मोदीनॉमिक्स में सामाजिक चिंता
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गर्मागर्म बहस का दौर जारी है। क्या 2014 के बजट पर 'कल्याणकारी' होने का वैसा ही लेवल चस्पा किया जा सकता है, जैसा यूपीए की पिछली सरकार के बजटों के साथ होता था? क्या वजह रही कि नए बजट में सुधारों पर उतना ध्यान नहीं दिया गया? एक बिजनेस समर्थक सरकार ने, जो पूर्ण बहुमत के साथ सत्ता में आई है, क्या बजट में कुछ बेहतर किया? ऐसे तमाम सवाल हैं, जिन पर पिछले कुछ दिनों से काफी कुछ कहा जा रहा है, और आने वाले दिनों में भी ये चर्चाएं पीछा नहीं छोड़ने वालीं। कुछ लोगों को इस बात से धक्का पहुंचा है कि चुनाव के बाद सरकार की अर्थनीति उस मोदीनॉमिक्स से अलग दिख रही है, जिसका दावा उनके समर्थक लंबे समय से कर रहे थे। हालांकि अब अरुण जेटली कह रहे हैं, 'भारत जैसे देश में बाजार आधारित आर्थिक सोच कारगर नहीं हो सकती, जहा गरीब लोगों की बहुत बड़ी तादाद है।' वित्त मंत्री जो कह रहे हैं, उसमें संदेह नहीं, मगर बहुतों को यह बात हजम नहीं हो रही।
यह दुखद है कि इस देश में सामाजिक क्षेत्र में निवेश की बात आते ही समाजवादी मॉडल की सार्थकता पर बहस शुरू हो जाती है। दरअसल बात 'समाजवाद' या किसी दूसरे 'वाद' की नहीं है, सवाल यह है कि नियत उद्देश्यों को पाने के लिए जमीनी स्तर पर क्या किए जाने की जरूरत है। कहने का आशय यह कि खर्च का खाका खींचना या बजट में विभिन्न क्षेत्रों में आवंटित राशि पर नजर रखना जरूरी है, मगर साथ ही, यह चर्चा भी जरूरी है कि जिन उद्देश्यों के लिए खर्च किया जा रहा है, क्या वे पूरे हो रहे हैं।
अब शिक्षा को ही लें, जो किसी भी राष्ट्र की कामयाबी की पूर्व शर्त है। अपने बजट भाषण में जेटली ने माना कि प्राथमिक शिक्षा सरकार की प्राथमिकताओं में से एक है। स्कूलों में बुनियादी सुविधाओं की जर्जर हालत के मद्देनजर उन्होंने घोषणा कि पहले चरण में सरकार यह बंदोबस्त करेगी कि सभी स्कूलों में लड़कियों के लिए शौचालयों और पीने के साफ पानी की सुविधा हो। यह लक्ष्य हासिल करने के लिए बजट में सर्वशिक्षा अभियान के लिए 28,635 करोड़ और राष्ट्रीय माध्यमिक शिक्षा अभियान के लिए 4,966 करोड़ रुपये का आवंटन किया गया है। इसके अलावा वित्त मंत्री ने स्कूलों के मू्ल्यांकन की योजना शुरू करने के एक कार्यक्रम सहित शिक्षकों को प्रशिक्षित और प्रेरित करने के लिए 500 करोड़ रुपये की एक दूसरी योजना भी शुरू की है।
मगर भारत में प्राथमिक शिक्षा के साथ प्रमुख दिक्कत यह है कि स्कूलों में नामांकन की दर बढ़ने के बावजूद विद्यार्थियों के सीखने की क्षमता दयनीय बनी हुई है। संदेह नहीं कि स्कूलों को पीने के पानी और शौचालयों की जरूरत है, मगर बच्चों में सीखने की प्रवृत्ति उस माहौल पर भी निर्भर करती है, जिसमें उन्हें शिक्षा दी जा रही है। नए आर्थिक सर्वे के मुताबिक शिक्षक-विद्यार्थी अनुपात में कमी आई है। 'एक कक्षा-एक अध्यापक' सुविधा वाले स्कूलों की तादाद 2010 के 76.2 से घटकर 2013 में 73.8 प्रतिशत पर आ गई है। हालांकि आंध्र प्रदेश, बिहार, गुजरात, हरियाणा, जम्मू-कश्मीर, झारखंड, कर्नाटक, महाराष्ट्र और मिजोरम इस मामले में अपवाद माने जा सकते हैं।
स्वास्थ्य सुविधा दूसरा अहम मुद्दा है, जो राष्ट्र निर्माण के लिए जरूरी है।
देश में जनसंख्या का एक बड़ा हिस्सा अपना इलाज कराने में ही दिवालिया होने के कगार पर पहुंच जाता है। नए बजट में इस संदर्भ में दो पहलों, मुफ्त औषधि सेवा, और मुफ्त रोग-निदान सेवा, को सरकार की प्राथमिकता में शामिल किया गया है। नई सरकार ने पिछली सरकार के सभी प्रस्तावों को नहीं नकारा है, जो कि अच्छा संकेत है, मगर दिक्कत यह है कि बजट में योजनाओं को लागू करने के लिए कोई समय-सीमा निर्धारित नहीं की गई है। अशोका यूनिवर्सिटी में अर्थशास्त्र के विजिटिंग प्रोफेसर डॉ शमिका रवि कहते हैं, 'स्वच्छता और पानी पर बजट में विशेष्ा ध्यान दिया गया है, जो स्वागत योग्य है। इसके अलावा गुटखा, तंबाकू और कोला के उत्पाद शुल्क पर लिए गए फैसले भी जन-स्वास्थ्य के नजरिये से अच्छे कदम कहे जा सकते हैं।
मनरेगा में उत्पादकता पर ध्यान देने की बात भी की गई है। मगर यह होगा कैसे, इस पर कुछ खास नहीं बोला गया है। बुनियादी संरचना में व्यापक निवेश और रियल एस्टेट में प्रत्यक्ष विदेशी निवेश का पूरी अर्थव्यवस्था पर असर पड़ेगा। नए आईआईटी और आईआईएम की स्थापना होगी, मगर इसके लिए शिक्षक कहां से आएंगे? उच्च शिक्षा संस्थान बेहतर प्रबंधन और स्वायत्तता के साथ बेहतर शिक्षकों को आकर्षित करेंगे।' सो मेरा मानना है कि इन चिंताओं पर बात करना ज्यादा उचित है, बजाय इस चर्चा के कि सरकार समाजवादी या सुधारवादी ढर्रे पर चल रही है। जरूरी यह है कि जमीनी स्तर पर क्या बदलाव लाए जाएंगे, और कैसे?