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दिव्यांगजनों की सेवा-स्वाभिमान का अमृत दशक: खेल से स्टार्टअप तक नई ऊंचाइयां छू रहे, विकास में भागीदार बन रहे
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पीएम नरेंद्र मोदी
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विस्तार
सारा विश्व तीन दिसंबर को अंतरराष्ट्रीय दिव्यांग दिवस के रूप में मनाता है। यह दिव्यांगजनों के साहस, आत्मबल और उपलब्धियों को नमन करने का विशेष अवसर है। भारत के लिए तो यह पवित्र दिन जैसा है। हमारे शास्त्रों और लोक ग्रंथों में दिव्यांगों के प्रति सम्मान का भाव देखने को मिलता है। रामायण में एक श्लोक है-उत्साहो बलवानार्य, नास्त्युत्साहात्परं बलम्।
सोत्साहस्यास्ति लोकेऽस्मिन्, न किञ्चिदपि दुर्लभम्।
यानी, जिस व्यक्ति के मन में उत्साह है, उसके लिए विश्व में कुछ भी असंभव नहीं है। दिव्यांगजन इसी उत्साह से देश के सम्मान और स्वाभिमान की ऊर्जा बन रहे हैं। इस वर्ष यह दिन और भी विशेष है क्योंकि इसी साल संविधान के 75 वर्ष पूर्ण हुए हैं। समानता और अंत्योदय के लिए काम करने की संविधान की प्रेरणा से बीते 10 वर्षों में हमने दिव्यांगों की उन्नति की मजबूत नींव रखी है। उनके लिए अनेक नीतियां बनीं, अहम निर्णय हुए हैं। मैंने हर मौके पर दिव्यांगजनों का जीवन आसान बनाने के लिए प्रयास किए हैं। पीएम बनने के बाद मैंने इस सेवा को राष्ट्र का संकल्प बनाया। 2014 में सरकार बनने के बाद सबसे पहले विकलांग शब्द के स्थान पर दिव्यांग शब्द को प्रचलित किया। यह सिर्फ शब्द का परिवर्तन नहीं था, इसने समाज में दिव्यांगजनों की गरिमा भी बढ़ाई और उनके योगदान को भी बड़ी स्वीकृति दी। इस निर्णय ने संदेश दिया कि सरकार ऐसा समावेशी वातावरण चाहती है, जहां किसी व्यक्ति के सामने उसकी शारीरिक चुनौतियां दीवार ना बनें और उसे उसकी प्रतिभा के अनुसार पूरे सम्मान के साथ राष्ट्र निर्माण का अवसर मिले। दिव्यांग भाई-बहनों ने विभिन्न अवसरों पर मुझे इस निर्णय के लिए अपना आशीर्वाद दिया। यह आशीर्वाद ही, दिव्यांगजन के कल्याण के लिए मेरी सबसे बड़ी शक्ति बना।
पहले की सरकारों के समय जो नीतियां थीं...उनकी वजह से दिव्यांगजन सरकारी नौकरियों और उच्च शिक्षा के अवसरों से पीछे रह जाते थे। हमने उन स्थितियों को बदला। आरक्षण की व्यवस्था को नया रूप मिला। दिव्यांगजन के कल्याण के लिए खर्च होने वाली राशि को तीन गुना किया गया। इससे दिव्यांगजनों के लिए अवसरों व उन्नतियों के नए रास्ते बने।
- जीवन को सरल, सहज और स्वाभिमानी बनाने के भाव के साथ दिव्यांगता कानून को लागू किया गया। पहली बार एसिट अटैक सर्वाइवर्स को भी दिव्यांगता की परिभाषा में शामिल किया गया। यह कानून उनके सशक्त जीवन का माध्यम बन रहा है और वे विकसित भारत के निर्माण के लिए अपनी संपूर्ण शक्ति के साथ काम कर रहे हैं। मुझे यह देखकर गर्व होता है कि उनकी उपलब्धियां कैसे हमारे समाज के संकल्पों को नया आकार दे रही हैं।
- आज जब पैरालंपिक का मेडल सीने पर लगाकर, मेरे देश के खिलाड़ी मेरे घर पर पधारते हैं, तो मन गौरव से भर जाता है। जब मैं मन की बात में दिव्यांग भाई-बहनों की प्रेरक कहानियां आपके साथ साझा करता हूं, तो हृदय गर्व से भर जाता है। शिक्षा हो, खेल या फिर स्टार्टअप, वे सभी बाधाओं को तोड़कर नई ऊंचाइयां छू रहे हैं और देश के विकास में भागीदार बन रहे हैं। मैं पूरे विश्वास से कहता हूं कि 2047 में जब हम स्वतंत्रता का 100वां उत्सव मनाएंगे, तो हमारे दिव्यांग साथी पूरे विश्व का प्रेरणा पुंज बने दिखाई देंगे। आज हमें इसी लक्ष्य के लिए संकल्पित होना है।