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आसियान के बाजार से उम्मीद

Tue, 30 Apr 2013 10:34 PM IST
Updated Tue, 30 Apr 2013 10:34 PM IST
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possibilities and hope of asean markets

हाल ही में देश से निर्यात को बढ़ावा देने के लिए वर्तमान पंचवर्षीय विदेश व्यापार नीति के तहत कुछ पूरक प्रोत्साहनों की घोषणा की गई है, इसके बावजूद मुश्किलें कम नहीं हैं और निर्यात लक्ष्य पूरा करना कठिन है।

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निर्यात प्रोत्साहनों के परिप्रेक्ष्य में सरकार की प्राथमिकता टेक्सटाइल, इंजीनियरिंग एवं हैंडलूम जैसे श्रमोन्मुखी क्षेत्रों के पुनरुद्धार पर केंद्रित रही है। विशेष आर्थिक जोन (एसईजेड) के पुनरुत्थान के लिए एक विशेष पैकेज की घोषणा की गई है।
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वस्तुतः देश में विदेश व्यापार के बढ़ते हुए घाटे के कारण निर्यात बढ़ाने की जरूरत अहम हो गई है। मगर नवीनतम आंकड़े बता रहे हैं कि वर्ष 2012-13 के दौरान वस्तुओं के कुल निर्यात में वर्ष 2011-12 के मुकाबले 1.75 फीसदी की गिरावट दर्ज की गई है।
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हमारे निर्यात के परंपरागत बाजारों में कठिनाइयां हैं, वहीं हमें विश्व निर्यात बाजार में विभिन्न देशों से मिल रही चुनौतियों का सामना भी करना पड़ रहा है। भारत को सबसे बड़ी निर्यात चुनौती चीन से मिल रही है। विश्व निर्यात में भारत का हिस्सा एक फीसदी है, वहीं चीन का हिस्सा दस फीसदी है।

जिन देशों के साथ भारत के मुक्त व्यापार समझौते (एफटीए) हुए हैं, उनमें से अधिकांश देशों के साथ चीन के भी एफटीए हैं। चीन कम श्रम लागत के कारण अपने उत्पादों को कम कीमत पर दुनिया के कोने-कोने में पहुंचा रहा है। निर्यात उद्योगों के लिए चीन में करों में रियायतें, बिजली की सस्ती और सुगम उपलब्धि तथा बुनियादी ढांचे की भारी सुविधाएं चीन को दुनिया का प्रमुखतम निर्यातक देश बनाए हुए है।

इतना ही नहीं भारत के मुकाबले कई छोटे-छोटे देश मसलन बांग्लादेश, वियतनाम, थाईलैंड ने अपने निर्यातकों को सुविधाएं देकर भारतीय निर्यातकों के सामने कड़ी प्रतिस्पर्धा खड़ी कर दी। ऐसी स्थिति में भारतीय निर्यात को वैश्विक बाजार में प्रतिस्पर्धी बनाने की ऐसी रणनीति अपनानी होगी, जिससे निर्यात की प्रगति दर बढ़ाई जा सके।

निर्यातकों की एक बड़ी मांग निर्यात ऋणों पर ब्याज दर को कम करने की रही है। भारत के सबसे बड़े प्रतिस्पर्धी चीन में निर्यात ऋणों पर ब्याज दर बेहद कम लगभग दो से तीन फीसदी के आसपास है। जबकि भारत में यह नौ फीसदी के आसपास है। यह किसी से छिपा नहीं है कि भारत के निर्यात घटने के पीछे अमेरिका और यूरोपीय देशों की आर्थिक बदहाली सबसे प्रमुख कारण है।

हालांकि अमेरिका की अर्थव्यवस्था में इस वर्ष धीरे-धीरे सुधार हो रहा है, लेकिन अब भी यूरोजोन देशों की अर्थव्यवस्था खतरों का सामना कर रही है। भारत के कुल निर्यात का लगभग 35 प्रतिशत अमेरिका और यूरोप के बाजार से जुड़ा हुआ है।

