाटा पर टिका है।

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