फ्री ई-पेपर
पर्सनलाइज़्ड फ़ीड
पर्सनलाइज़्ड नोटिफ़िकेशन
चलते-फिरते ख़बरें
लॉयल्टी रिवॉर्ड्स
डाउनलोड करें

सब्सक्राइब करें
Hindi News ›   Columns ›   Opinion ›   Politics of words meaning of words like democratic-socialist-secular 50th anniversary of Emergency can probe

शब्दों की राजनीति: लोकतांत्रिक-समाजवादी-धर्मनिरपेक्ष जैसे शब्दों के अर्थ.. आपातकाल की 50वीं वर्षगांठ पर पड़ताल

Fri, 11 Jul 2025 07:02 AM IST
SPrasannarajan प्रसन्नराजन एस प्रसन्नराजन
Updated Fri, 11 Jul 2025 07:02 AM IST
विज्ञापन
सार
उत्तर कोरिया हो, चीन या फिर भारत, इस बात के उदाहरण हैं कि राजनीति में लोकतांत्रिक, समाजवादी और धर्मनिरपेक्ष जैसे शब्द अपने अर्थ कैसे खो देते हैं। आपातकाल की 50वीं वर्षगांठ इस पड़ताल का उचित समय हो सकता था कि क्या संविधान की प्रस्तावना में किया गया बदलाव गणतंत्र को गलत तरीके से पेश करता है?
loader
Politics of words meaning of words like democratic-socialist-secular 50th anniversary of Emergency can probe
संविधान और इसके शब्दों पर राजनीति (सांकेतिक) - फोटो : अमर उजाला प्रिंट / एजेंसी

विस्तार

राजनीति में शब्द कभी-कभी अपना अर्थ खो देते हैं। हां, यह जरूर है कि उनमें शक्तिहीन लोगों को ऐसी दुनिया में पहुंचाने की ताकत जरूर होती है, जहां वास्तविकता विचारधारा से ढक जाती है। जब इन्हीं शब्दों का प्रयोग क्रांतियों के विजेताओं और तख्तापलट के षड्यंत्रकारियों द्वारा किया जाता है, तब वे इनके जरिये आदर्शवाद की एक नई शब्दावली गढ़ने का प्रयास करते हैं।



भाषा द्वारा राजनीतिक छल के जो शब्द इतिहास में प्रचलित हैं, उनमें सबसे लोकप्रिय हैं-लोकतांत्रिक, समाजवादी, जनता का, इस्लामी, धर्मनिरपेक्ष इत्यादि। मसलन, आप जानते ही हैं कि द डेमोक्रेटिक पीपुल्स रिपब्लिक ऑफ कोरिया कितना बड़ा मजाक है। इसके संस्थापक, महान नेता किम इल सुंग के समय से लेकर समाजवाद की शाश्वत सत्ता के वर्तमान कर्णधार, प्रतिभाशाली कॉमरेड किम जोंग उन तक, उत्तर कोरिया ने अपनी अन्य आधिकारिक बुराइयों के अलावा, सर्वोच्च नेता के देवत्व के मामले में भी उच्चतम भाषाई मानदंड स्थापित किए हैं।


इन्हें एक ऐसी सत्ता माना गया है, जिसे उदात्त विशेषणों द्वारा पौराणिक दायरे में ऊपर उठाया गया है। हर्मिट किंगडम (उत्तर कोरिया) यानी शेष दुनिया से कटे हुए एक देश में डेमोक्रेटिक का मतलब अनुपस्थिति और पीपुल्स का मतलब अपमान होता है। जॉर्ज ऑरवेल की कालजयी पुस्तक 1984 के प्रकाशित होने से नौ महीने पहले किम के साम्राज्य में यह पीपुल्स डेमोक्रेटिक रिपब्लिक बन गया। पीपुल्स रिपब्लिक ऑफ चाइना का उदाहरण भी देख सकते हैं। समाजवाद जीवित नेताओं को महान कर्णधार से लेकर सर्वोच्च नेता और कद्दावर राजनीतिक छवि जैसे अलंकृत शब्दों से ममी बना देता है। पीपुल्स रिपब्लिक में क्रांति ने अपने उत्कर्ष काल में शब्दकोश पर धावा बोलकर माओवाद को गरजने वाले मुहावरों में कैद कर लिया-महान छलांग लगाकर आगे बढ़ो, सौ फूल खिलने दो, मुख्यालय पर बमबारी करो...।

पीपुल्स रिपब्लिक, भले ही लोगों को देंग शिआयोपिंग के सिद्धांत के साथ समृद्ध होने का गौरवपूर्ण उपदेश देता है, फिर भी वह तथाकथित पांचवें आधुनिकीकरण : लोकतंत्र को लागू करने के प्रति बहुत अधिक अनिश्चित है। माओ के बच्चे भले ही मार्क्स को मैकडोनल्ड्स तक ले आए हों, लेकिन पीपुल्स रिपब्लिक को एक ऐसे भविष्य का डर है, जहां लोग अपनी अंतरात्मा की आवाज को उजागर करेंगे।

