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हालात : टैरिफ... अनिश्चितता और हाशिये के लोग, उथल-पुथल के बीच सटीक है भारत की रणनीति

Sat, 12 Apr 2025 07:08 AM IST
patralekha chatterjee पत्रलेखा चटर्जी
Updated Sat, 12 Apr 2025 07:08 AM IST
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सार
टैरिफ से संबंधित तमाम उथल-पुथल के बीच भारत ने अपना व्यवहार संयमित रखा है, जो इस तूफान से निपटने की सबसे सटीक रणनीति भी है। हालांकि, नीति निर्माताओं को अनिश्चितताओं से जूझते समय सबसे ज्यादा ध्यान हाशिये के लोगों पर देना चाहिए।
 
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policymakers should pay attention to marginalized while dealing with uncertainties In tariff-related turmoil
ट्रंप। - फोटो : अमर उजाला

विस्तार

अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप के कथित पारस्परिक टैरिफ की कहानी ने अचानक चौंकाने वाला मोड़ ले लिया है। लगता है, ट्रंप ज्यादातर देशों के खिलाफ लगाए गए अपने टैरिफ से पीछे हट गए हैं। अधिकांश देशों द्वारा व्यापार बाधाओं को दूर करने के लिए अमेरिका से बातचीत करने के प्रयास के मद्देनजर अमेरिका ने कथित पारस्परिक टैरिफ पर 90 दिन के ‘विराम’ या राहत की घोषणा की है। लेकिन ट्रंप प्रशासन ने चीनी आयात पर कर की दर को पहले घोषित 104 फीसदी से बढ़ाकर 125 फीसदी करने की घोषणा की है।



लगता है कि यह अमेरिका और दुनिया के अधिकांश देशों के बीच अभूतपूर्व व्यापार युद्ध को अमेरिका और चीन के बीच सीमित करने का प्रयास था। अब 90 दिवसीय विराम प्रभावी होने के साथ दुनिया की दूसरी सबसे बड़ी अर्थव्यवस्था चीन को छोड़कर सभी देश 9 अप्रैल, 2025 के 10 फीसदी बेसलाइन टैरिफ के अधीन हैं। इसलिए इस राहत अवधि के दौरान भारत के लिए टैरिफ दर 10 फीसदी है, न कि पहले से निर्धारित 26 फीसदी पारस्परिक दर। 90 दिन की अवधि के बाद, उच्च पारस्परिक टैरिफ (जैसे भारत का 26 फीसदी) फिर से शुरू हो सकता है, जब तक कि बातचीत से इसमें बदलाव न हो।


मीडिया के अनुसार, इस घटनाक्रम से वैश्विक बाजारों में उछाल आया, लेकिन गैर-चीनी व्यापार साझेदारों पर टैरिफ कम करने की ट्रंप की योजना का सटीक विवरण तत्काल स्पष्ट नहीं हो पाया है। ट्रंप के मामले में कुछ भी निश्चित नहीं कहा जा सकता और जब आप यह लेख पढ़ रहे होंगे, तब तक एक और नाटकीय मोड़ आ सकता है। हालांकि, एक बात तो तय है कि हम एक उतार-चढ़ाव भरे दौर से गुजर रहे हैं और उभरती हुई अंतरराष्ट्रीय व्यवस्था में अनिश्चितताएं आम बात हो जाएंगी। इसका असर हर देश पर पड़ेगा। पिछले कुछ दिनों में, ट्रंप के टैरिफ एजेंडे ने वैश्विक बाजारों को हिलाकर रख दिया और लग रहा है कि भारत भी इस कदम से प्रभावित होगा। भविष्य अनिश्चित है। और हम नहीं जानते कि आने वाले दिनों में या 90 दिनों के विराम के बाद क्या होगा।

टैरिफ से संबंधित तमाम उथल-पुथल के बीच भारत ने अपना व्यवहार संयमित रखा है। भारत ने ट्रंप के टैरिफ एजेंडे के खिलाफ जवाबी कार्रवाई नहीं की। कई अन्य देशों की तरह भारत ने भी जवाबी टैरिफ से इन्कार किया और अमेरिका से व्यापार समझौते के लिए चल रही वार्ता से सकारात्मक नतीजे की उम्मीद कर रहा है। मोदी सरकार ने पहले ही हार्ले-डेविडसन बाइक और बॉर्बन व्हिस्की पर टैरिफ कम कर दिया है और छह प्रतिशत ‘गूगल टैक्स’ को वापस ले लिया है, जो गूगल जैसी विदेशी टेक कंपनियों के साथ ऑनलाइन विज्ञापनों पर लगाया गया था।

भारत सक्रिय रूप से अपने व्यापार संबंधों में विविधता लाने की कोशिश कर रहा है, तथा टैरिफ युद्धों और व्यापार बाधाओं की संवेदनशीलता को कम करने में मदद करने के लिए यूरोपीय संघ, जापान और आसियान देशों जैसे अन्य वैश्विक खिलाड़ियों से अधिक से अधिक जुड़ रहा है। ऐसी अटकलें लगाई जा रही हैं कि अमेरिका और चीन के बीच व्यापार युद्ध भारत के लिए अवसर में बदल सकता है।

