फ्री ई-पेपर
पर्सनलाइज़्ड फ़ीड
पर्सनलाइज़्ड नोटिफ़िकेशन
चलते-फिरते ख़बरें
लॉयल्टी रिवॉर्ड्स
डाउनलोड करें

सब्सक्राइब करें
Hindi News ›   Columns ›   Opinion ›   Politics of Electricity

बिजली का राजनीतिक खेल

Fri, 16 Mar 2018 07:16 PM IST
एलिजाबेथ चटर्जी
एलिजाबेथ चटर्जी Updated Fri, 16 Mar 2018 07:16 PM IST
विज्ञापन
Politics of Electricity
बिजली कटौती

आखिर भारत के कुछ राज्यों में अन्य राज्यों की तुलना में अक्सर अधिक बार बिजली क्यों चली जाती है? भारत ने हाल ही में उत्पादन क्षमता और ग्रामीण विद्युतीकरण में उल्लेखनीय सुधार किया है, लेकिन अब भी ऐसे कई क्षेत्र हैं जो कि कम भुगतान, कम निवेश के दुश्चक्र में फंसे हुए हैं और उनका प्रदर्शन बेहद खराब है। 2010 में विश्व बैंक ने अनुमान लगाया था कि भारत में बिजली की कमी की लागत सकल घरेलू उत्पाद (जीडीपी) के सात फीसदी के बराबर थी। इस खराब प्रदर्शन में एकरूपता नहीं है। वितरण व्यवस्था में उपभोक्ताओं तक बिजली पहुंचाने की जिम्मेदारी राज्य सरकारों के पास होती है, इसकी वजह से राष्ट्रीय परिदृश्य में काफी उतार-चढ़ाव नजर आता है। ऐसे में भारतीय संघीय व्यवस्था एक ऐसी प्रयोगशाला की पेशकश करती है, जिसमें देखा जा सके कि आखिर किस तरह का बिजली सुधार कारगर होगा और क्यों।


loader

यही 'मैपिंग पॉवर' नामक सहयोगात्मक परियोजना का प्रस्थान बिंदु था, जिसके जरिये पंद्रह बड़े राज्यों में बिजली व्यवस्था की पड़ताल की जानी थी। हमने 2016 में करीब तीन सौ मौजूदा और सेवानिवृत्त नौकरशाहों, राजनीतिकों, नियामकों, उद्योगपतियों, इंजीनियरों और उपभोक्ताओं के समूहों से बात की, ताकि प्रत्येक राज्य में बिजली की राजनीति के इतिहास का खाका खींचा जा सके। इन सारे पंद्रह राज्यों में मेरे शोध का केंद्र रहा पश्चिम बंगाल सुधार की सफलता के मामले में खासतौर से चुनावी (अ) स्थिरता के संदर्भ में दो आयामों में बहुत ही दिलचस्प ढंग से सामने आया। रिफॉर्म डिजाइन यानी सुधार का खाका और पॉलिटिकल डिटरमिनेंट्स यानी राजनीतिक निर्धारक।

1990 के दशक में विद्युत सुधार का तथाकथित मानक मॉडल वैश्विक रूप से फैला, जिसमें राज्यों के एकाधिकार को तोड़कर निजीकरण, स्वतंत्र नियामक और प्रतिस्पर्धा को बढ़ावा दिया गया। लेकिन दुनियाभर में कैलिफोर्निया से लेकर युगांडा और पाकिस्तान तक में इसके नतीजे अक्सर हताश करने वाले थे। ऐसे प्रमाणों का सर्वे करते हुए पश्चिम बंगाल के वरिष्ठ नौकरशाहों, उपयोगिता प्रबंधकों और सलाहकारों की सुधार से जुड़ी टीम ने 'सब जगह एक ही जैसा मॉडल' को खारिज कर दिया। इसके बजाय उन्होंने नवोन्मेषी स्थानीय सुधार का रास्ता चुना। 2005 की शुरुआत में हुए सुधारों ने निजीकरण के जटिल मुद्दे को दरकिनार कर राज्य का स्वामित्व बरकरार रखा और बिजली को राजनीतिक हस्तक्षेप से बचाने की पहल भी की। मानक मॉडल की स्वतंत्र एजेंसियों पर निर्भरता के विपरीत सुधारकों ने बिजली के क्षेत्र में आंतरिक सुधार पर ध्यान केंद्रित किया। वास्तव में स्वतंत्र निदेशकों को भी लाया गया था। जैसा कि इससे पता चलता है कि सुधारकों ने सरकारी स्वामित्व के प्रति अपनी प्रतिबद्धता को लेकर अड़ियल रुख नहीं अपनाया और बाहरी सलाहकारों और तकनीकी विशेषज्ञों की सेवाएं लेने के साथ ही बिल संग्रह जैसे काम आउटसोर्स किए। प्रबंधकों ने भ्रष्टाचार और काहिली जैसी मानवीय कमजोरियों को कम करने के लिए प्रौद्योगिकी का सहारा लिया और दूर से पढ़े जा सकने वाले मीटर तथा कंप्यूटरीकरण का विस्तार किया। एक महत्वपूर्ण सुधारकर्ता ने मुझसे कहा कि उनका लक्ष्य लाभ के स्तर तक पहुंचना था, ताकि सरकार से वित्तीय स्वतंत्रता सुनिश्चित हो सके।