अब जरा इस्लामी गणराज्यों की ओर आइए और देखिए कि किस प्रकार पुस्तक की महिमा से प्रेरित क्रांतिकारियों ने विध्वंस और दमन का धर्मतंत्र चलाया। इस्लामी गणतंत्र ईरान में, बंकर बस्टरों द्वारा बुरी तरह क्षतिग्रस्त हो चुकी क्रांति ने सोचा कि केवल यूरेनियम का गुप्त संवर्धन ही इसके जीवन को बढ़ा सकता है। इसके प्रत्यक्ष और छद्म युद्ध दुश्मन को खत्म नहीं कर सके; उन्होंने केवल इस्राइल की उन पड़ोसियों के बीच जीवित रहने की इच्छा को मजबूत किया, जो इसके अस्तित्व पर ही विवाद करते हैं। इसके बावजूद, इस्लामी गणराज्य नागरिक समाज का इस्लामीकरण नहीं कर सका। ऐसा लगता है कि ऊपर वाली सत्ता ने अंततः क्रांति को त्याग दिया है।

दूसरा इस्लामी गणराज्य भले ही धर्मतंत्र न हो, लेकिन वहां भी इस्लाम एक कमजोर लोकतांत्रिक आवरण वाले सैन्य शासन की स्वैच्छिक सेवा में है। पाकिस्तान भी दुश्मनों से रक्षा के बहाने ही अपने सीमा-पार आतंक को आगे बढ़ाता है। दूसरे इस्लामिक गणराज्यों की तरह, पाकिस्तान ने भी अपने लोकतांत्रिक पड़ोसी (भारत) के साथ घातक प्रतिशोध को उकसाया। ऐसा लगता है कि इस्लामी गणराज्य आतंक के व्यापार के प्रति ज्यादा इच्छुक है। इसे विडंबना ही कहेंगे कि पाकिस्तान आतंकवाद के खिलाफ युद्ध पर वैश्विक सौदे भी करता है।

हाल ही में संपूर्ण प्रभुत्व संपन्न समाजवादी धर्मनिरपेक्ष लोकतांत्रिक गणराज्य भारत ने एक ऐसी घटना की 50वीं वर्षगांठ पर चर्चा शुरू की, जिसने संस्थापकों द्वारा कल्पित विशेषणों को अस्वीकार कर दिया था। जब कोई नेता गणतंत्र की संप्रभुता और लोकतंत्र से खतरा महसूस करता है, तो विडंबना का कोई स्थान नहीं होता। आपातकाल भारत के सबसे लोकप्रिय और कृपालु नेताओं में से एक द्वारा संविधान से इतर विध्वंस था। व्यामोह और वंशवादी विशेषाधिकार की दोहरी शक्तियों से प्रेरित उनके अधिनायकवादी प्रलोभन में, संकटग्रस्त भारत माता की भूमिका निभाते हुए इंदिरा ने भारत को वह देने से मना कर दिया, जिसका वादा संविधान ने अपनी सुंदर प्रस्तावना में किया था। और उन्होंने संविधान में वैचारिक रूप से महत्वपूर्ण दो शब्दों को शामिल करके गणतंत्र के चरित्र में एक आधारभूत बदलाव लाया-समाजवादी और धर्मनिरपेक्ष। यह नामकरण की तानाशाही द्वारा स्वतंत्रता का गला घोंटने का एक और उदाहरण था, जब भारत के लोकतंत्र के सबसे काले क्षण में, भारतीय संविधान में सोवियत संघ से उधार लेकर एक शब्द जोड़ दिया गया।

संविधान निर्माताओं का कभी भी गणतंत्र को वैचारिक रूप से सीमित करने का इरादा नहीं था। नेहरू-गांधी के समय की राष्ट्र-निर्माण परियोजना ने सोवियत कारखाने से प्रगति के अपने औजार उधार लिए थे-समाजवादी होना एक राष्ट्रीय तात्कालिकता थी। और धर्मनिरपेक्ष होना नेहरूवादी नए मनुष्य के निर्माण के लिए एक आवश्यक शर्त थी, जो राष्ट्र और धर्म के आह्वान का प्रतिरोधी था। राजवंश के समाजवादी-धर्मनिरपेक्ष आधार ने न केवल बाजार को सीमित किया, बल्कि अल्पसंख्यक बस्तियों का विस्तार किया। संविधान को नए सिरे से परिभाषित करके इंदिरा गांधी ने अपने और नेहरू के आचरण को आधिकारिक मान्यता दे दी और गणतंत्र के मूल आदर्शों का उल्लंघन किया। आपातकाल की 50वीं वर्षगांठ गणतंत्र के मूल चरित्र की ओर लौटने का एक अच्छा समय था।

आज के भारत में ‘समाजवादी’ और ‘धर्मनिरपेक्ष’ शब्दों की असंगति को हू आर वी में राष्ट्रीय स्तर पर दुस्साहसी सांस्कृतिक परिप्रेक्ष्य द्वारा दर्शाया गया है। आर्थिक रूप से असमान गणराज्य में विकास की राजनीति में समाजवाद के अवशेष अब भी मौजूद हो सकते हैं। धर्मनिरपेक्षता अब भारत के प्रमुख धर्म की प्रवृत्ति या लोगों की अपनी राष्ट्रीय पहचान के प्रति बढ़ती जागरूकता को प्रतिबंधित नहीं करती है। इसलिए सवाल यह है: क्या संविधान की प्रस्तावना में किया गया बदलाव गणतंत्र को गलत तरीके से पेश करता है? राजनीतिक हताशा में जोड़े गए शब्द नई राष्ट्रीय भावना का वर्णन करने के लिए बेहद अपर्याप्त हैं।

विज्ञापन
विज्ञापन
विज्ञापन
विज्ञापन
विज्ञापन

Next Article

Followed