यकीनन, भारत को चीन से दूर आपूर्ति शृंखलाओं में विविधता लाने की इच्छुक कंपनियों को आकर्षित करके अमेरिका-चीन टैरिफ बढ़ोतरी से लाभ हो सकता है। इससे विनिर्माण, आईटी सेवाओं और फार्मास्यूटिकल्स जैसे क्षेत्रों को बढ़ावा मिल सकता है, जबकि अमेरिका को कृषि निर्यात में वृद्धि के अवसर खुल सकते हैं। हालांकि, चुनौतियां बनी हुई हैं, क्योंकि वैश्विक आपूर्ति शृंखलाओं को फिर से जोड़ना इतना आसान नहीं है या ऐसा रातोंरात नहीं हो सकता है।

90 दिनों का विराम भले ही एक बड़ी राहत है, लेकिन यह भी माना जाना चाहिए कि दुनिया भर के व्यापारिक समुदाय अनिश्चितताओं से नफरत करते हैं और इससे वैश्विक व्यापार भावना प्रभावित होती है तथा बड़ी कंपनियां ‘वेट ऐंड वॉच’ का दृष्टिकोण अपना सकती हैं। हालांकि, व्यापार, टैरिफ और भू-राजनीतिक तनाव पर ध्यान केंद्रित है, लेकिन एक और अहम मुद्दा है, जिस पर ध्यान देने की आवश्यकता है, क्योंकि आगे अभूतपूर्व अनिश्चितताएं हैं। यह समझना जरूरी है कि जब हम उथल-पुथल भरे दौर में आगे बढ़ रहे हैं, तो हममें से कुछ लोग दूसरों की तुलना में अधिक जोखिम में होंगे। अमीर लोगों के पास आपदा से बचने के लिए पर्याप्त सुरक्षा और सामाजिक सुरक्षा जाल हैं। लेकिन जिनकी आय पहले से ही कम है, उनकी और कम हो जाए, तो क्या होगा? उन क्षेत्रों का क्या होगा, जो देश के दीर्घकालिक विकास की नींव रखते हैं?

स्वास्थ्य, शिक्षा और कौशल क्षेत्र देश के दीर्घकालिक विकास और आर्थिक वृद्धि के लिए महत्वपूर्ण हैं। हालांकि, ये क्षेत्र वैश्विक व्यापार गतिशीलता और अस्थिरता से काफी प्रभावित हो सकते हैं, जिसमें ट्रंप का व्यापार एजेंडा और भू-राजनीतिक अनिश्चितताएं भी शामिल हैं। यदि भारत को आर्थिक विकास या विदेशी निवेश में कमी का सामना करना पड़ता है, तो सामाजिक क्षेत्रों में प्रगति धीमी हो सकती है। इसलिए सबसे पहले वैश्विक बाजारों में व्याप्त अनिश्चितताओं के कारण कमजोर आबादी को सामाजिक कल्याण योजनाओं के माध्यम से संरक्षित किया जाना चाहिए।

चाहे आगे कुछ भी हो, भारत अपनी नींव और मानव विकास को मजबूत करने के महत्वपूर्ण कार्य को छोड़ नहीं सकता। अगर हमारी आबादी शिक्षा, स्वास्थ्य और कौशल में पिछड़ती रही, तो हम दूसरे देशों से प्रतिस्पर्धा नहीं कर पाएंगे। एक प्रमुख मुद्दा पोषण है। सरकारी सर्वेक्षणों से पता चलता है कि भारत में एनीमिया एक प्रमुख नीतिगत चुनौती बनी हुई है, जिसमें पिछले दो दशकों में बहुत कम सुधार हुआ है। ऑब्जर्वर रिसर्च फाउंडेशन के स्वास्थ्य पहल के वरिष्ठ फेलो ओमन सी कुरियन की एक हालिया रिपोर्ट में कहा गया है, ‘विशेष रूप से एनीमिया भारत की सबसे बड़ी संपत्ति (जनसांख्यिकीय लाभांश) के लिए एक व्यापक खतरा बना हुआ है, जो न केवल स्वास्थ्य, बल्कि मानव पूंजी क्षमता को भी कम कर रहा है।’

भू-राजनीतिक तनाव और वैश्विक अस्थिरता सभी को प्रभावित करती है, पर समान रूप से नहीं। निचले स्तर पर रहने वाले लोग अधिक जोखिम में हैं। अधिकांश भारतीय अनौपचारिक अर्थव्यवस्था का हिस्सा हैं और असुरक्षित हैं। नीति निर्माताओं को अनिश्चितताओं से जूझते समय सबसे अधिक जोखिम वाले लोगों को ध्यान में रखना चाहिए।      

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