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आठवें व्यक्ति का सवाल

Tue, 04 Jun 2013 10:40 PM IST
अनिल प्रकाश जोशी
अनिल प्रकाश जोशी Updated Tue, 04 Jun 2013 10:40 PM IST
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question of eighth person

अंतरराष्ट्रीय स्तर पर खाद्य सुरक्षा हमेशा एक बड़ा मुद्दा रही है। और ऐसा जरूरी भी है, क्योंकि जिससे जीवन संभव हो, वह प्राथमिकता में होना ही चाहिए।

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इस वर्ष पर्यावरण दिवस पर संयुक्त राष्ट्र ने खाद्य की बर्बादी पर सबका ध्यान खींचने की कोशिश की है, जो सामयिक भी है और आवश्यक भी। हवा, मिट्टी और पानी के पर्यावरण अवयवों का बड़ा उत्पाद भोजन ही है, जिस पर दुनिया टिकी है। भोजन के प्रति लापरवाही, अवहेलना और बर्बादी किसी भी रूप में स्वीकार नहीं की जा सकती।
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शास्त्रों में भोजन की बर्बादी को पाप का दर्जा दिया गया है।

आज यह बात सटीक बैठती है, जब दुनिया का हर आठवां व्यक्ति कुपोषण का शिकार है। संयुक्त राष्ट्र की एक रिपोर्ट के अनुसार, 2010-2012 में 86.8 करोड़ लोग भूखे रहे, जो दुनिया की आबादी का करीब 12.5 प्रतिशत है। इनमें से अधिकांश विकासशील देशों में रहते हैं, खासकर अफ्रीका और पूर्वोत्तर एशिया में। ऐसे में अन्न का क्षय अपराध से कम नहीं है।
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संयुक्त राष्ट्र की खाद्य एजेंसी के अनुसार, 1.3 अरब टन भोजन हर वर्ष बर्बाद हो जाता है। यह विश्व उत्पादन का लगभग एक-तिहाई है। एक तरफ भुखमरी और दूसरी तरफ अन्न की बर्बादी, यह अपराध से कम नहीं।

इसी रिपोर्ट के अनुसार, विकसित और विकासशील देश क्रमशः 67 तथा 63 करोड़ टन भोजन की बर्बादी करते हैं। अंतर सिर्फ इतना है कि विकसित देशों की बर्बादी का कारण उनकी भोजन शैली है, जबकि विकासशील देशों में भंडारण क्षमताओं की कमी के कारण यह होता है।

संरक्षण और पैकेजिंग का अभाव भी अन्न की बर्बादी का एक बड़ा कारण है। यदि बर्बादी पर ही अंकुश लग जाए, तो दुनिया में 100 करोड़ लोगों को भूख से निजात मिल जाएगी।

दुनिया भर के हालात का एक जायजा यह भी बताता है कि हर देश में खाद्यान्न की बर्बादी के मापदंड अलग-अलग हैं, और भिन्न देशों ने इसकी परिभाषा भी तय कर रखी है।

यह अमेरिका में अलग और यूरोप में कुछ और है। पर यह बर्बादी अन्न के पैदा होने से लेकर, प्रसंस्करण और उपभोग के चारों तरफ ही घूमती है। सही बीज, तकनीकी तथा पैदावार से जुड़ी निम्नस्तर विधियां भी इसका हिस्सा हैं। उत्पादन के बाद प्रसंस्करण, भंडारण आदि उपयुक्त साधनों के अभाव के कारण विकासशील देशों का ज्यादा बड़ा नुकसान हुआ है।

कुल मिलाकर, खाद्य सुरक्षा के बड़े सवाल विश्व भर में बहस का मुद्दा बन गए हैं। खास तौर से तब, जब दुनिया का एक बड़ा हिस्सा भुखमरी और कुपोषण का शिकार है।

