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आसान नहीं था यह सफर, फिर भी जीते!

Sat, 18 Jan 2014 10:30 PM IST
पत्रलेखा चटर्जी
पत्रलेखा चटर्जी Updated Sat, 18 Jan 2014 10:30 PM IST
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विवादों से भरा पिछला हफ्ता राजनीतिक लड़ाइयों और दिल्ली के एक आलीशान होटल में हुई ऐसी दुर्घटना का गवाह बना, जिसने देश को झकझोर कर रख दिया। हालांकि इस दौरान कुछ अच्छी खबरें भी सुनने को मिली।

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वैसे तो स्वास्थ्य क्षेत्र में देश के सामने कई समस्याएं हैं, लेकिन अच्छी बात है कि पिछले दिनों भारत ने देश में पोलियो का अंतिम मामला पाए जाने की तीसरी वर्षगांठ मनाई।
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दरअसल, तीन वर्ष पहले 13 जनवरी को 15 साल की रुखसार खातून में पोलियो रोग की पहचान की गई। हावड़ा की यह युवा लड़की पोलियो के घातक विषाणु से ग्रसित होने वाली अंतिम भारतीय साबित हो सकती है।
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पोलियो के उन्मूलन की दिशा में भारत के अभूतपूर्व प्रयासों का ही नतीजा है कि इस वर्ष मार्च के अंत तक  पूरे दक्षिण-पूर्व एशिया क्षेत्र के कुल 11 देशों के पोलियो से मुक्ति का मार्ग प्रशस्त हो सकेगा।

ज्यादा पुरानी बात नहीं है, जब 2009 में भारत में पोलियो के विश्व में सर्वाधिक (741) मामले सामने आए। इस रोग का नामो-निशान मिटाने की दिशा में चुनौतियां भी कम नहीं थीं।

अधिक जनसंख्या घनत्व और जन्म दर, स्वच्छता का अभाव, दुर्गम क्षेत्रों तक पहुंच, देश के कुछ इलाकों में खासकर मुस्लिम तबके में पोलियो वैक्सीन के प्रति अनिच्छा का भाव ऐसे तमाम कारक थे, जिनकी वजह से पोलियो का पूर्ण उन्मूलन कर पाना कठिन था। तब किसी ने नहीं सोचा था कि भारत पोलियो का हरा सकता है, लेकिन ऐसा हुआ।

2006 में मुझे उत्तर प्रदेश जाने का मौका मिला। यहां पोलियो से ग्रसित लोगों की संख्या लगातार बढ़ रही थी। इसकी मुख्य वजह पोलियो वैक्सीन को लेकर मुस्लिम समुदाय में व्याप्त अफवाहें थीं।

इस मामले में मुरादाबाद की हालत सबसे ज्यादा बदतर थी। वहां जाने पर एहसास हुआ कि परंपरागत तौर पर वंचित समुदाय किस कदर स्वास्थ्य सुविधाओं से कटा हुआ था।

इसी जिले के एक गांव में मेरी मुलाकात एक युवा मां से हुई। अपने मिट्टी के झोपड़े के सामने यह मां अपने दो वर्ष के पोलियोग्रस्त बच्चे को गोद में लिए हुए थी। परिवार वालों का कहना था कि बच्चे को पोलियो की दवा दी गई थी।

लेकिन यह दवा कितनी बार दी गई, यह किसी को याद नहीं था। परिवार में सभी अनपढ़ थे। झोपड़ी में बिजली की भी कोई व्यवस्था नहीं थी। सरकारी स्वास्थ्य सुविधाओं की उन्हें जानकारी तक नहीं थी।

प्राथमिक स्वास्थ्य केंद्र भी उनके घर से तकरीबन 12 किलोमीटर दूर था। बैटरी से चलने वाला टेलीविजन उस झोपड़ी में जरूर था। लेकिन उसका उपयोग केवल हिंदी फिल्में देखने तक ही सीमित था। इस मां ने मुझे बताया कि कोई स्वास्थ्य कार्यकर्ता कभी उनके गांव में नहीं आया।

मुरादाबाद शहर के बाहरी इलाके में कुछ मुस्लिम परिवारों से मिलने का भी मुझे मौका मिला। इन परिवारों का मानना था कि उनके बच्चों को पोलियो की दवा देने के पीछे एक षडयंत्र छिपा है।

स्वास्थ्य कार्यकर्ता इस उम्मीद में बार-बार इनके घरों में आते हैं कि कहीं कोई ऐसा बच्चा न रह जाए, जिसे दवा न पिलाई गई हो। इससे इन परिवारों का संदेह और ज्यादा पुख्ता होता है।

एक दूसरी युवा महिला कहती है, 'आखिर सरकार हमारे बच्चों को पोलियो की ही दवा पिलाने की इतनी इच्छुक क्यों है, जबकि कई और बीमारियां भी हमें परेशान किए हुए हैं।

हमने सुना है कि यह हमारे बच्चों को नपुंसक बनाने की साजिश है। हमारे ऐसे तमाम सवाल हैं, जिनका जवाब देने वाला कोई नहीं है।'

सच तो यह है कि इन सारे सवालों के जवाब मौजूद हैं, लेकिन ऐसा कोई तंत्र नहीं है, जिसके जरिये इन जवाबों को वहां पहुंचाया जा सके, जहां इनकी सबसे ज्यादा जरूरत है।

पोलियो से लड़ाई में भारत को मिली जीत पर पहले ही काफी कुछ लिखा जा चुका है। चाहे वह भारत सरकार की राजनीतिक प्रतिबद्धता हो या राज्यों के स्वास्थ्य विभाग, रोटरी क्लब, विश्व स्वास्थ्य संगठन, यूनिसेफ और लाखों कार्यकर्ताओं का योगदान हो।

इसके अलावा भारत में 'बाइवेलेंट' (द्विसंयोजक) पोलियो वैक्सीन की उपलब्धता के लिए चिकित्सा क्षेत्र में हुए नए अनुसंधान के महत्व को भी नहीं नकारा जा सकता। लेकिन इन प्रयासों का सम्मिलित प्रभाव तभी देखने को मिला, जब पोलियो अभियान को लेकर विभिन्न समुदायों में व्याप्त अविश्वास को दूर किया गया।

मुसलिम समाज के शीर्ष लोग, अलीगढ़ मुस्लिम विश्वविद्यालय और देवबंद की बैठकें उत्तर प्रदेश में पोलियो अभियान का हिस्सा बनीं। मस्जिदों में मुस्लिम समुदाय से अपने बच्चों को पोलियो का टीका लगवाने की अपील की गई।


इसके अलावा स्वच्छता और खानपान जैसे स्वास्थ्य संबंधी दूसरे पहलुओं के बारे में भी जागरूकता फैलाई गई। इन्हीं कोशिशों का नतीजा था कि जो अब तक असंभव माना जा रहा था, आज वह संभव हो गया है।

पूरे उत्तर प्रदेश के लिए यह गर्व का लम्हा है। पोलियो से निपटने में इस राज्य की कामयाबी ने नियमित टीकाकरण को लेकर लोगों में जागरूकता फैलाई है।

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