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राजनीति: गांधी-आंबेडकर और शराब वाला सुराज; पीके की घोषणा से उठीं संदेह की लहरें
Fri, 04 Oct 2024 06:52 AM IST
शिव शुक्ला
संजीव मिश्र
संजीव मिश्र
Published by: शिव शुक्ला
Updated Fri, 04 Oct 2024 06:52 AM IST
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जन सुराज के संयोजक प्रशांत किशोर
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विस्तार
बिहार को देश की राजनीति में बदलाव का प्रेरक कहा जाता है। उसी बिहार से एक और आवाज उठी है, प्रशांत किशोर यानी पीके की आवाज। उम्मीदों भरी इस आवाज ने राजनीतिक शुरुआत के लिए गांधी जयंती का दिन चुना और झंडे पर गांधी के साथ आंबेडकर का चित्र लगाने की बात भी कही, किंतु यह सुराज गांधी के स्वराज से बेहद अलग है। गांधी-आंबेडकर के साथ यह शराब वाला सुराज है, हालांकि गांधी और आंबेडकर, दोनों ही शराब के मुखर विरोधी और शराबबंदी के पूर्ण पक्षधर थे।
देश के विभिन्न राजनीतिक दलों की चुनावी रणनीति तैयार करने में मदद करने वाले प्रशांत किशोर अब खुद बिहार में राजनीतिक पारी खेलने की तैयारी में हैं। इसके लिए उन्होंने राष्ट्रपिता महात्मा गांधी के शस्त्र ‘पदयात्रा’ को सहारा बनाया है। उन्होंने अपनी नई पार्टी, जन सुराज पार्टी, की घोषणा के लिए गांधी जयंती का ही दिन चुना। ऐसा लग रहा था, मानो प्रशांत किशोर अपनी राजनीति को गांधी के स्वराज की अवधारणा से जोड़कर चलाना चाह रहे हैं। पार्टी की घोषणा वाले दिन प्रशांत ने गांधी के साथ आंबेडकर को भी जोड़ा और घोषणा की कि उनकी पार्टी के झंडे में महात्मा गांधी के साथ बाबा साहब आंबेडकर का भी चित्र होगा। इसके अलावा, प्रशांत किशोर ने एक और बड़ी घोषणा की। उन्होंने कहा कि उनकी सरकार बनने पर वह बिहार में अप्रैल 2016 से लागू शराबबंदी भी हटा देंगे।
बिहार में शराबबंदी हटाने और एक बार फिर शराब बेचने संबंधी प्रशांत किशोर की घोषणा गांधी और आंबेडकर के विचारों के विपरीत है, जिससे उनके ऊपर संदेह पैदा हो रहे हैं। दरअसल, महात्मा गांधी शराब के जोरदार विरोधी थे और यह बात देश के बच्चे-बच्चे को पता है। मोहनदास करमचंद गांधी ने अपनी किताब प्रोहिबिशन ऐट एनी कॉस्ट के पेज नौ पर लिखा था, ‘यदि मुझे एक घंटे के लिए पूरे भारत का तानाशाह बना दिया जाए, तो जो एक चीज मैं करूंगा, वह यह कि देश की तमाम शराब की दुकानों को बिना कोई मुआवजा दिए बंद कर दूंगा’। यहीं गांधी और प्रशांत किशोर के विचारों में अंतर साफ नजर आता है। गांधी सत्ता प्राप्त होने की स्थिति में एक घंटे के अंदर पूर्ण शराबबंदी की बात करते हैं, वहीं प्रशांत किशोर भी सत्ता मिलने पर एक घंटे के भीतर शराबबंदी हटाने की बात करते हैं।
महात्मा गांधी पूर्ण शराबबंदी से कम, किसी भी स्थिति को स्वीकार करने के लिए तैयार नहीं थे। लगभग सौ साल पहले 16 अप्रैल, 1925 को यंग इंडिया में गांधीजी ने लिखा था, ‘शराब कोई मामूली बात नहीं है। कोई भी नरम और आसान नीति इस भयानक बुराई से नहीं निपट सकती। पूर्ण निषेध के अलावा कोई भी उपाय लोगों को इस अभिशाप से नहीं बचा सकता।’ प्रशांत किशोर ने तर्क दिया है कि शराबबंदी से राज्य के राजस्व को नुकसान पहुंचता है। लेकिन महात्मा गांधी ने राजस्व के नुकसान को पूरी तरह खारिज कर दिया था। 25 जून, 1931 को यंग इंडिया में उन्होंने शराब से राजस्व अर्जित करने के स्थान पर अन्य खर्चे कम करने की बात लिखी थी।
यही नहीं, प्रशांत किशोर ने गांधी के साथ-साथ
डॉ. आंबेडकर को भी अपनी पार्टी के झंडे में शामिल कर इन दोनों महान नेताओं के आदर्शों पर चलने का संकेत िदया है। यह संयोग ही है कि गांधी की ही तरह आंबेडकर भी शराबबंदी के पक्षधर और शराब पीने के मुखर विरोधी थे। 1956 में बौद्ध धम्म ग्रहण करते समय डॉ. आंबेडकर द्वारा ली गईं 22 प्रतिज्ञाएं खासी चर्चित हैं, उनमें से एक है, ‘मैं शपथ लेता हूं कि शराब और नशा का सेवन नहीं करूंगा’। इससे स्पष्ट है कि बाबा साहब आंबेडकर शराब के किस हद तक विरोधी थे। ऐसे में यदि कोई व्यक्ति राजनीति की शुरुआत ही शराबबंदी के विरोध को लेकर करे और कहे कि सत्ता में आने के एक घंटे के भीतर वह राज्य में दोबारा शराब बिकवाने लगेगा, वह व्यक्ति बाबा साहब की वैचारिकी से कितना दूर है, यह बात स्पष्ट हो जाती है।
गांधी और आंबेडकर, दोनों ही शराब के उपयोग को लेकर स्पष्ट थे। वे नहीं चाहते थे कि देश में शराब की उपलब्धता को सुगम किया जाए। यही कारण है कि गांधी के राज्य गुजरात में 1960 में लागू की गई शराबबंदी को खत्म करने का साहस वहां की कोई भी सरकार नहीं कर पाई है। गुजरात के बाद मिजोरम, नगालैंड और बिहार में भी शराबबंदी लागू की गई। बिहार में नीतीश कुमार शराबबंदी लागू कर नायक बने, वहीं अब प्रशांत किशोर सत्ता की चाबी मिलते ही शराबबंदी समाप्त करने की बात कर रहे हैं। यदि ऐसा संभव हुआ, तो गांधी-आंबेडकर के साथ शराब वाला सुराज कैसा होगा, यह एक यक्ष प्रश्न है।