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प्रेस की आजादी और नियंत्रण

Wed, 04 Apr 2018 07:18 PM IST
अवधेश कुमार
अवधेश कुमार Updated Wed, 04 Apr 2018 07:18 PM IST
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Press freedom and control
अवधेश कुमार

यह कहा जा सकता है कि प्रधानमंत्री ने अपनी सरकार को एक बड़े बवाल से बचा लिया है। फेक न्यूज या गलत समाचार देने संबंधी जो मार्गनिर्देश सूचना एवं प्रसारण मंत्रालय ने जारी किया था, उसके विरुद्ध व्यापक प्रतिक्रिया होनी निश्चित थी। न केवल पत्रकारों का एक बड़ा वर्ग इसका पुरजोर विरोध करता, विपक्ष भी इसे सरकार के खिलाफ बड़ा मुद्दा बनाता। इसे पत्रकारों के काम करने की स्वतंत्रता पर अंकुश से लेकर अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता का गला घोंटने वाला कदम साबित किया जाता। मोदी सरकार के सामने इस पर रक्षात्मक रुख अपनाने के अलावा कोई विकल्प ही नहीं बचता। 2019 के आम चुनाव के नजदीक आने के साथ वैसे ही विपक्ष मोदी सरकार के विरुद्ध पहले से ज्यादा आक्रामक है। अगर यह मार्गनिर्देश जारी रहता, तो इसे चुनाव में भी मुद्दा बनाया जा सकता था।


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यह निहायत ही गलत और आपत्तिजनक कदम था और अव्यावहारिक तो खैर था ही। इस समय फेक न्यूज को लेकर जो वातावरण है, उसमें कुछ लोगों को ऐसा लग सकता है कि सूचना एवं प्रसारण मंत्रालय का निर्णय बिल्कुल सही था। अगर पत्रकार गलत समाचार फैलाता है, तो फिर उसे किसी तरह की सजा होनी चाहिए। अगर उसे भय नहीं होगा, तो वह गलत समाचार देने का अभ्यस्त हो जाएगा। प्रश्न इसके उपाय को लेकर है। क्या सरकार को इसे रोकने के लिए किसी तरह का कदम उठाना चाहिए? इसका उत्तर है, नहीं। इसका समाधान मीडिया के भीतर से ही निकलने दिया जाए। वैसे भी देश में इतने मीडिया संस्थान हैं कि अगर कहीं गलत समाचार आता है, तो उसके समानांतर सही समाचार भी आता है। सरकार पत्रकारिता को नियंत्रित करने के लिए कोई कदम उठाए, यह लोकतंत्र की भावना के विरुद्ध है। दुर्भाग्य से राजनीति की सहनशीलता धीरे-धीरे कम हो रही है। अपनी सामान्य आलोचना भी नेताओं के एक बड़े वर्ग को नागवार गुजरती है। अपनी राजनीतिक विचारधारा के अनुकूल समाचार को सही तथा प्रतिकूल को गलत मानने के इस माहौल में इस मार्गनिर्देश के लागू होने के साथ दोनों संस्थानों के यहां शिकायतों की बाढ़ आ जाती।

कहा जा सकता है कि इसमें किसी बड़ी सजा का प्रावधान तो था नहीं। वैसे सूचना और प्रसारण मंत्रालय का यह कदम व्यावहारिक भी नहीं था। सूचना और प्रसारण मंत्री को यह पता होना चाहिए कि देश में जिन्हें मान्यता प्राप्त पत्रकार कहते हैं, उनकी संख्या कुल पत्रकारों का 2-3 प्रतिशत भी शायद ही होगा। इसलिए इससे ज्यादा अंतर भी नहीं आ सकता था। पता नहीं, कैसे यह मान लिया गया कि मान्यता रद्द करने का भय गलत समाचार के लिए निषेधकारी भूमिका निभाएगा। इस समय वेब पोर्टलों की बाढ़ आ गई है। उसमें कितने मान्यता प्राप्त पत्रकार हैं? वे सब खबर और विचार प्रकाशित-प्रसारित कर रहे हैं और मुख्य मीडिया भी उससे प्रभावित होता है। उनको आप किस तरह रोक सकते हैं? इसलिए इस तरह के उपाय का व्यापक प्रभाव होना भी नहीं था। इससे तो न खुदा ही मिला न विसाल-ए सनम न इधर के रहे न उधर के वाली स्थिति हो जाती।

सूचना और प्रसारण मंत्रालय के अधिकारियों को पत्रकारिता को किसी तरह नियंत्रित करने की जगह कुछ बेहतर बदलाव लाने का कदम उठाना चाहिए। मोदी सरकार के आने के बाद कुछ नया करने की उम्मीद थी। यानी वह पत्रकारों को मान्यता देने की व्यवस्था को खत्म कर दे। संस्थानों, पत्रकार संगठनों, प्रेस क्लबों आदि के परिचय पत्र पत्रकारों की पहचान के लिए पर्याप्त होना चाहिए। 

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