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दिल्ली के जंगल में मोर नाचा

Wed, 11 Feb 2015 07:55 PM IST
मनु पंवार
मनु पंवार Updated Wed, 11 Feb 2015 07:55 PM IST
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Political dance of Delhi

लो जी, जिन्हें जंगल में होना था, वह अब शहर में सरकार बनाने जा रहे हैं। वैसे भी जंगल में मोर नाचा, किसने देखा...। पर इससे शहर और जंगल का फासला मिट गया। अब मोर कहीं भी नाच दिखा सकता है। लेकिन अबके भाजपा के मोर ने नाचने से इन्कार कर दिया।

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चिंतित भाजपाइयों ने मोर से पूछा कि आप क्यों नहीं नाचे? मोर बोला, तुम्हारा तो आंगन ही टेढ़ा है। उसकी इस खरी-खरी पर भाजपाई चुप थे। किसकी मजाल, जो अमित भाई के आंगन को सीधा करने की सलाह भी दे पाए।
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इस बीच, पता चला है कि दिल्ली में दुर्गति के बाद कांग्रेस अब राहुल गांधी के रोड शो के सीसीटीवी फुटेज खंगालने जा रही है, जिससे यह पता लगाया जा सके कि जो इतनी भीड़ जुटी थी, वे आखिर थे कौन? क्या वे सिर्फ हलवा-पूरी खाने आए थे कि पार्टी को जीरो फिगर साइज में बदल दिया।
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पर भाजपा वाले यह नहीं समझ पा रहे कि लोकसभा चुनाव में देश ‘कांग्रेस मुक्त’ हुआ, तो उनकी झोली भर गई, पर जब दिल्ली भी ‘कांग्रेस मुक्त’ हो गई, तो उनको झोली में जो था, वह भी क्यों लुट गया? भाजपा ने अपनी सभी सत्तर झोलियां दोबारा चेक कीं। इस दौरान कई छेदों का पता चला।

अब दिल्ली में मफलरमैन की धूम है। बंदा 'बदनसीब' था, पर मफलर ने लाज बचा ली। मफलर के किस्मत-कनेक्शन को देखते हुए आप की सरकार दिल्ली में मफलर को ‘राज्य प्रतीक चिह्न’ घोषित कर सकती है। पर विरोधियों की चली, तो भविष्य में दिल्ली चुनाव चिलचिलाती गर्मी में कराए जाएंगे।

इससे केजरीवाल मफलर नहीं ओढ़ पाएंगे और बगैर मफलर के उन्हें पहचानेगा कौन? एक ‘आपिये’ ने पूछा, बताओ 16 मई और 10 फरवरी में क्या फर्क है? मैंने कहा, गर्मी और जाड़े का फर्क है। वह बोला, नहीं...नौ महीने का फर्क है। सरकार का पांव भारी था, पर विकास न हुआ।


फिर पूछा, सरकार नक्सलवाद का सफाया क्यों नहीं कर पाई? मैंने कहा, तुम्हीं बता दो। उसने कहा, पूरी सरकार दिल्ली के एक ‘नक्सली’ को तो निपटा नहीं पाई, नक्सलवाद का खाक सफाया कर पाएगी!

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