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आलू की भी कोई इज्जत है

Tue, 04 Nov 2014 07:41 PM IST
सुधाकर आशावादी
सुधाकर आशावादी Updated Tue, 04 Nov 2014 07:41 PM IST
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Potato have respect too

सब्जी मंडी के ग्राहक हमेशा प्याज और टमाटर के ही नखरे क्यों सहें? आखिर आलू की भी कोई इज्जत है! जब देखो, लोग मुझे कम करके आंकते रहते हैं। मेरी मार्केट वैल्यू इतनी गिरा दी गई कि कोई चीज बहुतायत में उपलब्ध होने पर उसे आलू बता दिया जाता है। कभी मुझे सड़कों पर फेंक दिया जाता है। कभी किसान खेतों के किनारे मुझे फेंककर चले जाते हैं। मैं अपने दुर्भाग्य पर रोता रहता हूं।

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मेरे साथ शुरू से ही भेदभाव होता रहा है। मेरे दाम बढ़ने पर समोसे के दाम बढ़ जाते हैं। लेकिन मेरे भाव घटने पर समोसे के दाम नहीं घटते। हमें उपजाने वाला किसान मार्केटिंग के मंत्र जो नहीं जानता। चिप्स मुझसे ही बनता है, लेकिन वह कितना अपमार्केट है और मैं कितना डाउनमार्केट! क्या मेरा कोई भाव नहीं है? मैं सोचता ही रहता था कि काश, मेरे भी अच्छे दिन आएं। वह दिन आ गया है। अब विदेशों से आलू आयात की बात की जा रही है। आम आदमी की पहुंच से दूर होकर अब मैं भी वीआईपी बनने की राह पर हूं।
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अब ढूंढो मुझे अपनी रसोई में! मटर की चाट अब मेरे अभाव में अपने जायकेदार स्वाद से भटक चुकी है। समोसे का तो खैर मेरे बगैर कोई वजूद ही नहीं है। कई लोग मेरे साथ अपना नाम जोड़कर प्रसिद्ध हो जाना चाहते थे। वे कहते थे, जब तक रहेगा समोसे में आलू, तब तक रहेंगे वे भी चालू। समोसे में आलू तो रहा, मगर वह चालू नहीं रह सके। उनकी लालटेन बुझने-बुझने को है। उन्हें पता चल रहा होगा कि किसी का मजाक उड़ाना कितना नुकसानदेह हो सकता है। मैं सिर्फ समोसे का आलू नहीं, आम आदमी की थाली का आलू हूं।
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गरीब मजदूर डबल रोटी के चार पीस में गरमा-गरम दो समोसे भरकर कई बार अपना लंच कार्यक्रम संपन्न कर लिया करता था। अब मैं उसकी पहुंच से दूर हो चुका हूं। आलू महंगा होने के कारण मजदूर लोग अब मिर्च और प्याज पर भरोसा करेंगे। पर इसमें मेरा क्या कुसूर है? मेरी भी कोई कीमत है। आलू कहकर चिढ़ाने वाले सुन लें-मैं किसी से कम नहीं।

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