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देश की राजनीति: कांग्रेस को विपक्षी दलों से चुनौती

Wed, 13 Oct 2021 03:25 AM IST
Awadhesh Kumar अवधेश कुमार
Updated Wed, 13 Oct 2021 03:25 AM IST
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सार
बंगाल के बाद तृणमूल पूर्वोत्तर में खासकर त्रिपुरा और असम में अगर मुख्य राजनीति की भूमिका निभाने के लिए कवायद कर रही है, तो उसके निशाने पर कांग्रेस ही है। सुष्मिता देव को शामिल कर उसने राज्यसभा में भेजा, तो इसका संकेत बिल्कुल साफ था। 
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Politics of the country: Challenge to Congress from opposition parties
कांग्रेस - फोटो : अमर उजाला

विस्तार

देश में इस समय राजनीति भाजपा बनाम विपक्ष की अवश्य दिख रही हो, लेकिन गहराई से देखेंगे, तो परिदृश्य काफी अलग नजर आएगा। ममता बनर्जी ने अपनी पार्टी के मुखपत्र जागो बांग्ला के दुर्गा पूजा विशेषांक में एक लेख लिखा है। उसमें उन्होंने कहा है कि तृणमूल आज कांग्रेस से अधिक प्रभावी है। देश के लोगों ने फासीवादी भगवा पार्टी को हटाकर एक नया भारत बनाने की जिम्मेदारी तृणमूल पर डाली है। इस लेख का शीर्षक है 'दिल्लिर डाक', जिसका मतलब 'दिल्ली की पुकार' है। यह लेख इस बात का संकेत है कि आने वाले समय में भाजपा विरोधी राष्ट्रीय नेतृत्व को लेकर मुख्य दावा तृणमूल करने वाली है। इसमें अगर कोई एक पार्टी सबसे ज्यादा प्रभावित होगी, तो वह है कांग्रेस।



तृणमूल का तेवर कांग्रेस के प्रति प्रतिकूल ही है। लखीमपुर खीरी कांड को लेकर राहुल गांधी ने जब कहा कि तृणमूल कांग्रेस और दूसरे विपक्ष के नेताओं को वहां जाने दिया जा रहा है और हमें नहीं तो कुणाल घोष ने बयान दिया कि हम पार्ट टाइम पॉलीटिशियन नहीं हैं। बताने की आवश्यकता नहीं कि उनके ये तीखे शब्द किसकी ओर लक्षित थे। सच तो यह है कि भाजपा के कारण कांग्रेस को उतना नुकसान नहीं हुआ है, जितना उन पार्टियों के कारण जो विपक्ष में हैं या जिनके साथ कांग्रेस ने यूपीए के दौरान या फिर राज्यों में सत्ता का गठबंधन किया।


बंगाल के बाद तृणमूल पूर्वोत्तर में खासकर त्रिपुरा और असम में अगर मुख्य राजनीति की भूमिका निभाने के लिए कवायद कर रही है, तो उसके निशाने पर कांग्रेस ही है। सुष्मिता देव को शामिल कर उसने राज्यसभा में भेजा, तो इसका संकेत बिल्कुल साफ था। वहीं गोवा में पूर्व मुख्यमंत्री और कांग्रेस के वरिष्ठ नेता लुइजिन्हो फर्नांडो पार्टी से त्यागपत्र देकर तृणमूल की सदस्यता ग्रहण की और उनके साथ कई कार्यकर्ता नेता चले गए। इससे शिवसेना और एनसीपी भी चौकन्नी हो गई है।

तृणमूल भाजपा के खिलाफ जिस तरह आक्रामक है, उससे उसके पक्ष में और मुस्लिम वोटों का ध्रुवीकरण हो सकता है। कांग्रेस के रणनीतिकारों को तृणमूल के रवैए को देखते हुए चौकन्ना होना चाहिए था। इसकी अनदेखी कर राहुल गांधी और प्रियंका वाड्रा केवल भाजपा को ही दुश्मन मानकर पूरी राजनीति को अंजाम दे रहे हैं। आप जरा पूर्व की यूपीए सरकार में शामिल या समर्थन देने वाली या केंद्र में भाजपा विरोधी गठबंधन में सक्रिय पार्टियों वाले राज्यों की ओर नजर दौड़ाइए। 

उत्तर प्रदेश में भाजपा ने कांग्रेस का जनाधार अवश्य खींचा, लेकिन आज अगर वहां वह मृतप्राय है, तो इसका मूल कारण समाजवादी पार्टी और बसपा का जनाधार बढ़ना है। बिहार में लालू प्रसाद यादव ने योजनाबद्ध तरीके से एक पार्टी के रूप में कांग्रेस को रसातल में पहुंचा दिया। आंध्र में तेलुगू देशम का जन्म कांग्रेस के विरुद्ध गुस्से से हुआ था, लेकिन आज जगनमोहन रेड्डी के नेतृत्व में वाईएसआर कांग्रेस ने कांग्रेस का जनाजा निकाल दिया। 

तेलंगाना में तेलंगाना राष्ट्र समिति ने कांग्रेस को खत्म किया, उसका बचा-खुचा जनाधार भाजपा की ओर जा रहा है। तमिलनाडु में अन्नाद्रमुक, द्रमुक और दूसरी पार्टियों ने कांग्रेस को खंडित किया। ओडिशा में यद्यपि भाजपा का जनाधार बढ़ा है, लेकिन कांग्रेस वहां नवीन पटनायक के बीजू जनता दल का मुख्य ग्रास बनी। महाराष्ट्र में क्या कांग्रेस सिर्फ भाजपा के कारण चौथे नंबर की पार्टी है? सभी जानते हैं कि राकांपा की ताकत कांग्रेस के पूर्व जनाधार में ही निहित है। 

इस समय महाविकास अघाड़ी की दूसरी साझेदार शिवसेना भी कांग्रेस को कमजोर करने में लगी है। जहां कांग्रेस की लड़ाई सीधे भाजपा से है, वहां आज भी उसका अस्तित्व कायम है। मध्य प्रदेश, छत्तीसगढ़, राजस्थान और गुजरात इसके प्रमाण हैं। दिल्ली में जब तक भाजपा बनाम कांग्रेस की राजनीति थी, उसका अस्तित्व बचा हुआ था। आम आदमी पार्टी के आविर्भाव के साथ वह खत्म हो गई।

कुल मिलाकर निष्कर्ष यह है कि कांग्रेस इस सच्चाई को समझे कि भारत में सर्वशक्तिशाली पार्टी होने से लेकर एक दुर्बल पार्टी की उसकी दुर्दशा के पीछे मुख्य भूमिका भाजपा की नहीं, वरन भाजपा विरोधी दलों की है। इसे वह जितनी जल्दी समझ ले, तो वर्तमान के साथ उसे अपना भविष्य भी नजर आएगा।

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