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पक्षपाती राजनीति का जहर
रामचंद्र गुहा
Updated Sat, 30 Aug 2014 09:29 PM IST
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प्रधानमंत्री के साथ मंच साझा करते हुए विरोधी दलों के मुख्यमंत्रियों को हाल ही में जिस तरह से विरोध की नारेबाजी का सामना करना पड़ा, वह दुर्भाग्यपूर्ण है। हालांकि अविश्वास और संदेह का जो माहौल भारतीय राजनीति को घेरे हुए है, उसकी यह महज एक झलक थी। देश भर में देखा जा सकता है कि विरोधी दलों के नेता और कार्यकर्ता एक-दूसरे को किस कदर नापसंदगी और नफरत के भाव से देखते हैं।
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दरअसल राष्ट्रीय स्तर पर कांग्रेस और भारतीय जनता पार्टी के बीच चलने वाली जहरीली प्रतिद्वंद्विता के समानांतर राज्यों की हालत भी कमोबेश ऐसी ही है। तमिलनाडु में द्रमुक और अन्नाद्रमुक के बीच रिश्तों में कड़वाहट अपने चरम पर है। रिश्तों में तल्खी का कुछ ऐसा ही आलम पश्चिम बंगाल में तृणमूल और माकपा, तथा उत्तर प्रदेश में सपा और बसपा के बीच है।
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राजनीतिक दलों के बीच की कड़वाहट का दुष्परिणाम सरकार की विधायी शाखा में फैलती अकुशलता के तौर पर सामने आया है। गौरतलब है कि 1950 और 1960 के दशक में भारत की संसद बौद्धिक और उत्साही बहसों का मंच हुआ करती थी। मगर आज ऐसा कम ही होता है कि सत्तारूढ़ दल द्वारा प्रस्तावित कानूनों पर संसद में गहराई से चर्चा हो। अफसोस की बात है कि सदन में लाए गए प्रस्ताव पर शोर मचाने या वॉक आउट करने के सिवा विपक्ष कोई और भूमिका निभाता नहीं दिखता। संसद में फैले शोर और अव्यवस्था पर समाजशास्त्री आंद्रे बेते लिखते हैं, 'इससे न सिर्फ किसी मामले पर सार्थक ढंग से विचार करना मुश्किल हो जाता है, बल्कि संसद के भीतर लगातार विरोध और अव्यवस्था से संस्थान पर लोगों का भरोसा उठने लगता है।'
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बेते आगे लिखते हैं, 'सरकार और विपक्ष के बीच लगातार बढ़ती अविश्वास की भावना लोकतंत्र की जड़ों को कमजोर करती है। एक तरफ अविश्वास और दूसरी ओर सच को छिपाने की प्रवृत्ति से विपक्ष को एक विधिसम्मत और जवाबदेह राजनीतिक संस्थान बनाने के उद्देश्य में बाधा पहुंचती है।'
गौरतलब है कि राष्ट्रीय स्तर पर राजनीतिक शिष्टाचार में गिरावट इंदिरा गांधी के समय से आनी शुरू हुई। दरअसल एक महिला का प्रधानमंत्री होना उनके कुछ पुरुष सहयोगियों को बर्दाश्त नहीं हो पा रहा था। राम मनोहर लोहिया ने तो उन्हें 'गूंगी गुड़िया' तक बोल दिया था। बदले में उन्होंने भी एक बार महान स्वतंत्रता सेनानी जयप्रकाश नारायण पर साम्राज्यवादी ताकतों के इशारे पर चलने का आरोप लगाया था। आपातकाल में इंदिरा गांधी ने अपने राजनीतिक विरोधियों को जिस तरह नजरबंद रखा, वह राजनीतिक वैमनस्य का चरम था। आपातकाल से उपजी कड़वाहट से वर्षों तक देश की राजनीति उबर नहीं पाई। दरअसल जब एक बार भरोसा टूटने पर सरकार और विपक्ष के बीच रिश्तों में दूरियां बढ़ती ही जाती हैं।
