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सवाल: प्रत्याशी के नाम की जल्द घोषणा से पार्टी को क्या हासिल होता है? यह केवल प्रयोग या कुछ और हैं इसके मायने

Mon, 28 Aug 2023 06:28 AM IST
Vijay Vidrohi विजय विद्रोही
Updated Mon, 28 Aug 2023 06:28 AM IST
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सार
कर्नाटक में कांग्रेस ने तारीखों के एलान से पहले ही 224 में से 112 नाम घोषित कर दिए थे। यह काम मायावती पहले किया करती थीं। देखा-देखी अरविंद केजरीवाल ने इस रणनीति को अपनाया था। ऐसे में, सवाल उठता है कि नामों की जल्द घोषणा से पार्टी विशेष को क्या हासिल होता है?
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Politics: What does party gain by the early announcement of candidate's name before election?
भाजपा-कांग्रेस - फोटो : Social Media

विस्तार

भाजपा ने मध्य प्रदेश में 39 और छत्तीसगढ़ में 21 उम्मीदवारों की घोषणा कर दी है। इन दोनों राज्यों के साथ-साथ राजस्थान में चुनाव आयोग अक्तूबर के मध्य में अधिसूचना जारी करेगा, लेकिन 60 उम्मीदवारों के नाम घोषित किए जा चुके हैं। माना जा रहा है कि सितंबर में कांग्रेस राजस्थान में करीब सौ और छत्तीसगढ़ में 25 से 30 उम्मीदवारों की घोषणा कर देगी। भाजपा भी राजस्थान में अगले कुछ दिनों में करीब 50 नामों का एलान कर सकती है।



कर्नाटक में कांग्रेस ने तारीखों के एलान से पहले ही 224 में से 112 नाम घोषित कर दिए थे। यह काम मायावती पहले किया करती थीं। देखा-देखी अरविंद केजरीवाल ने इस रणनीति को अपनाया था। ऐसे में, सवाल उठता है कि नामों की जल्द घोषणा से पार्टी विशेष को क्या हासिल होता है। क्या यह पार्टी विशेष के आत्मविश्वास को दिखाता है? क्या ऐसा सोशल मीडिया में चर्चा के लिए किया जाता है? क्या यह विपक्ष को भरमाने के लिए किया जाता ह? क्या ऐसा करने पर समर्थकों में जीत का जोश बढ़ता है?


ऐसे कई सवालों का जवाब देने से पहले थोड़ा-सा गणित समझ लेते हैं। भाजपा विधानसभा सीटों को चार श्रेणियों में बांटती है। पहली श्रेणी में पक्की सीटें होती हैं। जाहिर है, इन पर नाम की घोषणा करना सबसे आसान काम है। दूसरी में ऐसी करीब-करीब पक्की सीटें होती हैं, जहां जीत की संभावना ज्यादा होती है। तीसरी में आधी पक्की-आधी कच्ची सीटें होती हैं, जहां पार्टी मानकर चलती है कि ज्यादा जोर लगाया जाए, तो सीट निकाली जा सकती है। चौथी में सबसे कमजोर सीटें आती हैं, जहां पार्टी को भी पता होता है कि पार पाना लगभग असंभव है। अब पहली और चौथी श्रेणी के नाम जल्दी घोषित हों या देर से, कोई फर्क नहीं पड़ता। सबसे ज्यादा दिक्कत तो बीच की श्रेणियों में होती है। जबकि कांग्रेस में तीन ही श्रेणियां बनाई जाती हैं। पक्की, कच्ची-पक्की और पूरी तरह कच्ची। इस बार कांग्रेस ने भी चार श्रेणियां बनाई हैं। उसकी नजर में 27 सीटें अति कमजोर हैं। जबकि भाजपा 19 सीटों को अति कमजोर मानकर चल रही है। उदाहरण के रूप में, राजस्थान में कुल 200 सीटें हैं। भाजपा ने पिछली बार 73 सीटें जीती थी। अब पार्टी को देखना है कि जीते हुए उन विधायकों में कितनों को दोबारा टिकट दिए जाएं।

एक वक्त था कि सिटिंग गेटिंग फॉर्मूला चलता था, यानी मौजूदा जीते हुए विधायकों को तो रिपीट करना ही है। अब ऐसा नहीं चलता, क्योंकि राजस्थान में पिछले चार बार के विधानसभा चुनावों का निचोड़ बताता है कि 60 से 65 विधायक ही रिपीट होते हैं। इस हिसाब से, भाजपा को देखना होगा कि 73 में से करीब 40 के टिकट काट दिए जाने चाहिए या नहीं? कांग्रेस के पास निर्दलीय मिलाकर 120 विधायक हैं और वह सत्ता में है। लिहाजा, कांग्रेस को तो करीब 80 के टिकट काटने होंगे। पर ऐसा होता नहीं है, क्योंकि हारे हुए उम्मीदवारों में से भी कई टिकट मिलने पर अपनी खोई हुई सीट निकालने में कामयाब हो जाते हैं।

यहां केरल में वाम मोर्चे की सरकार का उल्लेख करना जरूरी है। मुख्यमंत्री पी विजयन ने दो बार के जीते विधायकों (जिनमें से कुछ मंत्री भी थे) के टिकट पिछले विधानसभा चुनाव में काट दिए थे, ताकि नई पीढ़ी को मौका दिया जा सके। कैडर आधारित पार्टी ने आलाकमान का निर्देश चुपचाप मान लिया और विजयन ने हर बार सरकार बदलने की परंपरा को तोड़ते हुए पुनः सत्ता हासिल की। पर ऐसा जोखिम भाजपा और कांग्रेस उठाने का साहस शायद ही करें! टिकट काटने में दिक्कत यही है कि कुछ बागी हो जाते हैं, कुछ भितरघात करते हैं और कुछ विरोधी खेमे को जिताने में लग जाते हैं। कई बार बड़ा दल छोटे दल के साथ समझौता करता है, और खुद की जीती हुई सीट भी समझौते में बलि चढ़ जाती है।

राजस्थान का ही उदाहरण बताता है कि हर बार मौजूदा सरकार के मंत्रिमंडल में शामिल करीब एक तिहाई मंत्री भी विधानसभा का मुंह नहीं देख पाते। पर मंत्रियों के टिकट इसलिए भी नहीं काटे जाते, क्योंकि ऐसा करने पर नैरेटिव निगेटिव हो जाता है और विपक्ष इसका फायदा उठाता है। कुल मिलाकर, विधानसभा सीट की जीत का कोई तयशुदा आश्वस्त फॉर्मूला नहीं है। होता, तो इतनी कवायद की जरूरत ही नहीं पड़ती। हर दल अपने हिसाब से प्रयोग करता है। जो कामयाब होता है, वह चाणक्य कहलाता है। इस हिसाब से देखा जाए, तो चुनाव की घोषणा से पहले उम्मीदवारों की घोषणा एक प्रयोग ही है।

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