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पोक्सो ऐक्ट

Wed, 24 Apr 2013 10:40 PM IST
Updated Wed, 24 Apr 2013 10:40 PM IST
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protection of children from sexual offences act

मुनिया के साथ हुए दुष्कर्म के मामले में एक स्वयंसेवी संस्था ने पोक्सो कानून (प्रोटेक्शन ऑफ चिल्ड्रेन फ्रॉम सेक्सुअल ऑफेंस ऐक्ट) का हवाला देते हुए दिल्ली पुलिस से कहा है कि वह आरोपियों की पहचान करने के लिए उनकी शिनाख्त परेड न कराए।

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इस कानून के मुताबिक, जघन्य अपराध की स्थिति में पीड़ित बच्चे को आरोपी की पहचान के लिए नहीं कहा जा सकता। पोक्सो कानून देश में 14 नवंबर, 2012 से लागू है। यह कानून 18 वर्ष से कम उम्र के बच्चों को हर तरह के यौन अपराधों से बचाने के लिए बनाया गया है।
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इसके तहत दोषियों के लिए कठोर सजा का प्रावधान है। इसमें प्रावधान है कि मामले की सुनवाई के लिए विशेष अदालत गठित की जाएगी, जो एक वर्ष के भीतर मामले का निपटारा करेगी।
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इसमें मामले की रिपोर्टिंग, सुबूतों की रिकॉर्डिंग, जांच एवं सुनवाई जैसी तमाम न्यायिक प्रक्रिया को बच्चों के अनुकूल बनाया गया है, जिसमें पीड़ित बच्चे के बयान की रिकॉर्डिंग सब इंस्पेक्टर रैंक से ऊपर की महिला अधिकारी द्वारा उसके घर या मनोवांछित जगह पर करने, तीस दिनों के भीतर सुबूत जुटाने और रात में बच्चों को थाने में नहीं रखने का प्रावधान भी किया गया है।

इसमें बयान लेते वक्त पीड़ित को अनुवादक, विशेषज्ञ एवं व्याख्या करने वाले की सहायता देने एवं निःशक्त बच्चों को विशेष शिक्षक या किसी परिचित की मदद देने के साथ माता-पिता या विश्वस्त अभिभावक के सामने चिकित्सकीय जांच करने का प्रावधान है।


यदि पीड़ित लड़की है, तो उसकी जांच महिला डॉक्टर ही करेगी। बच्चों को गवाही के लिए बार-बार नहीं बुलाने, सुनवाई के दौरान अवकाश देने एवं असुविधाजनक सवाल न पूछने एवं बंद कमरे में सुनवाई करने का भी इसमें प्रावधान है।

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