विचारों से मिटेंगी दरारें
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विचारों से दुनिया बदलती है। इनमें जहां घावों को भरने की क्षमता होती है, वहीं इनमें सर्वनाश की भी ताकत होती है। हमारे समय का सबसे महत्वपूर्ण मुद्दा यही है कि विचारों के इस बाजार में ऐसे विचारों से कैसे निपटा जाए, जो चरमपंथ को बढ़ावा देते हैं, और हर उस चीज को कुचल कर रखने की मंशा रखते हैं, जो हमारे लिए कीमती हो। 2015 की शुरुआत के साथ सबसे बड़ा सवाल यह उभरा है कि क्या हमें उन व्याख्याओं और छवियों का तोड़ ढूंढने की जरूरत है, जो सभी प्रकार के चरमपंथ का पोषण कर रही हैं।
अफसोस की बात है कि नव वर्ष का आरंभ रक्तरंजित ढंग से हुआ। बीते बुधवार, पेरिस में दो नकाबपोश बंदूकधारियों ने वहां की प्रतिष्ठित व्यंग्य पत्रिका 'शार्ली एबदो' के ऑफिस में हमला कर कार्टूनिस्टों को मार दिया। गौरतलब है कि यह पत्रिका अपने कार्टूनों के जरिये इस्लाम समेत सभी धर्मों पर व्यंग्य कसने के लिए कुख्यात रही है। इन नकाबपोशों के हाथों में ऑटोमेटिक हथियार थे, और जुबान पर ''अल्ला हो अकबर'' (खुदा महान है) का नारा। इस हमले में फ्रांस के के कुछ टॉप के कार्टूनिस्ट, जिनमें पत्रिका के संपादक स्टीफेन 'चार्बे' कार्बोनियर भी शामिल हैं, समेत दो पुलिस वाले मार दिए गए, वहीं दो दर्जन से ज्यादा लोगों के घायल होने की भी खबर आ रही है। दोनों आतंकवादियों के मारे जाने की खबरे आ चुकी हैं, जबकि वारदात में शामिल एक आतंकी की महिला सहयोगी की तलाश अब तक पुलिस कर रही है। सवाल यह है कि बेरहमी के ऐसे बेहूदा कृत्यों, और विश्व की एकतरफा व्याख्या पर आधारित उस रूढ़िवादी सोच से, जो विरोध्ा या विकल्प की कोई गुंजाइश नहीं छोड़ती, हम कैसे निपट सकते हैं?
हजारों मील दूर बसे फ्रांस की तुलना में हमारे देश के हालात अलग जरूर हैं, मगर आतंकवाद और चरमपंथी हिंसा से भारत भी अछूता नहीं है। फिर आतंकवाद से जुड़े साझे तारों से भी पता चलता है कि आतंकवादी किस तरह अपने कृत्यों को अंजाम देते हैं?
समझने वाली बात है कि अपने मंसूबों में कामयाब होने के लिए आतंकवादी केवल बंदूक का नहीं, बल्कि ऐसे विचारों का भी सहारा लेते हैं, जिनके जरिये 'अत्याचार' की एक खास तरह से व्याख्या की जाती है। अगर हमारे शब्द और कार्य इसी व्याख्या का पोषण करने वाले हों, तो एक तरह से यह आतंकवादियों की मदद ही होगी। यही वजह है कि फ्रांस या दुनिया में कहीं भी आज पहले से कहीं ज्यादा जरूरत इस बात की है कि चरमपंथियों के इस दुष्प्रचार का तोड़ निकाला जाए।
चरमपंथी जनसंख्या के ध्रुवीकरण के जरिये लोगों के बीच दरार पैदा करना चाहते हैं। मगर हमें उनके मंसूबों को विफल करना होगा। फ्रांस में बदले से प्रेरित होकर मस्जिदों पर हमले की खबरें सुनने में आ रही हैं। हमें सामूहिक तौर पर इसकी निंदा करनी चाहिए। गौरतलब है कि पेरिस में हुए हमले में अहमद मेराबेट नामक पुलिस अधिकारी, और शार्ली एबदो के एक कर्मचारी मुस्तफा ऑरड की भी मौत हुई है, जो दोनों ही मुसलमान हैं। फ्रांस के राष्ट्रपति के राष्ट्रीय एकता के आह्वान के बाद उस अफसोसनाक बुधवार की रात को अपने सांत्वना संदेशों के साथ जो भीड़ निकली, उसमें मुसलमान भी शामिल थे। आज जरूरत इस बात की है, कि मुसलमानों में जो उदारवादी हैं, वे इस्लामिक कट्टरवादी सोच के खिलाफ मोर्चा खोलें। इसके अलावा, गैर मुस्लिम उदारवादी भी अपनी चुप्पी तोड़ते हुए समाज को बांटने की चाह रखने वाले चरमपंथ के सभी रूपों का खुल कर विरोध करें।
पेरिस में हुए नरसंहार के बाद हमने हर ओर से अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता के पक्ष में तमाम दलीलें सुनीं। हमें अभिव्यक्ति के अपने अधिकार का सम्मान भी करना चाहिए, मगर बात केवल अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता तक सीमित नहीं है। यह अस्तित्व को बचाने का मामला है। इस कड़वी सच्चाई से अब मुंह नहीं मोड़ा जा सकता कि दुनिया में ऐसी शक्तियां सक्रिय हैं, जो अपने राजनीतिक- सांस्कृतिक विचारों और विचारधारा को बंदूक की नोक पर सही साबित करने पर तुले हैं। इन हालात में सुरक्षा सबसे बड़ा मुद्दा बन कर उभरता है, मगर हमें ऐसी वैकल्पक व्याख्या की तलाश भी करनी होगी, जो उन लोगों को आकर्षित कर पाए, जिन पर अतिवादी विचारों का सबसे ज्यादा असर पड़ने की आशंका है।
कुछ कार्टूनिस्ट को अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता के विचार के चलते अपनी जान से हाथ धोना पड़ा। इनके हत्यारे भी मारे गए, जो चिंतन और अभिव्यक्ति की स्वंतत्रता, सहनशीलता और बहुलता के विचार के विरोधी विचारों से प्रेरित थे। शार्ली एबदो के कार्टूनिस्टों की हत्या की वजह केवल किसी धर्म विशेष के अपमान का मामला नहीं था। यह यूरोपीय समुदाय को मुसलमानों के खिलाफ उकसाने की एक कोशिश है, ताकि अल कायदा और आईएस में भर्ती के लिए उपजाऊ जमीन तैयार की जा सके। इनका यह मकसद कामयाब नहीं होने देना चाहिए। इन सबसे भारत भी अछूता नहीं रह सकता। हमें सोचना होगा कि हम किस दिशा में जा रहे हैं, और किस तरह के समाज में हम रहना चाहेंगे। भारत अपनी विविधतापूर्ण और समन्वयात्मक संस्कृति के लिए जाना जाता है, मगर हमें इसकी रक्षा करनी होगी।