इस मॉडल ने शुरुआत में नाटकीय सफलता अर्जित की। पारेषण और वितरण ह्रास, जोकि अक्षमता का सूचक है और बिजली चोरी को 2001 के 40 फीसदी की तुलना में 2008 में कम कर 23 फीसदी करने में सफलता मिली। पश्चिम बंगाल में जहां 2002 में 30 करोड़ डॉलर का घाटा था, वहीं यह राज्य 2011 में बिजली से मुनाफा कमाने वाले तीन राज्यों में शामिल हो गया। इस अवधि में ग्रामीण घरों में बिजली की पहुंच का आंकड़ा दोगुना होकर 40.3 फीसदी हो गया; सरकार आज दावा करती है कि अब यह 90 फीसदी है। 2011 के आसपास विश्व बैंक के आकलन में, पश्चिम बंगाल की वितरण कंपनी को केवल गुजरात के चौथे क्रम के ठीक पीछे स्थान दिया गया था। वास्तव में, जबकि व्यापार-अनुकूल गुजरात को आम तौर पर समाजवादी पश्चिम बंगाल के प्रतिद्वंद्वी के रूप में देखा जाता है, पर इसने बिजली सुधार का जो मॉडल अपनाया था, वह महत्वपूर्ण कारकों में उसी के जैसा हैः आंतरिक उपयोगिता प्रशासन पर बल (जिसमें लोगों और प्रक्रिया दोनों पर ध्यान दिया गया), यूनियनों पर जीत, तकनीकी समाधानों की प्राथमिकता, और निजीकरण का अस्वीकार तथा नियामक मंचों में लोकप्रिय भागीदारी।
 
पश्चिम बंगाल ने राजनीतिक स्थिरता का अनूठा उदाहरण पेश किया, जब वहां 1977 से 2011 के बीच 34 वर्षों तक माकपा की अगुआई वाली वामपंथी सरकार रही। 2011 में उसे मिली पराजय के बाद वहां एक पार्टी का प्रभुत्व खत्म हुआ और प्रतिस्पर्धी राजनीति की शुरुआत हुई।

लोकतांत्रिक दलगत राजनीतिक प्रतिस्पर्धा राजनेताओं को सार्वजनिक जिम्मेदारी अच्छे से पूरा करने लिए बाध्य करती है। भारत में राजनीतिकों को दोबारा चुनाव जीतने की फिक्र सताती है और वे तात्कालिक लाभ देने वाले कदम मसलन, सब्सिडी या नए बिजली कनेक्शन की पेशकश करते हैं, बजाय बिजली सुधार जैसे दीर्घकालीन कदम उठाने के। उत्तर प्रदेश जैसे राजनीतिक रूप से प्रतिस्पर्धी प्रदेश में निजीकरण और बिजली सुधार बार-बार बाधित होते हैं और वित्तीय घाटा बढ़ता जाता है। पश्चिम बंगाल में तृणमूल कांग्रेस के सत्ता में आने के बाद वहां का राजनीतिक परिदृश्य प्रतिस्पर्धी हो गया और बिजली सुधार की प्रक्रिया में स्थिरता आ गई, क्योंकि राजनेता बिजली की दरें बढ़ाए जाने जैसे अलोकप्रिय कदम के खिलाफ हैं। हम गुजरात (1998 से भाजपा शासित)) और दिल्ली (1998-2013 के बीच कांग्रेस शासित) राज्यों में सरकारों की स्थिरता और बिजली सुधारों के बीच के संबंध को देख सकते हैं। जाहिर है, बिजली सुधार को लेकर एक मॉडल सब जगह लागू नहीं हो सकता।
 
लेखिका शिकागो विश्वविद्यालय से संबद्ध हैं

विज्ञापन
विज्ञापन
विज्ञापन
विज्ञापन
विज्ञापन

Next Article

Followed