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शहादत का सियासी सौदा
शंभूनाथ शुक्ल
Updated Mon, 18 Mar 2013 01:23 PM IST
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घमंडी सिंह आर्य पहले पुलिस अधिकारी थे, जिन्हें पूर्वोत्तर की आतंकी हिंसा में जान गंवानी पड़ी थी। वह लंबे समय तक कानपुर के पुलिस प्रमुख रह चुके थे, इसलिए उनका शव कानपुर लाया गया।
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इस घटना को करीब चालीस साल हो चुके हैं। उनकी अंत्येष्टि में दसियों हजार लोगों ने हिस्सा लिया था। पर वह भीड़ किसी नेता की अगवानी के लिए नहीं, बल्कि जांबाज पुलिस अधिकारी को श्रद्धांजलि देने के लिए जुटी थी।
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उस समय न तो उनके बेटे ने, न ही उनकी पत्नी ने यह मांग की थी कि मुख्यमंत्री या केंद्रीय गृह मंत्री शवयात्रा में शरीक हों। इटावा से लेकर औरय्या तक चंबल और यमुना के बीहड़ों में डकैतों से मुकाबला करते कई पुलिस अधिकारी मारे गए।
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बांदा और चित्रकूट में ददुआ और ठोकिया ने भी कई पुलिस अधिकारी मारे। लेकिन न किसी के परिवार ने मुआवजा मांगा, न ही बदले में समान स्तर की नौकरी। दंगा रोकने की कोशिश में कानपुर के ही एक एडीएम को जान गंवानी पड़ी थी।
पर राज्य सरकार ने वोट बैंक को नाखुश न करने के इरादे से उस हत्याकांड के जांच की फाइल ही बंद करवा दी। ऐसा ही जुलाई, 2011 में मुरादाबाद के एक गांव में हुआ, जहां डीआईजी को एक समुदाय विशेष के लोगों ने मारा। डीएम और एसएसपी भाग निकले। लेकिन सपा सरकार ने जांच की फाइल बंद करवा दी।
पर अब प्रतापगढ़ में भीड़ की हिंसा का शिकार हुए डीएसपी जियाउल हक की हत्या के बाद से अखिलेश सरकार अपने वोट बैंक को लेकर इतना परेशान हो गई कि फटाफट मुख्यमंत्री वहां गए और परिजनों को नौकरियां व मुआवजा देने की घोषणा कर आए।
जियाउल हक की पत्नी ने न सिर्फ अपने लिए, बल्कि अपने जीजा और भाई के लिए भी नौकरी मांगी। उन्होंने यह भी कहा कि उन्हें उनके पति की जगह डीएसपी बनाया जाए। इस दुखद कांड का अंजाम यह हुआ कि जियाउल हक के पिता ने बहू के खिलाफ झंडा उठा लिया।
वोट बैंक को खुश करने की इस राजनीति के कारण ही अब श्रीनगर में मारे गए जालौन जिले के एक जवान अवध बिहारी के परिवार वालों ने कहा कि जब तक मुख्यमंत्री उनके गांव नहीं आएंगे, वे अवध बिहारी का अंतिम संस्कार नहीं करेंगे।
भावनाओं के रथ पर सवार होकर राजनीति की बुलंदियां छूने की कोशिशें यहीं आकर दम तोड़ देती हैं। अगर आप डीएसपी जियाउल हक की हत्या पर प्रतापगढ़ व देवरिया जा सकते हैं, तो फिर अवध बिहारी के गांव जाना भी एक राजनीतिक मजबूरी है।
वोट बैंक की तुष्टिकरण का यह खेल अस्सी के दशक के बाद से शुरू हुआ था, जब बेहमई हत्याकांड में दोषी फूलन देवी को उत्तर प्रदेश की पुलिस मार देने अथवा गिरफ्तार कर जेल में सड़ा देने पर तुली थी और दूसरी तरफ मध्य प्रदेश के मुख्यमंत्री अर्जुन सिंह उसे पकड़ कर अपने प्रदेश की जेल में बतौर विशेष दर्जा प्राप्त कैदी रखना चाहते थे।
तब दोनों ही राज्यों में कांग्रेस की सरकारें थीं। अंत में जीत मध्य प्रदेश की हुई। लेकिन जल्द ही फूलन देवी कांग्रेस और मध्य प्रदेश के चंगुल से निकल गईं और सपा ने उसे दो बार मिर्जापुर से लोकसभा में भिजवा दिया। सपा को फूलन के सहारे मल्लाह और अति पिछड़ी जातियों का वृहत वोट बैंक दिखाई पड़ रहा था।
वोट बैंक की वही राजनीति फिर चल रही है। डीएसपी जियाउल हक के सहारे सपा मुस्लिम वोट बैंक को अपने पाले में लाना चाहती है, जबकि कांग्रेस सीबीआई के सहारे उन्हें अपने पाले में लाने का ख्वाब पाले है। इसीलिए अखिलेश यादव के बाद राहुल गांधी भी देवरिया जाकर तमाम वायदे कर आए।
राहुल गांधी के जाते ही परवीन ने राज्य सरकार द्वारा दी गई ओएसडी की नौकरी ठुकरा दी थी। दिलचस्प यह है कि सीबीआई भी डीएसपी हक हत्याकांड में आरोपी कुंडा के राजा रघुराज प्रताप सिंह को कब्जे में लेने की घोषणाएं तो खूब कर रही है, पर अभी तक वह बैंती महल से कोई पुख्ता सुबूत नहीं ले पाई है।
जब कारगिल युद्ध के समय जवान मारे जा रहे थे, तब भी सवाल उठा था कि सरकार शहीद परिवारों को जो मुआवजा बांट रही है, वह किसे जा रहा है।
पैसों से अगर किसी की मौत को तौला जाएगा, तो यही होगा। यह एक शहीद का अपमान है, लेकिन राजनेताओं के लिए शहीद नहीं, उसका व्यापार प्यारा होता है।