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बिजली की राजनीति नहीं समझ पाते हैं लोग
पत्रलेखा चटर्जी
Updated Sat, 25 May 2013 08:44 PM IST
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बागपत में कुछ समय बिताने पर बिजली न होने की वजह से लोगों की नाराजगी और वेदना का बरबस ही अहसास हो जाता है। पश्चिमी उत्तर प्रदेश के इस जिले के छोटे गांव-मुहल्लों में एक नई तरह की समृद्धि की झलक मिलती है। लेकिन कुछ चीजें नहीं बदली हैं। मेज पर रखे हुए बैटरी चलित पंखे की खीझ पैदा करने वाली आवाज के बीच एक स्वास्थ्य कायकर्ता से मेरी बात हुई।
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वह बड़े गर्व के साथ अपनी नई वॉशिंग मशीन मुझे दिखाती है। लेकिन दिक्कत यह है कि इसे चलाने के लिए बिजली नहीं है। उन्होंने मुझे बताया कि भीषण गर्मी और बिजली की किल्लत से निपटने के लिए वैकल्पिक व्यवस्था हर एक के पास मौजूद है।
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लोगों के गुस्से को शांत रखने के लिए उत्तर प्रदेश के मुख्यमंत्री अखिलेश यादव कह रहे हैं कि सरकार लोगों को पर्याप्त बिजली मुहैया कराने की भरसक कोशिश कर रही है। लेकिन गर्मी बढ़ने के साथ ही लोगों का गुस्सा भी बढ़ रहा है। पिछले हफ्ते के दौरान राज्य में कई जगहों पर गुस्साए लोगों के प्रदर्शन की खबरें सुनने में आईं।
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बहराइच में घंटों की बिजली कटौती से नाराज लोगों ने बिजली स्टेशन को आग लगा दी और वहां के कर्मचारियों को कई घंटों तक बंधक बनाए रखा। बिजली न आने की वजह से लखनऊ के एक इलाके के लोगों को पूरी रात जागते हुए काटनी पड़ी।
हालांकि बिजली की कटौती केवल उत्तर प्रदेश की परेशानी नहीं है। दिल्ली की उच्चवर्गीय कॉलोनियों सहित देश के दूसरे कई हिस्से बिजली की कटौती से त्रस्त हैं। इस संकट को झेलने का संबंध इस बात से है कि कोई आदमी बिजली की वैकल्पिक व्यवस्था पर कितना खर्च करने को तैयार है।
उत्तर प्रदेश का यह बिजली संकट उन संकेतों में से एक है, जो बिजली, सड़क और पानी के नाम पर जारी राजनीतिक आडंबर के खोखलेपन को जाहिर करते हैं। उत्तर प्रदेश में ऊर्जा क्षेत्र में संस्थागत सुधार और निवेश की जरूरत काफी लंबे समय से महसूस की जा रही है।
उत्तर प्रदेश के पास केवल 8,000 मेगावॉट बिजली ही उपलब्ध है, जबकि यहां तकरीबन 11,000 मेगावॉट बिजली की मांग है। इसी वजह से यहां बार-बार बिजली की कटौती करने की नौबत आ जाती है। लेकिन ऊर्जा क्षेत्र में निवेश की कमी तो समस्या का एक ही पहलू है। इसका एक और जरूरी पहलू बिजली की चोरी और नुकसान है।
लंदन स्कूल ऑफ इकोनॉमिक्स एंड पॉलिटिकल साइंस के इंटरनेशनल ग्रोथ सेंटर के मिरियम गोल्डेन और ब्रियान मिन ने फरवरी, 2012 में एक शोधपत्र जारी किया। इसका शीर्षक था- ‘थेफ्ट एंड लॉस ऑफ इलेक्ट्रिसिटी इन एन इंडियन स्टेट’।
