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कोरोना काल में सेवा की राजनीति
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सांकेतिक तस्वीर
- फोटो : अमर उजाला
भारतीय राजनीति में कोरोना महामारी के इस अप्रत्याशित संकट ने एक महत्वपूर्ण परिवर्तन ला दिया है। यह परिवर्तन है ‘सेवा की राजनीति को राजनीतिक गतिविधियों’ के केंद्र में लाकर खड़ा कर देना। सेवा जिसे प्रायः समाज सुधार संगठनों, सेवाभावी संस्थाओं और धार्मिक संस्थाओं का काम माना जाता था, आज सत्ता एवं जनतांत्रिक शक्ति की राजनीति करने वाली संस्थाओं को भी जरूरी लगने लगा है।
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स्वामी विवेकानंद एवं महात्मा गांधी जैसे दृष्टिसंपन्न सामाजिक, धार्मिक एवं राजनीतिक नेताओं ने सेवा को ही समाज में हर प्रकार की सामाजिक गतिविधियों का मूल माना। महात्मा गांधी ने तो राष्ट्रीय मुक्ति की लड़ाई को भी समाज में उपेक्षितों की सेवा से जोड़ दिया था। राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ ने अपनी स्थापना के समय से सेवा कार्य को अपनी संस्थागत प्रतिबद्धता से जोड़ते हुए ‘सेवा प्रभाग’ ही बना दिया।
अपने एक प्रकल्प ‘सेवा भारती’ के माध्यम से संघ ने प्राकृतिक एवं राष्ट्रीय आपदाओं, उपेक्षित एवं दूरस्थ क्षेत्रों के जन समुदायों एवं बेबस सामाजिक समूहों के बीच सेवा कार्य को गति दी। आज कोविड-19 के संकट में भी सेवा कार्य में राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ के अनेक प्रकल्प सक्रिय हैं। भारतीय जनता पार्टी भी सेवा को अपनी राजनीति से देश के कई भागों में भी जोड़ती रही है। आज जब वह केंद्र एवं देश के कई राज्यों में सत्ता में है, तब उन जगहों पर शासन एवं प्रशासन के माध्यम से आज के संकट से वह जूझ रही है।
कोरोना संकट आने के पूर्व ही अपने दूसरे कार्यकाल के आरंभ में प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने कहीं कहा था, 'भारत में अब सेवा की ओर उन्मुख राजनीति ही होनी चाहिए।' प्रधानमंत्री की इस बात का भारतीय राजनीति एवं उनके संगठन पर कितना असर पड़ा, यह तो कहना मुश्किल है। किंतु इस कोरोना विषाणु ने भारतीय राजनीति को सेवा कार्य की ओर उन्मुख तो कर ही दिया।
मुख्य विपक्षी पार्टी भारतीय राष्ट्रीय कांग्रेस ने भी, जिसकी कई राज्यों में सरकार है, सेवा की राजनीति को एक नई राजनीति के रूप में प्रस्तावित किया है। कांग्रेस महासचिव एवं उत्तर प्रदेश की प्रभारी प्रियंका गांधी ने भी अपनी राजनीति को सेवा से जोड़ने की कोशिश की है। उनके इधर आ रहे तमाम बयानों में ‘सेवा’ शब्द बार-बार आता दिखता है।
यों भी आपदाओं एवं विपदाओं की काट तो सेवा ही होती है, और सेवा को सकर्मक परिवर्तन की राजनीति में बदल देना एक राजनीतिक कार्य है, जिसे करने में कांग्रेस विशेषकर उत्तर प्रदेश में सक्रिय दिख रही है। जिस उत्तर प्रदेश में कांग्रेस सांगठनिक स्तर पर कमजोर थी और उसके कार्यकर्ताओं में सत्ता सुख का आकर्षण हिलोरें मारता रहता था, वहां आज वे सड़कों पर और ऑनलाइन संवादों में सक्रिय तथा कोरोना प्रभावितों को राशन बांटने, सामुदायिक रसोईघर चलाने एवं मास्क-सैनिटाइजर बांटने की ओर गतिशील हैं।
यह कांग्रेस की कार्य संस्कृति में आया एक बड़ा परिवर्तन है। पहले भी कांग्रेस में कांग्रेस सेवा दल नाम का संगठन सेवा कार्य आधारित संगठन के रूप में कार्य कर रहा था, किंतु यह संगठन कभी भी कांग्रेस की मुख्यधारा में जगह नहीं पा सका था। सेवा कार्य की ओर कांग्रेस की राजनीति के शिफ्ट होने को क्या उस पर संघ के सेवा बोध का प्रभाव माना जाए? एक कांग्रेसी नेता का कहना था कि कांग्रेस इसके माध्यम से महात्मा गांधी के दिखाए रास्ते की ओर बढ़ रही है।
प्रियंका गांधी प्रवासियों को घर पहुंचाने के लिए बस मुहैया कराने के अपने प्रस्ताव को ‘सेवा कार्य’ शब्द से ही परिभाषित करती रही हैं। उत्तर प्रदेश की राजनीति में समाजवादी पार्टी के नेता अखिलेश यादव ने भी इधर अपने संगठन और कार्यकर्ताओं को कोरोना आपदा में निरीह, बेबस समूहों की मद्द के लिए प्रेरित किया है। मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ ने, जो नाथपंथ से जुड़े हैं और जिसमें सेवा भाव का काफी महत्व है, सत्ता एवं नौकरशाही को कोरोना संकट में शासन से सेवा की ओर उन्मुख किया है।
ऐसा नहीं कि यह परिवर्तन सिर्फ उत्तर प्रदेश की राजनीति में हो रहा है। राजनीति में उभर रही यह प्रवृति देश के अन्य भागों में भी घटित होती दिख रही है। जो नेता मात्र बयानबाजी, ट्विटर पर संवाद लिखने या राजनीतिक लाभ-हानि, देने-लेने के भंवर में फंसे थे, वे भी आज ‘सेवा राजनीति’ की ओर जाने के लिए बाध्य हैं।
सेवा की राजनीति आपदा के दबाव में प्रभावी हो रही है, या किसी पुनर्जागरण पुरुष के विचार के प्रभाव में, इस विवाद में न भी फंसें, तो दो बातें साफ दिखती हैं-एक तो जनतांत्रिक सत्ता की राजनीति में यह एक नई प्रवृत्ति है, जो आगामी भारतीय जनतांत्रिक राजनीति की दिशा एवं दशा तय करने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाएगी।
दूसरा, सेवा भाव उस सामाजिक एवं राजनीतिक जीवन स्वार्थ एवं लोलुपता के भाव का निषेध भी है, जो मानवीय क्रूरता को जन्म देती है। सेवा शब्द इस बार भारतीय राजनीति में एक पाखंड की तरह नहीं, वरन सहयोग के भाव से जुड़कर आ रहा है। किंतु यह सच्ची सेवा भावना उत्तर कोरोना काल में कितने समय तक कायम रहती है, यह हमें देखना होगा।
सेवा शब्द कहने से ही इस राजनीतिक परिवर्तन का सही अर्थ समझ में आ जाए, और भविष्य में नेताओं तथा राजनीतिक दलों को अपनी ईमानदारी साबित करने के लिए ‘सच्ची या सच्चा’ शब्द जोड़ने की जरूरत न पड़े, तो यह ज्यादा अच्छा होगा। भारतीय राजनीति का नैतिक पक्ष भी शायद इस सेवा भाव के विस्तार, विकास एवं पुनःप्राप्ति से ही सबल होगा।