संयुक्त राष्ट्र की एक अन्य रिपोर्ट के अनुसार, दुनिया में प्रति व्यक्ति सबसे ज्यादा भोजन की बर्बादी अमेरिका जैसे देशों में होती है। वहां प्रति व्यक्ति 295 किलोग्राम अन्न बर्बाद होता है, 185 किलोग्राम उत्पादन और भंडारण के दौरान और 110 किलोग्राम उपभोग के समय।

यूरोप और संपन्न एशियाई देशों में भी लगभग यही हालात हैं। दक्षिण-पूर्वी एशिया और अफ्रीका में भी उत्पादन और भंडारण के दौरान अनाज का नुकसान होता है, पर भोजन के समय यह नुकसान क्रमशः 15 व पांच किलोग्राम ही है, जो संपन्न देशों की तुलना में बहुत कम है।

मतलब साफ है कि बड़े देश उपभोग के दौरान भोजन की बर्बादी के ज्यादा जिम्मेदार हैं। विकसित और विकासशील देशों में यही बड़ा अंतर है। हालत यह है कि ब्रिटेन और अमेरिका में भोजन का हिस्सा 14 से 16 फीसदी हिस्सा खरीदने के बाद उपयोग में ही नहीं लाया जाता और कचरे में फेंक दिया जाता है।

ये तमाम जानकारियां इसी तरफ इशारा करती हैं कि कहीं न कहीं खाद्य प्रबंधन में खोट है। कहीं उत्पादन और भंडारण के कारण, तो कहीं डाइनिंग टेबल पर नुकसान उठाना पड़ता है।

अपने देश के हालात भी निराश करने वाले हैं। हमारे यहां 2004 में 58,000 करोड़ टन भोजन की बर्बादी हुई थी, जो आज घटकर लगभग 30,000 करोड़ टन है। फिर इससे भी अजीब बात यह भी है कि एक तरफ तो करोड़ों लोग भुखमरी के शिकार हैं, दूसरी तरफ अनाज के बर्बाद होने की खबर पर सर्वोच्च न्यायालय को सरकार को फटकारना पड़ता है।

विदेशों में जनसंख्या कम है, तो खाद्य बर्बादी वहां झेली जा सकती है। पर अपना देश, जो एक अरब बीस करोड़ की आबादी का आंकड़ा पार कर चुका है, इस तरह की लापरवाही अधिक दिनों तक वहन नहीं कर सकता। प्रधानमंत्री कुपोषण की स्थिति पर शर्मिंदगी व्यक्त कर चुके हैं, यदि अब भी ध्यान नहीं दिया गया, तो शर्मिंदा होने के मौके बार-बार आते रहेंगे।

किसी भी देश की स्थिरता उसके संसाधनों के संरक्षण व उत्पादन से जुड़ी है। खेती उसमें से एक महत्वपूर्ण संसाधन है। हमें खेती को अलग-थलग करके नहीं देखना चाहिए, खास तौर से तब, जब हम भूख के सूचकांक में मेडागास्कर और मोजांबिक जैसे देशों के नजदीक हों।


दुनिया में हमारी पहचान कृषि प्रधान देश के रूप में ही रही है। लिहाजा सबके लिए भोजन सामूहिक दायित्व तथा नैतिकता का हिस्सा है। मगर इस देश की सबसे बड़ी समस्या भंडारण और वितरण के बीच ही फंसी है। हम दोनों में ही विफल रहे हैं। फिर खाद्य प्रसंस्करण में भी देश काफी पिछड़ा है।
 
खाद्य सुरक्षा के लिए आवश्यक है कि कृषि उत्पादन, संरक्षण और प्रसंस्करण के साथ ही वितरण व संग्रहण प्रक्रिया को भी मजबूत बनाया जाए। असल में भोजन के प्रति नई दृष्टि की जरूरत है। समझने की जरूरत है कि खाद्य सुरक्षा देश के अधिसंख्यक लोगों के अस्तित्व से जुड़ी हुई है, यह विलासिता की चीज नहीं है।

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