इसमें उत्तर प्रदेश में 2000 से 2009 के बीच दस वर्षों के दौरान हुई बिजली चोरी की राजनीति के मद्देनजर गंभीर रहस्योद्घाटन किए गए हैं। इन लेखकों के मुताबिक उत्तर प्रदेश में बिजली चोरी का सीधा संबंध वहां की जटिल चुनावी प्रतिस्पर्धा से हो गया है। इसके अलावा उत्तर प्रदेश की कुल बिजली के तकरीबन एक-तिहाई हिस्से पर चोरी का संकट छाया रहता है।
बिजली चोरी की मात्रा राज्य के चुनावी चक्र पर निर्भर करती है। जिस वर्ष राज्य विधानसभा के चुनाव होने होते हैं, बिजली चोरी बढ़ जाती है। ट्यूबवेलों की तादाद में बढ़ोतरी के साथ ही बिजली चोरी की समस्या भी बढ़ी है। इससे पता चलता है कि बिजली चोरी की समस्या का संबंध किसानों द्वारा बगैर मीटर के प्रयुक्त की जा रही बिजली से है।
राज्य विधानसभा के जिन सदस्यों के इलाके में बिजली चोरी की घटनाएं बढ़ती हैं, उनके फिर से चुनाव जीतने की संभावना भी बढ़ जाती है। गोल्डेन और मिन का सुझाव है कि चुनाव के समय बिजली चोरी रोकने के लिए यह जरूरी है कि बिजली कंपनी के अधिकारियों को राजनीतिक प्रभावों से मुक्त रखा जाए।
इसके अलावा राज्य की सरकार को कृषि क्षेत्र में प्रयुक्त होने वाली बिजली की मीटर की व्यवस्था को भी पुख्ता करने के लिए एक नीति अपनानी होगी, ताकि निजी ट्यूबवेलों के मालिक भी प्रयुक्त की गई बिजली का दाम चुकाएं। इसके अलावा बिजली की वर्तमान मूल्य योजना के फायदे और नुकसानों के अध्ययन के लिए एक सामान्य नीति बनाई जाए।
उत्तर प्रदेश की जनसंख्या देश में सबसे ज्यादा है। राजनीतिक तौर पर यह देश का सबसे ताकतवर राज्य भी है। लेकिन इसके बावजूद यह विकास की दौड़ में काफी पिछड़ा हुआ है। समय आ गया है कि राज्य के लोग सरकार से विकास की मांग करें।
राज्य में सत्तासीन सरकारों ने मुख्य क्षेत्रों में प्रगति की दिशा में ज्यादा कुछ नहीं किया है। स्वास्थ्य, शिक्षा और पोषण उत्तर प्रदेश सभी क्षेत्रों में पिछलग्गू बना हुआ है। लखनऊ में हाल ही में विकास पर एक सेमिनार आयोजित किया गया। इसमें एक स्वास्थ्य अधिकारी ने ईमानदारी से स्वीकार किया कि राज्य के 50 फीसदी से ज्यादा स्वास्थ्य केंद्रों में पानी और बिजली की कोई व्यवस्था नहीं है।
इन हालात में राज्य से आगे बढ़ने की उम्मीद कैसे की जा सकती है। राज्य के अल्प विकास के मुद्दे पर ही राजनीतिक वर्ग अपनी चुनावी रोटियां सेंकता है। इसलिए यह जरूरी है कि विकास की मांग उस जनता की ओर से उठे, जो अल्प विकास की शिकार बनी हुई है। समुदायों को जात-पात से ऊपर उठते हुए अपने प्रतिनिधियों से जवाब मांगने चाहिए। और इसके लिए जनता का हथियार उनका वोट है।
भ्रष्टाचार से व्याप्त माहौल में राजनेताओं की जवाबदेही सुनिश्चित करने का सबसे पुख्ता उपाय सोशल ऑडिट है। आंध्र प्रदेश पहले ही इस ओर कदम बढ़ा चुका है। यहां सोशल ऑडिट, जवाबदेही और पारदर्शिता के लिए एक संगठन की स्थापना की गई है। यह एक स्वायत्त संगठन है, जो सरकारी हस्तक्षेप से पूरी तरह से मुक्त है।
इसके जरिये लोगों को निर्वाचित प्रतिनिधियों से सवाल पूछने का मौका मिलता है। ये प्रतिनिधि नियमित तौर पर सोशल ऑडिट में हिस्सा लेते हैं, न कि सिर्फ चुनाव के समय पर। इसके अलावा सूचना का अधिकार भी उत्तर प्रदेश के लोगों का हथियार बन सकता है, लेकिन इस अधिकार का उपयोग तो उन्हें खुद ही करना पड़ेगा।