और कितने हादसों का इंतजार
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युवा महिलाओं की अफसोसनाक मौत की घटनाएं इससे पहले भी हुई हैं, और आगे भी हो सकती हैं। मगर इस बार ऐसा छत्तीसगढ़ के ग्रामीण इलाके में सरकार द्वारा आयोजित एक नसबंदी कैंप में हुआ। इसमें चौदह महिलाओं की मौत हो गई, और कइयों की हालत बेहद नाजुक बनी हुई है। आने वाले दिनों में मरने वालों की संख्या में इजाफा हो सकता है। आखिर इन मौतों की क्या वजह थी-नकली दवाएं, समुचित उपकरणों का अभाव या मानकों का उल्लंघन? यह भी हो सकता है कि महिलाओं की दुर्भाग्यजनक मौतों के पीछे ये तीनों वजहें रही हों। आरोप-प्रत्यारोप और अटकलबाजी का खेल जारी है। हां, इस दौरान छत्तीसगढ़ के मुख्यमंत्री रमन सिंह ने न्यायिक जांच के आदेश जरूर दे दिए हैं,और पुलिस ने इन ऑपरेशनों को अंजाम देने वाले डॉक्टर को गिरफ्तार कर लिया है। फिर भी, इस दुखांत घटना ने उस मानवीय बेरुखी पर सवाल उठाए हैं, जो असुरक्षित और अस्वास्थ्यकारी माहौल को लेकर ऐसे मामलों में बरती जाती है।
इसके अलावा इससे पूरी सार्वजनिक स्वास्थ्य व्यवस्था की गुणवत्ता पर भी सवाल उठता है, जिसकी वजह से बेवजह हजारों मौतें होती हैं। इस संबंध में नियम-कानून भी बने हुए हैं। मगर किसी न किसी वजह से उनका पालन नहीं होता। कभी स्वास्थ्य केंद्रों में पर्याप्त प्रशिक्षित डॉक्टरों, नर्सों या कर्मचारियों के अभाव का हवाला दिया जाता है, और कभी बुनियादी सुविधाओं व उपकरणों की कमी का। अफसोस की बात है कि जो प्रशिक्षित होते हैं, वे भी मानक प्रक्रियाओं या सरकारी नियम-पुस्तिकाओं के पालन को हमेशा तवज्जो नहीं देते। छत्तीसगढ़ के ताजा मामले में सरकार के उस निर्देश का खुला उल्लंघन देखने को मिला, जिसमें कहा गया है कि एक दिन में अधिकतम तीस ही ऑपरेशन किए जा सकते हैं, वह भी तीन अलग-अलग लैप्रोस्कोप की मदद से। छत्तीसगढ़ के एक निजी अस्पताल में, जो कि पंद्रह वर्षों से बंद पड़ा था, एक सर्जन ने छह घंटों से भी कम समय में 83 ऑपरेशन किए। इसके पर्याप्त सुबूत मौजूद हैं कि इनमें मानक प्रक्रियाओं का बिल्कुल पालन नहीं किया गया।
पीड़ित हमेशा गरीब होते हैं। 2010 में बिहार के पूर्णिया जिले के एक प्राथमिक स्वास्थ्य केंद्र में भी नसबंदी के ऑपरेशन के बाद दो महिलाओं की मौत हो गई थी। ऐसे और भी तमाम उदाहरण हैं। अगर यही त्रासदी दिल्ली के वसंत विहार या मुंबई के बांद्रा जैसे इलाकों में हुई होती, तो लोगों की नाराजगी की कल्पना की जा सकती थी। यानी किसी महिला की मौत को लेकर लोगों का रवैया इस पर निर्भर करता है कि वह महिला कौन है, और वह देश के किस हिस्से से ताल्लुक रखती है। ऐसी खबरें सुर्खियों में भी तभी आती हैं, जब मौतों की संख्या ज्यादा हो। नसबंदी के दौरान हुई हालिया मौतों से पूरा देश अचंभित जरूर है, मगर स्वास्थ्य सुविधाओं के संदर्भ में मानक प्रक्रियाओं का मखौल बनाने की प्रवृत्ति देश के ज्यादातर हिस्सों में दिखती है। मगर ग्रामीण बिहार की अपनी हाल की यात्रा के दौरान मैंने इस मामले में सुखद बदलाव देखे।
पटना के सुदूर इलाके धनरिया प्राथमिक स्वास्थ्य केंद्र में मैं एक युवा नर्स रीना कुमारी से मिली। उसने बड़े उत्साह से बताया कि दक्षिण भारतीय नर्सों की एक टीम ने किस तरह उसे और दूसरी नर्सों को साबुन से हाथ धोने, उपकरणों की सफाई, सुरक्षित डिलीवरी और संक्रमण से बचाव के बारे में प्रशिक्षित किया। वहीं की एक पचास वर्षीय नर्स गायत्री कुमारी ने मुझे बताया कि पहले न तो वह साबुन से हाथ धोती थी,और न ही दस्तानों का उपयोग करती थी। मगर, प्रशिक्षण के बाद अब उसकी आदतों में सुधार आया है। बाद में मुझे पता चला कि चिकित्सा सुविधाओं में सुधार की यह पहल बिहार सरकार के मोबाइल नर्स प्रशिक्षण कार्यक्रम का हिस्सा थी। यह कार्यक्रम बिल और मेलिंडा गेट्स फाउंडेशन और अन्य सहयोगी संगठनों की मदद से राज्य भर में फैले 80 प्राथमिक स्वास्थ्य केंद्रों में चलाया जा रहा है। दो वर्षों के भीतर इस कार्यक्रम को राज्य के 300 स्वास्थ्य केंद्रों तक फैलाने की योजना है। उत्तर प्रदेश में भी यह पहल हो रही है।
दरअसल, हाथ धोने का सही तरीका या सर्जरी में उपयोग किए जाने वाले उपकरणों की सफाई छोटी बात लग सकती हैं, मगर समझने वाली बात है कि इससे ऑपरेशन के दौरान होने वाली बेवजह मौतों से बचा जा सकता है। इसके लिए जागरूक होने के लिए आखिर और कितनी मौतों का इंतजार करना होगा? अतीत गवाह है कि ऐसे मामलों के आरोपी कुछ समय बाद रिहा कर दिए जाते हैं। छत्तीसगढ़ में जो हुआ, और इस तरह के तमाम मामलों में दोषियों को उनके तार्किक अंजाम तक पहुंचाना जरूरी है। यह सिविल सोसाइटी और मीडिया की जिम्मेदारी है कि वे नजर रखें कि न्याय और नियमों का पालन हो रहा है, अथवा नहीं।