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यह सिर्फ पश्चिम एशिया की लड़ाई नहीं: अमेरिका के पास यूरोप और पश्चिम एशिया में योगदान का अवसर, ऐतिहासिक होगा...

Tue, 24 Jun 2025 07:19 AM IST
दीपक कुमार शर्मा थॉमस एल फ्रीडमैन, द न्यूयॉर्क टाइम्स
थॉमस एल फ्रीडमैन, द न्यूयॉर्क टाइम्स Published by: दीपक कुमार शर्मा Updated Tue, 24 Jun 2025 07:19 AM IST
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सार
अगर अमेरिका ईरान की शक्ति को कम करने के साथ-साथ द्वि-राष्ट्र समाधान की दिशा में काम कर सके और रूस का विरोध करने के लिए यूक्रेन की सहायता इस्राइल की तरह करे, तो वह यूरोप और पश्चिम एशिया, दोनों में शांति, सुरक्षा और समावेशिता में वास्तविक योगदान देगा, जो ऐतिहासिक होगा।
 
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Power tussle battle not just in Middle East US has historic Chance to contribute in Europe and West Asia peace
इस्राइल-ईरान तनाव - फोटो : PTI

विस्तार

ईरान के तीन प्रमुख परमाणु प्रतिष्ठानों पर अमेरिकी हमले को लेकर इतनी बातें हो रही हैं कि इनमें खो जाना आसान है, लेकिन मैं इस आख्यान को आकार देने वाले वैश्विक, क्षेत्रीय एवं स्थानीय ताकतों का पता लगाते हुए यह जानने की कोशिश करूंगा कि वास्तव में यहां हो क्या रहा है। यह एक बड़ा खेल है, जो सिर्फ पश्चिम एशिया तक सीमित नहीं है। जैसे व्लादिमीर पुतिन द्वारा यूक्रेन पर हमले का एकमात्र उद्देश्य यूक्रेन के लोकतंत्र को नक्शे से मिटाना और उसे रूस में शामिल करना है, उसी तरह 2023 में लेबनान, यमन और इराक में आतंक के ईरानी प्रतिनिधियों तथा हमास द्वारा इस्राइल पर हमला समावेशी ताकतों और प्रतिरोध की ताकतों के बीच वैश्विक संघर्ष है।



इस संघर्ष में एक तरफ वैसे नेता शामिल हैं, जिनका देश व्यापार से ज्यादा लाभ उठाता है, जो वैश्विक खतरे के खिलाफ ज्यादा सहयोग करते हैं और भले ही लोकतांत्रिक न हों, मगर ज्यादा सभ्य तरीके से शासन करते हैं, दूसरी तरफ वैसे नेता हैं, जो इन सब प्रवृत्तियों का विरोध करते हैं, क्योंकि संघर्ष उन्हें अपने नागरिकों का दमन करने, अपनी सेना को मजबूत करने और अपने राजकोष से पैसा चुराने में सक्षम बनाते हैं। समावेशी ताकतें तेजी से मजबूत होती जा रही थीं। संक्षेप में कहें, तो यूक्रेन पश्चिम में शामिल होने के लिए तैयार दिख रहा था और इस्राइल पश्चिम एशिया में शामिल होने के लिए। लेकिन पुतिन ने हमला करके यूक्रेन को पश्चिम में शामिल होने से रोक दिया और हमास तथा ईरान के दूसरे प्रतिनिधियों ने इस्राइल पर हमला करके उसे सऊदी अरब के निकट आने से रोक दिया।


रविवार की सुबह ईरान पर अमेरिकी हमले के बाद मेरे मन में पहला सवाल उठा कि क्या राष्ट्रपति ट्रंप समझते हैं कि इस वैश्विक संघर्ष में पुतिन किस तरफ हैं। ईरान और रूस करीबी सहयोगी हैं। ईरान ने यूक्रेन युद्ध में रूस को ड्रोन उपलब्ध करवाए हैं। मैं राष्ट्रपति ट्रंप को रूस पर बम गिराने के लिए नहीं कह रहा हूं, बल्कि यह कहना चाहता हूं कि वह यूक्रेन को इतना सैन्य, आर्थिक एवं कूटनीतिक सहयोग करें कि वह रूस का विरोध कर सके, ठीक उसी तरह जैसे अमेरिका हमास और ईरान को हराने के लिए इस्राइल की मदद कर रहा है। पुतिन और अयातुल्ला एक ही तरह की दुनिया चाहते हैं, जो तानाशाही, धर्मतंत्र एवं उनके भ्रष्टाचार के लिए सुरक्षित हो। वे एक ऐसी दुनिया चाहते हैं, जो व्यक्तिगत स्वतंत्रता, कानून के शासन, स्वतंत्र प्रेस की हवाओं से मुक्त हो; और जो स्वतंत्र विचारों वाले पड़ोसियों के विरुद्ध रूसी और ईरानी, दोनों साम्राज्यवाद के लिए सुरक्षित हो।

