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पिक्चर अभी बाकी है
एम के वेणु
Updated Fri, 05 Sep 2014 08:21 PM IST
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वरिष्ठ भाजपा नेता लालकृष्ण आडवाणी ने एक बार कहा था कि नरेंद्र मोदी एक बेहतरीन इवेंट मैनेजर हैं। असल में, मोदी कार्यक्रमों का आयोजन इस व्यापक ढंग से करते हैं कि लोगों का ध्यान उनकी शैली पर ज्यादा, और कार्यक्रम की विषयवस्तु पर कम जाता है। अब तक मोदी जिस भी बड़े कार्यक्रम में शरीक हुए हैं, उन्होंने कुछ इस तरह उसे असरदार राजनीतिक संकेत देने का मंच बना दिया, जैसा सिर्फ मोदी ही कर सकते थे। मसलन, जापान के राजा को भगवद्गीता की प्रति देते हुए उनका यह कहना कि उनके देश में मौजूद उनके 'धर्मनिरपेक्ष मित्र' उनके इस काम को भी सांप्रदायिक करार दे सकते हैं।
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दरअसल ऐसे बड़े कार्यक्रमों को अपने राजनीतिक प्रतीकों को व्यक्त करने का जरिया बनाने की आदत से मोदी मजबूर हैं। अपने विरोधियों पर पलटवार करने के किसी भी मौके को भुनाने से मोदी चूकना नहीं चाहते, भले ही वह विदेश में प्रधानमंत्री के तौर पर भारत का प्रतिनिधित्व क्यों न कर रहे हों। यह भी मुमकिन है कि वह खासकर हिंदी के उस गढ़ को लगातार संदेश भेजते रहने की जरूरत समझते हों, जो न सिर्फ घनघोर सांप्रदायिक ध्रुवीकरण का शिकार है, बल्कि जिसने लोकसभा चुनाव में भाजपा को बड़ी जीत दिलाने में अहम भूमिका भी निभाई थी। मोदी के भाषणों के पीछे छिपे राजनीतिक निहितार्थ पहले दिन से ही दिखने लगे थे, जब संसद में राष्ट्रपति के अभिभाषण का जवाब देते हुए उन्होंने उल्लेख किया कि भारत किस तरह 1,200 वर्ष तक गुलामी के साये में रहा। इसमें उन्होंने मुगल शासन का जिक्र तो किया ही, साथ ही, वह इस संदर्भ को वर्तमान में हिंदुत्व की राजनीति से जोड़ना भी नहीं भूले। गौरतलब है कि पूर्वी यूरोप का एक बड़ा हिस्सा लंबे समय तक ऑटोमन साम्राज्य के अधीन रहा, मगर वहां के नेता भावनाओं को उकसाने के लिए बार-बार गुलामी की उन सदियों का उल्लेख नहीं करते।
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वैसे स्वतंत्रता दिवस पर भाषण देने की परंपरा को निभाते हुए उन्होंने दस वर्ष के लिए सांप्रदायिक हिंसा पर रोक लगाने की बात कही थी। फिर भी गोरखपुर से आदित्यनाथ जैसे भाजपा सांसदों को हिंसा को बढ़ावा देने वाली बातें कहने से वह रोक नहीं पाए। साफ है कि इस मोर्चे पर एनडीए सरकार के पहले सौ दिन ज्यादा आश्वस्त नहीं करते। उत्तर प्रदेश में सांप्रदायिक हिंसा के मामले बढ़ते दिख रहे हैं, मगर मोदी इस पर सुविचारित ढंग से चुप्पी साधे हुए हैं।