भारत में आज राजनीतिक दलों के बीच की प्रतिद्वंद्विता राष्ट्रीय हितों पर हावी है। इसने राष्ट्रीय स्तर पर होने वाली बहसों और कानून निर्माण की रचनात्मक प्रक्रिया को मुश्किल बनाया है। मसलन, जब 1998 और 2004 के बीच केंद्र में सत्तारूढ़ भाजपा ने श्रम कानूनों के आधुनिकीकरण और रिटेल में विदेशी निवेश के दरवाजे खोलने की बात की, तब कांग्रेस ने इनका विरोध किया था। लेकिन 2004 में जब कांग्रेस सत्ता में आई, तो वह इन नीतियों की समर्थक बन गई, जबकि भाजपा इनका विरोध करने लगी। दरअसल इंदिरा गांधी के वक्त से ही कांग्रेस और भाजपा ने एक-दूसरे के प्रति निजी स्तर पर शत्रुता का एक अतार्किक और विध्वंसात्मक भाव पाल रखा है। सोनिया गांधी ने जब राजनीति में प्रवेश किया, तब विदेशी मूल की होने की वजह से सबकी निगाहें उन पर थीं।
इसने अपने राजनीतिक विरोधियों की मंशाओं को लेकर उन्हें शंकालु बना दिया। उस समय के एक भुला दिए गए वाकये को यहां याद करना दिलचस्प होगा। 2003 में अटल बिहारी वाजपेयी ने कश्मीर की यात्रा की थी। दस साल बाद देश का कोई प्रधानमंत्री घाटी के दौरे पर था। उस समय घाटी का माहौल शांत था, और पर्यटन भी जोरों पर था। उम्मीद की एक धुंधली सी किरण दिखने लगी थी। वाजपेयी ने, जो खुद पार्टी के उदारवादी नेताओं में थे, अनुच्छेद 370 को हटाए जाने की अपनी पार्टी की लाइन से हटते हुए कहा था कि वह कश्मीर समस्या के ऐसे किसी भी समाधान पर विचार करने को तैयार हैं, जो इंसानियत के दायरे में आता हो।
इसकी पूरी आशंका तो थी ही कि जेहादी और पाकिस्तान सरकार वाजपेयी के सुझाए प्रस्ताव पर वार्ता को मंजूर नहीं करेंगे। देश के भीतर भी, खासकर विपक्षी कांग्रेस ने, वाजपेयी के इस उदार रवैये को कम करके आंका। उस वक्त श्रीनगर में पीपुल्स डेमोक्रेटिक पार्टी के नेतृत्व वाली गठबंधन सरकार का कांग्रेस भी हिस्सा थी। पीडीपी के मुख्यमंत्री और उनकी पार्टी के दूसरे सहयोगियों ने इस कार्यक्रम में शिरकत की, जबकि कांग्रेसी मंत्रियों ने इसका बहिष्कार किया। बताना मुश्किल है कि उन्होंने यह फैसला खुद लिया या 10 जनपथ के निर्देश पर। मगर यह सांविधानिक कर्तव्यों के प्रति लापरवाही बरतने का ही नमूना था।
वाजपेयी वहां स्वयंसेवक की हैसियत से नहीं, बल्कि देश के निर्वाचित प्रधानमंत्री के तौर पर गए थे। यह उनके साथ खड़े होने का समय था। साथ ही, यह प्रदर्शित करने का भी, कि राष्ट्रीय महत्व के मुद्दे पर सरकार और विपक्ष जेहादियों के खिलाफ कंधे से कंधा मिलाकर खड़े हो सकते हैं। इस पृष्ठभूमि में देखा जाए, तो कांग्रेस की यह शिकायत पाखंड ही ज्यादा लगती है कि भाजपा कार्यकर्ता उसके मुख्यमंत्रियों की खिंचाई कर रहे हैं।
हालांकि इस मामले में वर्तमान प्रधानमंत्री भी दूध के धुले नहीं कहे जा सकते। अपने चुनावी अभियान के दौरान उन्होंने भी अपने विरोधियों के लिए तमाम अशोभनीय बातें कहीं थीं। उनसे पहले आज तक प्रधानमंत्री पद के किसी भी उम्मीदवार ने इस तरह आरोप-प्रत्यारोप के खेल को अपना हथियार नहीं बनाया था। ऐसे में यह मान लेना स्वाभाविक है कि नरेंद्र मोदी के समर्थक शायद शिष्टता को गुण ही नहीं मानते। समझने की जरूरत है कि भरोसे के जरिये ही बहुदलीय लोकतंत्र असरदार ढंग से चल सकता है।
पार्टियों को नीतियों को लेकर पाला बदलने की अपनी प्रवृत्ति छोड़नी चाहिए, चाहे वे सत्ता में हों या विपक्ष में। उन्हें अपने विरोधियों के साथ स्वस्थ बहस करनी चाहिए। कांग्रेस और भाजपा, दोनों को ही यह समझना होगा कि लोकतंत्र के इन बुनियादी सिद्धांतों से मुंह मोड़कर वे दोनों ही मतदाताओं और देश के नागरिकों का भला नहीं कर रहीं।