चीन हमेशा से दोनों खेमों में शामिल रहा है। इसकी अर्थव्यवस्था स्वस्थ और बढ़ी समावेशी दुनिया पर निर्भर करती है, लेकिन राजनीतिक नेतृत्व प्रतिरोधी दुनिया के साथ मजबूत संबंध बनाए रखता है। चीन ईरान से तेल खरीदता है, लेकिन हमेशा चिंतित रहता है कि अगर ईरान के पास परमाणु बम आ गया, तो वह एक दिन शिनजियांग के मुस्लिम अलगाववादियों को भी इसे मुहैया करा सकता है। ईरान से चीन की तेल खरीद तेहरान की बाहरी आय का बड़ा स्रोत है, जिसने ईरान को हमास, हिजबुल्ला और हाल तक सीरिया को वित्तपोषित करने में सक्षम बनाया। आइए, अब इस संघर्ष को विशुद्ध पश्चिम एशिया के नजरिये से देखें।

मैंने 1979 में बेरूत में एक युवा विदेशी संवाददाता के रूप में अपना कॅरिअर शुरू किया। यहां मैंने पहले वर्ष चार बड़ी खबरें कवर कीं-ईरान में इस्लामी क्रांति ने शाह को उखाड़ फेंका, सऊदी शासक परिवार को उखाड़ फेंकने की कोशिश कर रहे शुद्धतावादी जिहादियों द्वारा मक्का में ग्रैंड मस्जिद पर कब्जा, इस्राइल और मिस्र के बीच कैंप डेविड शांति संधि पर हस्ताक्षर तथा संयुक्त अरब अमीरात में दुबई में जेबेल अली बंदरगाह का उद्घाटन, जो दुनिया में सबसे बड़े बंदरगाहों में से एक बन गया। और फिर पश्चिम एशिया में समावेशी और प्रतिरोधी ताकतों के बीच एक विशाल क्षेत्रीय संघर्ष शुरू हुआ। एक तरफ वे देश थे, जो इस्राइल को स्वीकार करने के लिए तैयार थे, बशर्ते कि वह फलस्तीनियों के साथ प्रगति करे, और जो इस क्षेत्र को पश्चिम और पूर्व के साथ और अधिक घनिष्ठ रूप से जोड़ना चाहते थे। दूसरी ओर ईरान, मुस्लिम ब्रदरहुड और जिहादी सुन्नी आंदोलनों के नेतृत्व में प्रतिरोधी ताकतें खड़ी थीं, जो मूल रूप से 1979 के बाद सऊदी अरब में पनपीं और बाद में पूरे क्षेत्र की मस्जिदों तक अपना प्रभाव फैलाया। वे सभी इस क्षेत्र से पश्चिमी प्रभावों को खत्म करना चाहते थे।

अमेरिका और इस्राइल ने यह युद्ध अपनी सेनाओं के साथ लड़ा, जबकि अलकायदा और आईएसआईएस जैसे समूहों ने आतंकवादी समूहों के साथ यह युद्ध लड़ा और ईरान ने लेबनान, सीरिया, यमन और इराक में धीरे-धीरे छद्म सेनाओं का एक नेटवर्क बनाकर ऐसा किया, जिससे ईरान को अप्रत्यक्ष रूप से सभी चार देशों पर नियंत्रण करने और पश्चिमी तट व गाजा में भी पैर जमाने में मदद मिली। तेहरान में सत्ता परिवर्तन के खिलाफ चेतावनी देने वाले लोग अक्सर इराक का उदाहरण देते हैं। लेकिन यह तुलना गलत है। इराक में अमेरिका का राष्ट्र-निर्माण प्रयास कई वर्षों तक मुख्यतः ईरान के कारण विफल रहा। कह नहीं सकता कि अगर ईरान में शासन गिर गया, तो वहां क्या होगा। लेकिन मौजूदा संघर्ष के अंत के लिए यही एकमात्र शर्त नहीं है।

कभी कभी एक ही समय में दो विरोधाभासी चीजें सच हो सकती हैं। आज उन द्वंद्वों में से एक यह है कि इस्राइल एक लोकतंत्र है, लेकिन इसकी सरकार खुले तौर पर पश्चिमी तट और संभवतः गाजा को भी अपने में मिलाने की इच्छा रखती है। यह आकांक्षा अमेरिकी हितों, इस्राइली हितों और दुनिया भर के यहूदियों के हितों के लिए एक बुनियादी खतरा है। यदि हम इस क्षेत्र में समावेशी ताकतों की विजय देखना चाहते हैं, तो ट्रंप ने आज जो सैन्य कार्य किया है, वह आवश्यक है, लेकिन पर्याप्त नहीं। यदि ट्रंप ईरान की शक्ति को कम करने के साथ-साथ द्वि-राष्ट्र समाधान की दिशा में काम कर सकें और रूस का विरोध करने के लिए यूक्रेन की सहायता इस्राइल की तरह करें, तो वह यूरोप और पश्चिम एशिया, दोनों में शांति, सुरक्षा और समावेशिता में वास्तविक योगदान देंगे, जो ऐतिहासिक होगा।

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