प्रियंका का जादू चलेगा?
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प्रियंका गांधी का करिश्मा मतदाताओं पर जादू करेगा या नहीं, यह कहना मुश्किल है, लेकिन अभी से स्पष्ट है कि प्रियंका का जादू मीडिया पर चल गया है। कांग्रेस पार्टी में महासचिव का पद संभालने के बाद पिछले सप्ताह जब वह पहली बार लखनऊ पहुंचीं, तो मीडिया ने उस घटना को इतना महत्वपूर्ण माना कि वह दिन भर टीवी के हर समाचार चैनल पर छाई रहीं। जाने-माने टीवी पत्रकारों ने इस घटना को प्रशंसा भरे शब्दों में पेश किया। मैंने जब अपने एक लेख में यह याद दिलाया कि वंशवाद लोकतंत्र के लिए अक्सर हानिकारक साबित होता है, तो एक वरिष्ठ मीडिया पंडित मेरे पीछे ही पड़ गए कि क्या परिवारवाद भारतीय जनता पार्टी में नहीं है? उन्होंने भाजपा के उन राजनेताओं के नाम गिनाए, जिनके बच्चे भी राजनीति में हैं। वह चुप तभी हुए, जब मैंने उन्हें ध्यान दिलाया कि मैंने वंशवाद का विरोध किया है, किसी एक दल में व्याप्त इस प्रथा का नहीं।
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राजनीति पर मैंने तब लिखना शुरू किया था, जब इंदिरा गांधी प्रधानमंत्री थीं। आपातकाल की आड़ में उन्होंने अपने बेटे संजय गांधी को अपना वारिस बनाया था। उस समय से मैं वंशवाद का विरोध करती आई हूं।
लेकिन मेरे अधिकतर पत्रकार साथियों को वंशवाद से कम, प्रेस सेंसरशिप से ज्यादा तकलीफ थी। लेकिन आपातकाल का जुल्म झेलने वाले वही पत्रकार जब इंदिरा जी के सामने आते थे, तो यों बिछ जाते थे, जैसे किसी फिल्मी सितारे के सामने उनके चाहने वाले बिछ जाते हैं। वे इंदिरा जी के ‘करिश्मे’ की बातें बिल्कुल वैसे ही किया करते थे, जैसे आज के पत्रकार प्रियंका के करिश्मे की कर रहे हैं। जैसे आज कहा जा रहा है कि प्रियंका जब कमरे में प्रवेश करती हैं, तो लोग चुप हो जाते हैं। कभी लोग उनकी दादी के बारे में भी वैसे ही कहा करते थे।
इस राज परिवार का दर्जा इतना ऊंचा है कि सोनिया गांधी के दौर में बहुत कम पंडितों ने यह कहने की हिम्मत दिखाई कि देश के असली प्रधानमंत्री पर हुकुम चलाकर उन्होंने इस पद की गरिमा को चोट पहुंचाई।
इस परिवार के ‘करिश्मे’ में इतनी शक्ति है कि राजीव गांधी के दौर में सिखों का जो नरसंहार हुआ था, उसका दोष कभी उन पर नहीं लगा। वहीं नरेंद्र मोदी का नाम अब भी 2002 के दंगों से जोड़ा जाता है। ऐसा क्यों? कुछ इसलिए कि वास्तव में हम पत्रकार इस राज परिवार का इतना सम्मान करते हैं कि हमारी बोलती बंद हो जाती है। कुछ इसलिए भी कि नेहरू-गांधी परिवार की पुरानी परंपरा रही है पत्रकारों को खुश रखने की।
सोनिया गांधी ने एक बार भी प्रेस कॉन्फ्रेंस नहीं की, लेकिन वह पत्रकारों को अक्सर अपने घर पर चाय पर बुलाया करती थीं।
उनके बेटे राहुल गांधी ने वर्ष 2014 के बाद पत्रकारों से मिलने की आदत डाल ली है। रही बात बहन प्रियंका की, तो बिना उन पत्रकारों के नाम लिए मैं आपको बता दूं कि वर्षों से प्रियंका गांधी की आदत रही है कुछ वरिष्ठ पत्रकारों के साथ रोज बातचीत करने की।
राजनीति में सक्रिय होने से पहले भी मीडिया में उनकी खूब चर्चा रही है, और जब भी हुई है, तो उनकी प्रशंसा ही हुई है। उनके पतिदेव की जब आलोचना की गई है, तो यह बात पहले स्पष्ट कर दी गई है कि जो भी उन्होंने कारोबार में किया है, उसमें प्रियंका का कोई हाथ नहीं है।
अब देखना यह है कि मीडिया के इस व्यापक समर्थन से प्रियंका गांधी कांग्रेस पार्टी की तकदीर बदल सकेंगी या नहीं।