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मुद्दा: बाढ़ के बाद पंजाब की दोहरी चुनौती... नागरिक पुनर्वास और सुरक्षा पुनर्वास दो भागों में करना जरूरी
Mon, 15 Sep 2025 06:26 AM IST
ज्योति भास्कर
चंद्रशेखर बेंजवाल
चंद्रशेखर बेंजवाल
Published by: ज्योति भास्कर
Updated Mon, 15 Sep 2025 06:26 AM IST
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पंजाब में बाढ़ (फाइल)
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संवाद
विस्तार
पंजाब में बाढ़ से फौरी राहत का मोर्चा तो पंजाबियों ने अपने जज्बे, हिम्मत और हौसले से फतह कर लिया। इसमें हरियाणा व पश्चिमी उत्तर प्रदेश की किसान बिरादरी की मदद और सरकारी एजेंसियों के सहयोग का भी बड़ा योगदान रहा। अब जब बाढ़ का पानी उतरने लगेगा, तो पुनर्निर्माण का कार्य तेजी पकड़ेगा। 1988 के बाद आई इस भयानक बाढ़ में सूबे के सभी 23 जिले बाढ़ग्रस्त हो गए और 55 लोगों की मौत हो गई। साढ़े तीन लाख से अधिक लोग इससे प्रभावित हुए। 4.32 लाख एकड़ से ज्यादा कृषि भूमि में खड़ी फसलें नष्ट हो गईं।
आगे का काम बहुत बड़ा है। बाढ़ के पानी में डूबी लाखों एकड़ जमीन में पानी के साथ आए रेत-पत्थर को निकालकर उसे फिर से खेती योग्य बनाना है। सैकड़ों निजी घर, सरकारी इमारतें ढह गईं, ग्रामीण सड़कें टूट गई हैं, इन सबका पुनर्निर्माण होना है। रावी, ब्यास व सतलुज नदियों के ध्वस्त हो चुके तटबंधों को फिर से खड़ा करना होगा। इसके अलावा, जो सबसे बड़ी चुनौती है, वह राष्ट्रीय सुरक्षा के लिहाज से काफी महत्वपूर्ण है।
पंजाब के पश्चिम में भारत और पाकिस्तान के बीच लगभग 553 किलोमीटर लंबी अंतरराष्ट्रीय सीमा है, जिसमें से थोड़ा-सा हिस्सा नदियों से बनाई गई सीमा का है और शेष 462 किलोमीटर जमीनी सरहद है, जिसे रेडक्लिफ लाइन कहा जाता है। पंजाब में आतंकवाद के चरम दौर में पाकिस्तान से घुसपैठ और हथियारों की आवाजाही रोकने के लिए 1988 से 1993 के बीच इस पूरी सीमा पर आठ से 12 फीट ऊंची कंटीली तार की फेंसिंग खड़ी की गई। साथ ही इनका विद्युतीकरण किया गया। रात में घुसपैठियों पर निगाह रखने के लिए फ्लडलाइट्स लगाई गई । निगरानी तंत्र को मजबूत बनाने के लिए इसमें मोशन सेंसर, थर्मल इमेजिंग डिवाइस, नाइट विजन कैमरे एवं अलार्म भी लगाए गए। नदी वाले क्षेत्रों में लेजर बाड़ लगाई गई है, जो इन्फ्रारेड और लेजर बीम से घुसपैठ का पता लगाती है और सैटेलाइट-आधारित सिग्नल सिस्टम से जुड़ी होती है। इस सरहद पर सीमा सुरक्षा बल की सख्त निगरानी और गश्त जारी रहती है। इसी प्रकार सीमा के उस पार पाक रेंजर्स भी चौकस रहते हैं। बाढ़ ने जन-धन की व्यापक हानि तो की ही, सीमा पर की गई सुरक्षा व्यवस्था को भी काफी नुकसान पहुंचाया है। कंटीली बाड़ क्षतिग्रस्त हो गई, सीमा सुरक्षा बल के कई पोस्ट जलमग्न हो गए। शुरुआती रिपोर्ट के मुताबिक, लगभग 30 किलोमीटर बाड़ क्षतिग्रस्त हुई है। यह आंकड़ा अधिक भी हो सकता है। अभी सेना व सुरक्षा बलों का भी ध्यान लोगों की मदद करने पर है। स्वाभाविक है कि जब बाड़ क्षतिग्रस्त हुई है, तो इससे जुड़े निगरानी तंत्र के दूसरे उपकरणों को भी उसी पैमाने पर नुकसान पहुंचा होगा।
यह नुकसान ऐसे समय हुआ है, जब पाकिस्तान के साथ हालिया युद्ध के बाद घुसपैठ की आशंकाएं अधिक प्रबल हैं। हालांकि, बाढ़ ने पाकिस्तान को भी नुकसान पहुंचाया है, लेकिन उसकी फितरत अपने घर को ठीक करने से ज्यादा, भारत को नुकसान पहुंचाने की रही है। पाकिस्तान की रणनीति हमेशा से दो स्तरों पर चलती रही है। एक ओर औपचारिक युद्ध, तो दूसरी ओर‘प्रॉक्सी वॉर’। सीमा पार से आतंकियों को भेजना, हथियारों की तस्करी करना, नशे की खेप पहुंचा कर पंजाब के युवाओं को अस्थिरता के रास्ते पर धकेलना इस रणनीति के अहम हिस्से हैं। युद्ध में हार या दबाव झेलने के बाद पाकिस्तान अक्सर ऐसे रास्ते अपनाता है, ताकि भारत के भीतर असंतोष, हिंसा और अराजकता का वातावरण बने।
ऐसे में पंजाब का पुनर्निर्माण केवल नागरिक जीवन तक सीमित नहीं है। खेतों को फिर आबाद करना, टूटे हुए घरों, दफ्तरों और स्कूलों को बनाना, सड़क नेटवर्क को दुरुस्त करना जितना जरूरी है, उतना ही जरूरी है कि सीमा पर सुरक्षा व्यवस्थाओं की बहाली और सुदृढ़ीकरण फौरन किया जाना। इसलिए पुनर्निर्माण का एजेंडा दो भागों में विभाजित होना चाहिए-नागरिक पुनर्वास और सुरक्षा पुनर्वास। इन दोनों के लिए केंद्र व राज्य के बीच बेहतर तालमेल होना चाहिए। यह दोहरा दायित्व न केवल पंजाब की बहादुरी का इम्तिहान है, बल्कि पूरे देश की एकजुटता और दृढ़ संकल्प की भी परीक्षा है।
पंजाब की चुनौती केवल एक सूबे की नहीं है, यह पूरे भारत की सुरक्षा से जुड़ी हुई है। अगर पंजाब की सीमा कमजोर पड़ती है, तो उसकी गूंज शेष देश तक सुनाई देती है। इसलिए जरूरी है कि केंद्र और राज्य सरकारें पुनर्निर्माण में धन और संसाधनों की कोई कमी न करें। पंजाब के पुनर्निर्माण का अर्थ है खेतों में हरियाली लौटाना, गांवों में मुस्कान लौटाना और साथ ही सीमा पर सुरक्षा के तंत्र को फिर से अभेद्य बनाना। लापरवाही की कोई गुंजाइश नहीं है और न ही यह परस्पर राजनीतिक दोषारोपण का समय है।
पंजाब की मिट्टी ने बार-बार आपदाओं का सामना किया है। यही आत्मबल अब फिर से जरूरी है। उम्मीद है, पंजाब की धरती इस चुनौती को भी पार कर फिर से समृद्धि और सुरक्षा का प्रतीक बनेगी।