अब भी इन देशों में भारतीय निर्यात के जो क्षेत्र सबसे ज्यादा प्रभावित हो रहे हैं, उनमें रत्न और आभूषण, चमड़ा, कपड़ा, सूचना प्रौद्योगिक, दवाई और कुछ अन्य सेवा क्षेत्र शामिल हैं। अमेरिका और यूरोप के बाजारों में भारत के जो निर्यात लक्ष्य गड़बड़ा गए हैं, उनकी पूर्ति के लिए अन्य देशों के बाजारों में जगह बनाना मुश्किल बना हुआ है।

यूरोपीय आर्थिक बदहाली के बीच यूरोप और अमेरिका में अपने निर्यात तथा उद्योग-कारोबार को बचाने के लिए जिस तरह कई देश सस्ती ब्याज दरों की बौछारें कर रहे हैं, वैसी अपेक्षाएं भारतीय निर्यातकों को भी हैं। अब भारत में भी ब्याज दर घटाकर ऋण को सस्ता करना होगा। इसके साथ ही निर्यातक इकाइयों को सस्ती और सुगम बिजली उपलब्ध करानी होगी और करों में रियायतें देनी होंगी।

हमें हमारे निर्यात के परंपरागत बाजारों में नई निर्यात संभावना को आगे बढ़ाना होगा। बीते वित्तीय वर्ष 2012-13 में भारत से यूरोप को करीब पांच अरब डॉलर के परिधानों का निर्यात किया गया। यदि भारत का यूरोपीय संघ (ईयू) के साथ मुक्त व्यापार समझौता हो जाता है, तो यूरोप को परिधान निर्यात 30-40 फीसदी बढ़ जाएगा। हमें निर्यात के नए बाजारों के परिप्रेक्ष्य में आसियान देशों के लिए और अधिक रणनीतिक प्रयास करने होंगे।

चूंकि भारत की विभिन्न आर्थिक उपयोगिताओं के कारण आसियान देश भी भारत से सहयोग वृद्धि की उमीद रखते हैं और आसियान देश समुद्री सीमाओं पर चीन के क्षेत्रीय और दबावपूर्ण मंसूबों से त्रस्त हैं, इसलिए वे लोकतांत्रिक भारत को अपना समुद्री मित्र मानते हुए भारत से आर्थिक संबंधों में उपयोगिता देख रहे हैं। आसियान देशों के उद्यमी भारत में बदले हुए निवेश परिदृश्य का भरपूर फायदा उठा सकते हैं।

बढ़ते हुए मध्यवर्ग के कारण भारत को क्रय शक्ति वाले खरीदारों का बड़ा बाजार माना जा रहा है। इसमें कोई दो राय नहीं हो सकती कि भारत ने लुक ईस्ट नीति की अहमियत काफी देर से समझी है। लेकिन अब भारत को आसियान क्षेत्र में अपनी छाप छोड़ने के साथ-साथ वहां के बाजारों में चमकीली व्यापार निर्यात संभावनाओं को साकार करने के लिए चीन की तरह प्रतिस्पर्धी देश के रूप में मजबूत कदम बढ़ाने होंगे।

हमें अन्य देशों के निर्यात बाजारों के लिए भी रणनीतिक प्रयास करने होंगे। अफ्रीका और लैटिन अमेरिकी देशों में भारत के निर्यात को बढ़ावा देने के लिए और कारगर कदम उठाने होंगे। पड़ोसी देशों पाकिस्तान, बांग्लादेश, म्यांमार, श्रीलंका, भूटान, थाईलैंड और नेपाल के साथ निर्यात बढ़ाने की नई कोशिशें जरूरी होंगी। ब्रिक्स देशों के साथ-साथ खाड़ी देशों में भारत की निर्यात कोशिशें बढ़ानी होगी।


लैटिन अमेरिकी देशों खासतौर से चिली, कोलंबिया, डोमिनिकन रिपब्लिक, कोस्टारिका, पनामा, पेरू और त्रिनिदाद व टोबेगो में निर्यात बढ़ाने की नई रणनीति पर भी ध्यान देना होगा। यदि इन सब बातों पर ध्यान दिया गया, तो निश्चित रूप से निर्यात की डगर पर भारत की मुश्किलें कम होंगी और विदेश व्यापार के घाटे को कम किया जा सकेगा।

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