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शासन की दूसरी कसौटियों पर भी मोदी सरकार के पहले सौ दिनों को 'काम कम और दिखावा ज्यादा' के रूप में रेखांकित किया जा सकता है। मोदी ने एक केंद्रीकृत प्रशासनिक व्यवस्था कायम की है, जिसमें सारे नीतिगत फैसले प्रधानमंत्री कार्यालय (पीएमओ) द्वारा लिए जा रहे हैं। फिर चाहे वह विदेश नीति हो, या बुनियादी विकास से जुड़ा कोई मसला। नई व्यवस्था कितनी कारगर है, यह तो समय ही बताएगा। मुख्यमंत्रियों के साथ समान भागीदारी के सिद्धांत पर जिस बेहतर सामंजस्य का वायदा किया गया था, उसका साकार होना भी अभी बाकी है। इसके अलावा वैश्विक पटल पर उभर रहे जोखिमों के बीच अर्थव्यवस्था में जान फूंकने के नाम पर अपनी पीठ ठोंकना विकास दर की बढ़ोतरी को नुकसान पहुंचा सकता है। यही नहीं, 1993 के बाद से मनमाने ढंग से आवंटित हुए 200 से ज्यादा कोल ब्लॉकों को सर्वोच्च अदालत द्वारा रद्द किए जाने की आशंका है। अगर ऐसा होता है, तो आने वाले 12 महीनों में विकास लक्ष्यों को हासिल करने में मुश्किल आ सकती है।
नरेंद्र मोदी ने भले ही अप्रैल से जून तिमाही में 5.7 फीसदी की विकास दर का श्रेय लिया हो, मगर साफ है कि यह नतीजे 2013 के अंत या 2014 की शुरुआत में लिए गए फैसलों की उपज हैं, और तब यूपीए की सरकार थी। तो सरकार बनने से पहले हुई किसी घटना का श्रेय लेने की चालाकी के लिए एनडीए सरकार की तारीफ तो कतई नहीं की जा सकती। सच तो यह है कि विकास दर के पिछले वर्ष के 4.7 प्रतिशत से अब 5.7 प्रतिशत पर पहुंच जाना, खुद में कोई बहुत बड़ी उपलब्धि भी नहीं है। विकास दर में महज एक प्रतिशत के इजाफे के लिए अपनी पीठ ठोंकने के बजाय सरकार को विकास दर और बढ़ाने पर ध्यान देना होगा।
ऊंची विकास दर को पाने के लिए खासकर आपूर्ति से जुड़ी बाधाओं को दूर करने के मद्देनजर एनडीए सरकार के लिए अभी काफी कुछ करने की गुंजाइश बाकी है। ऐसा न कर पाने की वजह से ही यूपीए सरकार पिछले तीन वर्षों से विकास दर को बरकरार नहीं रख पा रही थी। फिर उसने संसाधनों का आवंटन भी पारदर्शी ढंग से नहीं किया। इसके अलावा 200 से ज्यादा कोल ब्लॉकों को जिस तरह केंद्र सरकार और कांग्रेस व भाजपा द्वारा शासित राज्य सरकारों ने बेतरतीब ढंग से आवंटित किया, उससे जुड़े कानूनी पेचों से निपटना भी खासा मुश्किल साबित होने वाला है।
इतना ही नहीं, न्यायपालिका और नीति नियंताओं के लिए जरूरी है कि प्रधानमंत्री कानून के शासन की सीमाओं में रहते हुए आपसी सहयोग के एक नए मॉडल्ा को विकसित करें। मगर अफसोस है कि फिलहाल ऐसा होता नहीं दिख रहा है। स्थिति यह है कि सर्वोच्च न्यायालय और सरकार के बीच तनाव बढ़ता दिख रहा है। फिर चाहे वह उच्च न्यायपालिका में जजों की नियुक्ति की कॉलेजियम प्रणाली के विरोध की बात हो, या जल्दबाजी में पेश किए गए नए राष्ट्रीय न्यायिक नियुक्ति विधेयक का मामला। भाजपा नेतृत्व की सारी शक्तियों के केंद्रीकरण की कोशिश को लेकर सर्वोच्च न्यायालय के न्यायाधीशों ने भी आलोचना की है। पूर्व मुख्य न्यायाधीश जस्टिस पी सदाशिवम को केरल का राज्यपाल बनाने का फैसला भी एनडीए की छवि के लिए कुछ अच्छा नहीं साबित होने वाला। खासकर तब जब कि संसद में पहले ही एक बार भाजपा कह चुकी है कि सर्वोच्च न्यायालय के जजों को सेवानिवृत्ति के बाद राजनीतिक नियुक्तियां नहीं देनी चाहिए, क्योंकि इससे न्यायपालिका की स्वतंत्रता पर असर पड़ सकता है। प्रचंड बहुमत के साथ सत्ता में आई नई सरकार के लिए ये अच्छे संकेत नहीं हैं। और इसी आधार पर मोदी सरकार के पहले सौ दिनों का रिपोर्ट कार्ड मिला-जुला ही कहा जा सकता है।